एम्फिस्टोमोसीस जानकारी एवं बचाव

एम्फिस्टोम नामक परजीवी के द्वारा होता है, यह बकरी भेड़ सहित अन्य जानवरो में भी पाया जाता हैं। यह परजीवी आमाशय में पाया जाता है। इसके द्वारा पशु को तेज दस्त हेाता है। इनमे दोनो ओर चूसने वाले सकर होते है। इनको अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए घोंघे की जरूरत पड़ती है।

कारकः पैराम्फिस्टोमम प्रजाति।

प्रायः यह रेाग गर्मी के आखरी दिनो तथा सर्दी के प्रारंभिक दिनो मे पाया जाता है। क्योकि इस समय चारागाह इस परजीवी से सबसे अधिक दूषित रहता है।

जीवन चक्रः

यह एक फ्लूक है जिससे कि इसका जीवन चक्र यकृत में पाये जाने वाले फ्लूक के समान ही होता है। पोषक के रूप मे घोंघे की आवश्यकता पड़ती है। उसके शरीर के अन्दर इसका विकास होता है। बाद में मेटासर्केरिया बाहर निकलकर घासों तथा हरे पत्तो पर चिपक जाते है। जिसको जानवर खाकर बीमार हो जाता हैं।

रोग के लक्षण तब प्रकट होते है। जब बड़ी संख्या में अवयस्क परजीवी ड्यूडेनम में पहुंच जाते है। जिससे पशु को दस्त होती है जिस स्थान पर चिपके रहते है। वहा पर चूभन होती है तथा उनके बार-बार आक्रमण से रक्त का स्त्राव होने लगता है जो गोबर के साथ बाहर निकलता है।

लक्षणः 

1. बदबूदार तथा पतले दस्त कई दिनो तक आना।

2. कमजोरी, शरीर में पानी की कमी।

3. सूस्ती, भूख कम लगना।

4. गले के नीचे सूज जाना । जिसके बहुत सारा द्रव्य का इकट्ठा हो जाना। जिससे प्यास बहुत अधिक लगना।

5. छोटी उम्र के पशुओ में यह तेजी से फैलता हैं।

रोग निदानः निम्न परीक्षणो के द्वारा इसका निदान किया जा सकता है-

1. बद्बूदार दस्त के द्वारा।

2. गोबर की जाँच करके।

3. शव परीक्षण करके।

उपचारः 

आक्सीक्लोजानाइड, निक्लोसामाइड आदि प्रकार के कृमिनाशक उपचार में कारगर है। परन्तु इनका उपयोग नजदीकी पशु चिकित्सक की सलाह पर ही करना चाहिए।

बचावः निम्न बातो का ध्यान रखकर इससे बचाव किया जा सकता है-

1. पशुओं को साफ चारा तथा पानी देना चाहिए।

2. समय-समय पर कृमिनाशक दवा देते रहना चाहिए।

3. दूषित गोबर को एक निश्चित स्थान पर ही फेंकना चाहिए।

4. घोंघा के प्रजनन वृद्धि को रोकना चाहिए।

5. दूषित पानी इकट्ठा नही होना चाहिए।

6. बीमार जानवर को स्वस्थ जानवरो से अलग रखना चाहिए।

7. पानी पीने के स्त्रोतो जैसे तालाब का कटीले तार से घेराव कर देना चाहिए।