कड़कनाथ पालन

कड़कनाथ पष्चिम मध्यप्रदेष के झबुआ एवं धार, छत्तीसगढ़ के बस्तर जिला एवं गुजरात तथा राजस्थान के समिपवर्ती क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय नस्ल का मुर्गा है। विश्व में काला मांस वाले मुर्गा की मात्र तीन जाति पायी जाती है। जिसमें भारत में पायी जाने वाली एक मात्र नस्ल कड़कनाथ है। इस नस्ल की उत्तपत्ति विकास भारतीय कृषि परिस्थिति परिवेष में प्राकृतिक चयन के द्वारा हुआ है। जिसमें स्थानिय वातावरण के अनुकुल है। कड़कनाथ नस्ल के मुर्गो में रोग प्रतिरोधक क्षमता विदेषों नस्ल की तुलना में काफी अच्छा है। कड़कनाथ पक्षी पर अति अनुपयुक्त वातावरण जैसे ग्रीष्मकालीन उष्मा, शांति कालीन ठंड का प्रभावशुन्य होता है। यह प्रतिकुल परिस्थिति जैसे अपर्याप्त आवास, प्रबंधन एवं आहार में भी कुषलता पूर्वक विकास करता है। कड़कनाथ की मुख्यतः तीन प्रजाति है।

एक उत्तम व्यवस्था है। टिका पक्षी लगवाने के 21 दिनों के उपरान्त पषुओं को उस रोग के प्रति क्रमिक राष्ट्रीय प्रतिरक्षा उत्तपन्न हो जाता है। जिससे पषुओं में रोग होने की सम्भावना क्षिजि होता है। यदि रोग हो भी जाता है और उसका इलाज आसानी से हो जाता है या पषु स्वतः अरोग हो जाता है। रोग ग्र्रस्त प्शु को टिकोषधि नहीं लगाना चाहिए क्योकि रोगग्रस्त पषु को टिकोषधि नहीं लगाना चाहिए क्योकि रोगग्रस्त पषु को शरीर के शरीर में जीवाणुओं के कारण एन्टीजेन उपस्थित होता है तथा टीकाकरण से पुनः एन्टीजेन शरीर में पहुचाता है जो पषु के प्रतिरक्षा को क्षिण कर देता है तथा रोग उम्र रूप धारण कर सकता है जिससे मृत्यु हो जाती है।

1. स्याह काला कड़कनाथ & सम्पुर्ण शरीर का पंख काला होता है।

2. पेन्सीन कड़कनाथ & गर्दन पर पंख उजला तथा अन्य हिस्सा में करना होता है।

3. सुनहरा कड़कनाथ & सिर एवं गर्दन पर सुनहरा पुख तथा अन्य हिस्सा में काला होता है।

सभी प्रजाती में त्वचा, चोंच, पिण्डली, अंगंली, तलवा गहरा काला होता है। जबकि जीभ गहरा ये हल्का होता है। कुक्कुटषिखा,गलचर्म तथा कर्णपाली हल्का से गहरा धुसर वर्ण का होता है। कभी कभी कुक्कुटषिया, गलचर्म तथा कर्णपाली बैगनी रंग का भी पाया जाता है कड़कनाथ कम अंड़ा उत्पादन करने वाला नस्ल है लेकिन इसका मांस काफी स्वादिष्ट एवं संहतमंद गुणों के लिए बहुत अधिक होने के माॅस का मुल्य बहुत अधिक होने के कारण इसका पालन अत्यधिक लाभकारी है। इसके मांस का उपयोग अदिवासियों के द्वारा नर में कामोन्तेजक एवं मादा में स्वाभाविक गगर्भपात के उपचार में किया जाता है।

कड़कनाथ मुर्गा के माॅस की विषेषता

1. कड़कनाथ के माॅस में वसा की मात्रा (0.73 – 1.03प्रतिषत),अन्य नस्लों में पायी जाने वाली मात्रा (13-15 प्रतिषत) से काफी कम है।

2. प्रोटीन की मात्रा (25 प्रतिषत), अन्य नस्ल में पायी जाने वाली (18- 20प्रतिषत) से अधिक पायी जाती है।

3. इसमें 18 अमीनों अम्ल अधिक मात्रा में पाया जाता है जिसमें मनुष्य के लिए 8 आवष्यकता अमीनों अम्ल के क्षेणी में आता है। इसके अलावे अधिक मात्रा में हार्मोन, विटामिन, बी -1, बी-2, बी-ब, बी-12, सी, ई, नीयासीन, कैल्षियम, लौह एवं निकोटिनिक अन्य पाया जाता है जिस कारण यह अधिक पौष्टिक है।

4. कोलेरूट्रल की मात्रा (184.75 मी.ग्रा./100 ग्राम माॅस) अन्य सफेद मुर्गी में पाया जाने वाला मात्रा (218.12 मीग्रा./100 ग्राम माॅस) से कम होता है।

5. लीनोलेइक अम्ल की मात्रा (24 प्रतिषत) अन्य मुर्गी (21प्रतिषत) से काफी अधिक होता है।

कड़कनाथ मुर्गी का प्रदर्षन

एक दिन के चूजे का वजन 28-31 

ग्राम 8 सप्ताह में शरीर भार 0.8कि.ग्रा.

एक कि.ग्रा. शरीर भार प्राप्त करने का औसत काल         14 सप्ताह 

उत्तर जीविता 94 प्रतिषत 

व्यस्क नर का औसत श्षरीर भार 2.2 -2.5 कि.ग्रा. 

व्यस्क मादा का औसत षरीर भार 1.5 -1.8 कि.ग्रा. 

त्वचा रिक्षत माॅस की प्रतिषत 65 प्रतिषत 

अंड़ा उत्पादन आरम्भ 24 सप्ताह

प्रति माह अंड़ा उत्पादन 11-13 नग 

वार्षिक अंड़ा उत्पादन 90-120

अंड़ा का औसत वनज 47 ग्राम

जनन क्षमता 55 प्रतिषत

अंड़ा से चूजे का उत्पादन 52 प्रतिषत

आवास – आवास स्थानीय उपलग्ध संसाधन से बनाया जा सकता है। प्रति पक्षी 1.5 से 2.0 वर्ग फीट सतही क्षेत्रफल की आवश्यकता होती हैं फर्श पर 2.3 ईंच मोती बिछाली का प्रयोग किया जाता है। बिछाली के लिए चावल, भूसी, मुंगफली का छिलका, लकड़ी,छिलन का उपयोग किया जा सकता है। मुर्गी बाड़ा लम्बाई पूर्व पष्चिम रखा जाता है। आवास में 100 चूजों पर 2-3 (60-70 से.मी. रेखिय) आहार पात्र की व्यवस्था रखी जाती है। आवास में 24 घंटे स्वस्छ जल का प्रबंन्ध रखा जाता है। आवास में उचित वायु संचार, प्रकाष एवं परभक्षी से सुरक्षा की वूर्ण व्यवस्था रखी जाती है। 3-4 अंड़ा देने वाली मुर्गी पर एक घोसला का निर्माण बाॅस, लकड़ी सर मिट्टी के बर्तन से किया जाता है। कड़कनाथ एक जगह अंड़ा नहीं देती है। इसलिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

आहार – आरम्भ में बिछाली पर अखबार बिछा कर मक्का टूट दिया जाता है। एक सप्ताह की उम्र से स्ट्राअर आहार (उपापचयी उर्जा 2600 कि.ग्रा) एवं कच्ची प्रोटीन 18 प्रतिशत) दिया जाता है। 9 वें. सप्ताह से 25 सप्ताह तक ग्रोवर आहार (उपापचयी उर्जा 2500 कि.ग्रा. एवं कच्ची प्रोटीन 16 प्रतिशत ) दिया जाता है। 25 वें सपताह अंड़ा देने वाली मुर्गी को लेयर आहार (उपापचयी उर्जा 2600 कि.ग्रा. एवं कच्ची प्रोटीन 16 प्रतिषत प्रदान किया जाता है। अंड़ा देने वाली मुर्गी को कैलषियम श्रोत्र जैसे बजरी, कंकड़ चूना पत्थर, डी.सी.सी. आदि से प्रति पक्षी प्रति दिन 3-4 ग्राम अंड़ा उत्पादन के दौरान दिया जाता है।

ब्रूड़िग – चूजों में ताप नियंत्रण प्रकिया विकसित नहीं होता है। अतः आरम्भ के 4 सप्ताह तक ब्रूड़िग किया जाता है। चूजों की ब्रूड़िग इन्फा्रॅरेड बल्बों या ब्रड़िग सिस्तमों द्वारा किया जा सकता है।

खूला विचरण प्रबंधन – आरम्भ के 2 दिनों तक अखबार पर मक्का टूट देने के बाद 4 सप्ताह की उम्र तक विटामिन, खनिज लवण युक्त संतंलित आहार उनके सर्वोत्कृष्ट वृद्धि के लिए प्रदान किया जाता है।               4 सप्ताह के बाद मुर्गी को खुला विचरण के लिए छोड़ते है ताकि वह चराये कर सके। रात्री में विश्राम के लिए आवास में ले आते हैं जहाॅ उन्हें रसोई अवषेष, अनाज या आहार उवषेष एवं उपलब्ध वनस्पति प्रदान करते है। खुला विचरण पालन में अन्त कृमि से कृमि नाषक का प्रयोग किया जाता है। कोक्सिडिया से बचाव के लिए 4-6 सप्ताह में रोधात्मक एवं कोक्सिडियोसिस रोग होने पर उपचारात्मक चाराक दिया जाता हैं।

टीकाकरण कार्यक्रम

उम्र ¼दिन में ½टीका का नामस्ट्रेनखुराकमार्ग
1 दिनमैरैक्स रोगएच.मी.टी.0.2 मीलीअधोत्वचित
7-10 दिनरानीखेतएफ-1,बी-1एक बूंदमॅुह या आॅख के द्वारा
14 दिनआई बी डीआई बी डीएक बूंदमॅुह या आॅख के द्वारा
28 रानीचोतलसोटालीमींग आइन्डपीने के जल के साथ

चूजों की उपलब्धता – केन्द्रीय कुक्कुट विकास संस्थान मुम्बई।

अंडो का संरक्षण

अंडा एक शिध्र नश्वर उत्पाद है जिसका जीवन काल अल्प होता है। अंडा की गुणवता मुर्गी से प्राप्त होते समय सर्वाधिक होता है एवं भंडारण के दौरान निम्न परिर्वतन होने के कारण पौष्टिकता में कमी आती है।

1. नमी की क्षति

2. कार्बन डाइफक्साइड की क्षती

3. पी एच माप में परिर्वतन

4. गाढ़ा अलल्युमीन से विरल अलल्युमीन एवं जर्दी में तरल का प्रवाह

5. सुरक्षाजीव का प्रविष्टि

6. वाहय गंध का अवशोषण

अंडा संरक्षण का लक्ष्य उपरोक्त परिर्वतन को निम्न स्तर पर रखते हुए अंडों को नूतन रखना है।

अंडो का संरक्षण प्रणाली 

घरेलु प्रणली   व्यापारिक प्रणाली

1 तरल काॅच प्रणाली 5 शीत प्रणाली

2 चूनो का पानी प्रणाली 6 हिमभूत अंडा

3 तेल रक्षित प्रणाली 7 शुष्क अंडा

4 ताप स्थिरिकरण प्रणाली

1. तरल काॅच प्रणाली –  इससे गर्म जल में 10 प्रतिशत सोडियम सीलीकेट (1 लीटर सोडियम सीलीकेट 9 लीटर गर्म जल) के घोल बनाते हैं फिर इस घोल को ठंड में रखकर घोल से पूर्णतः डुबो दिया जाता है। अब पात्र को ढक्कर ठंड जगह में रखा जाता है। 10 लीटर घोल में 15 अर्जन अंडे रखे जा सकते हैं।

2. चूने का पानी प्रणाली – एक लीटर जल में 0.5 कि.ग्रा. शुष्क चूना मिलाकर रातभर के लिए छोड़ दिया जाता है। सुबह उपर के पानी को किसी दूसरे पात्र में नियार लिया जाता है। अब इस जल में नमक 112 ग्राम प्रति लीटर एवं ठंड जल 2.5 लीटर मिलाकर मलमल के कपड़ों से छान लिया जाता है। अब डुबोकर रखा जाता है। फिर अंड़ों को बाहर निकालकर छोल में सुखा लिया जाता है। इस विधि से 6 माह तक अंडा का भंडारण सामान्य तापक्रम पर किया जा सकता है।

3. तेल रक्षित प्रणाली – इस प्रणाली में अंडो को स्वाद्हीन, गन्धहीन, वर्णविहिन तेल