कुक्कुट आवास व्यवस्था

कुक्कुट गृह की रचना को प्रभावित करने वाले कारक

तापमान

चूजों के शरीर का तापक्रम 103.60 फै. (39.80 से.) तथा वयस्क मुर्गी का तापक्रम 104-1060 फै. (40-410 से.) होता है। मुर्गियों के शरीर में स्वेत ग्रंथियां अनुपस्थित होती हैं। लगभग 290 से.ग्रे. तक मुर्गियां अपने शरीर की गर्मी चालन, सोयाबीन तथा विकरण से छोड़ती है। किन्तु इससे अधिक तापक्रम पर मुर्गियां हांफने लगती हैं तथा मुख गुहा तथा श्वसन तंत्र के जल वाष्पीकरण से तापक्रम कम करती है। मुर्गियों के लिए आरामदायी तापमान की कक्षा 18.3 से 21.5 से (65-710 फै.) होती है, जिसमें उनसे ज्यादा उत्पादन मिलता है। इसके साथ 22 से 280 से. (71.6-82.40 फै.) और 11-170 से. (52-62.60 फै.) की कक्षा की मुर्गियां अधिक दुष्परिणाम बिना सह लेती हैं। जब वातावरण के अधिक तापक्रम से मुर्गियों का आंतरिक शारीरिक तापक्रम 460 से (1150 फै.) हो जाता है और उनकी मृत्यु भी हो सकती है। 

वातायन

मुर्गी शारीरिक आकार में छोटा होने के कारण तीव्र गति से चयापचय की क्रिया करता है और शरीर के प्रति यूनिट भार पर उसको अधिक आक्सीजन की आवश्यकता होती है। मुर्गी गृह में खुली हवा बहने से पर्याप्त वातायन प्राप्त होता है। इससे ग्रीष्म ऋतु में मुर्गी गृह में तापमान कम रखने में भी मदद मिलती है। अच्छे वातायन से हवा में उपस्थित कार्बन डाई-आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड अमोनिया मिथेन, ज्यादा आर्द्रता तथा धूल बाहर फेंके जाते हैं। एक्जास्ट फेन विद्युत पंखों के उपयोग से वातायन में वृद्धि की जा सकती है। 

आपेक्षिक आर्द्रता 

अधिक या कम आपेक्षिक आर्द्रता मुर्गियों के लिए हानिकारक होती है। मध्य स्थिति की लगभग 38 से 42 प्रतिशत आर्द्रता मुर्गियों में अधिक उत्पादन प्राप्ति के लिए लाभदायक होती है। ज्यादा आर्द्रता से जीवाणु की संख्या बढ़ जाती है तथा कम आपेक्षिक आर्द्रता का परिणाम धूलभरा तथा सूखे लिटर में नजर आता है। उच्चताप 37.80 से. (1000 फै.) एवं आपेक्षित आर्द्रता 80%  का मुर्गियों की दक्षता पर अनिष्ठकारी प्रभाव पड़ता है। तथा अनेक मुर्गियों की मृत्यु भी हो जाती है। 400.50 से. तापक्रम तथा 20%  आपेक्षिक आर्द्रता पर थोड़ी बहुत बैचेनी महसूस करने वाली मुर्गी 37.80 से (1000 फै.) तथा 80% आपेक्षिक आर्द्रता पर अधिक बैचेन हो जाती है तथा तापक्रम और अधिक बढ़ने से उनकी मृत्यु हो सकती है। 

प्रकाश

प्रकाश दिखने के लिए आहार खपत तथा अण्डे उत्पादन की वृद्धि करने के लिए जरूरी होता है। सूर्य प्रकाश मुर्गियों के शरीर का तापक्रम बनाये रखने में और मुर्गी गृह के जीवाणु रहित करने के लिए उपयोगी होता है। दो मुर्गी गृह के बीच 20-40 फीट का अन्तर होना चाहिए।

अलग-अलग परिमाण के मुर्गी फार्म की संरचना

परिवार के भरण पोषण के लिये उचित मुर्गी संख्या 5000 है इससे प्रति मुर्गी उत्पादन खर्च कम रहता है। छोटे फार्म (500-1000 मुर्गी) के लिये अन्य व्यवसाय करना होगा। 

सामान्यतया एक ही मुर्गी घर वाला फार्म जिसमें 1 दिन से 72 सप्ताह की आयु तक मुर्गी पाली जाती है। 

मध्य स्तर का फार्म (1000-5000 मुर्गी) व उस पद्धति में मुर्गी पालन हेतु 1 चूजा पठोर गृह तथा 3 मुर्गी घर होते हैं। 

बड़ा फार्म (5000-20,000 मुर्गी)

इस मुर्गी संख्या के फार्म विभिन्न इकाइयों की आवश्कयता होती है। 

1. चूजा गृह एक दिन से आठ सप्ताह को आयु वर्ग 

2. पठोर गृह 9 सप्ताह से 18 सप्ताह

कुक्कुट प्रक्षेत्र हेतु स्थान का चयन

1. प्रक्षेत्र भूमि आसपास की सतह से ऊंची हो जिससे वर्षा का पानी का उचित निकास हो व जल प्लावन न हो। 

2. व्यवसायिक लेयर फार्म शहर व ग्राम की निवास भूमि से दूर हो तथा निकट भविष्य में फार्म के आसपास कालोनी का निर्माण न हो । 

3. ग्राम पंचायत, नगर पालिका व पशु चिकित्सा एवं पशुपालन विभाग से स्वीकृति प्राप्त कर लें तथा पड़ोसियों को आपत्ति न हो। 

4. लेयर फार्म राज मार्ग से 100 मी. दूर किन्तु सड़क से जुड़ा हो ताकि मुर्गी आहार अण्डों चूजों व मुर्गियों के लाने व ले जाने में असुविधा न हो। पास का शहर रेल मार्ग से जुड़ा हो। 

5. लेयर फार्म के पास क्रियाशील बाजार हो। 

6. लेयर फार्म हेतु सम्पूर्ण आहार या आहार के घटक खाद्य पदार्थ, दवाईयां व साज सामान उचित मूल्य पर आसानी से उपलब्ध हों। 

7. लेयर फार्म के आसपास कोलाहल न हो अन्यथा चूजों की मृत्यु दर अधिक होगी। 

8. भूमि दलदली न हो, कठोर हो। 

कुक्कुट प्रक्षेत्र 

1. चूजों गृह, पठोर गृह व मुर्गी घर भिन्न हो। 

2. विभिन्न गृहों के बीच 150 फुट का अन्तर हो। 

3. दो गृहों के बीच 20-50 फिट का अंतर रखने से वातायन अच्छा रहता है। 

4. मुर्गी आहार भण्डार कक्ष, रहने के आवास व भण्डार कक्ष सड़क से लगा हो। जिससे बाहर वाहनों का मुर्गा फार्म में प्रवेश रोका जा सके। 

5. मकान की लम्बाई की अक्ष पूर्व पश्चिम दिशा में हो।

          उत्तर दिशा

  लम्बाई 100 से 300 फुट (30 से 90 मीटर)

    पश्चिम दिशा   पूर्व दिशा (20-30 फिट चैड़ाई)

  दक्षिण दिशा (6-9 मीटर)

चूजे, ग्रोवर व लेयर गृह की संरचना

नींव

नींव की गहराई 0.6 से 0.9 मीटर (2 से 3 फुट) भूमि के अनुसार आवश्यक हो। नींव के गोल गढ्ढे 9 इंच चैड़े व 10 फिट गहरे हों। दो गढ्ढों के बीच 5 फुट का अंतर हो, फर्श की सतह पर बीम होना चाहिए। बीम के ऊपर कालम (स्तम्भ) 10 फुट के अंतर से हो।

फर्श

फर्श पक्का पत्थर या कांक्रीट का बना होना चाहिए। ताकि वर्षा ऋतु में जमीन की सीलन, जल व चूहों से बचाव हो सके। फर्श के आसपास की भूमि में 2-3 फिट ऊंचा होना चाहिए। फर्श ऐसा होना चाहिए जिसमें न नमी रहे, न चूहे रहें। बाहर से कीड़े जैसे कि काकरोच, खटमल, दाने के खटमल, किलनी (टिक) मक्खियां, मच्छर आदि न हों। सांप नेवला, बिल्ली आदि मुर्गी के शत्रु जानवर गृह में प्रवेश न कर सकें। 

एंगिल आयरन के फ्रेम पर मुर्गी जाली या लकड़ी या बांस के स्लेट का फर्श भी बनाया जा सकता है। इससे मुर्गियों की विष्ठा नीचे गिरती रहती है तथा मुर्गियां विष्ठा खा नहीं पाती और इससे वे संक्रमण से बची रहती हैं। 

लम्बाई की दीवार 

गहरी बिछाली पद्धति के आवास गृह में लम्बाई की दीवार 2 -2 1/2 फिट ऊंची होनी चाहिए। पर लेयर गृह में पिंजरा आवास पद्धति में लम्बाई की दीवारों की आवश्यकता नहीं होती। तीन पंक्ति उल्टी पिंजरा पद्धति में फर्श ऊंचे चबूतरे के रूप  सेवा मार्ग युक्त बनाया जाता है। 

जालियां 

अच्छे वातायन के लिये 10 फिट लम्बे व 5 फिट ऊंचे फ्रेम पर 1″ x 1″  की 10-12 गेज की लोहे की जाली लगाई जाती है लोहे की जाली मजबूत होनी चाहिए। जिससे चोरों व जानवरों से बचाव हो सके। 

जाली के ऊपर का छज्जा 

मुर्गी गृह में धूप व वर्षा की फुहारों से बचने हेतु 3, 1/2 फिट चैड़ी व लम्बाई की दीवार के बराबर लम्बा लोहे या लकड़ी के फ्रेम पर एस्बेस्टास शीट का छज्जा बनाया जाना चाहिए। 

विभाजक दीवार

चूजों व पठोरों के अच्छे रख-रखाव के लिये गृह की लम्बाई को 4-6 विभाजक दीवारों, 3 फुट ऊंची व उसके पश्चात मुर्गी जाली से विभाग या पार्टीशन बनाये जायें। चूजों व पठारों को टाइल्स के छत भी बनाये जा सकते हैं किन्तु इन्हें हर वर्ष सुधरवाना पड़ सकता है। सावधानी यह रहे कि सांप चूहे, गिलहरी गृह में प्रवेश न कर सकें। लम्बी दीवारों के समतल प्लायबोर्ड से ऊंचाई को विभाजित करती हुई सतह (अटिक) पटवा बनाने से मुर्गी गृह का तापक्रम नियंत्रित किया जा सकता है। छतों का आधार बहुत मजबूत होना चाहिए। इसे लोहे के पाइप व इमारती लकड़ी से बनाया जाता है। 

फर्श के समतल चलने का रास्ता

फर्श के समतल गृह के बाहर 0.45-0.60 मी. कांक्रीट का प्रलम्ब लम्बाई की दीवार तरफ निर्मित किया जाता है इससे कुक्कुट गृह में चूहे व सांप प्रवेश नहीं कर पाते।

सीढ़ियां

मुर्गी घर के बाहर सीढ़ी के बीच 1-2 फिट का अंतर रखने से भी चूहे व सांप मुर्गी घर के भीतर प्रवेश नहीं कर पाते।   

0.9 मी. को बड़े – समूह 2000 चूजों या 1000 पठोर की अपेक्षा 350 चूजे या 175 पठोरों के समूह में रखना अच्छा होता है इससे इनके प्रबन्ध में आसानी होती है तथा भिन्न प्रकार के चूजों को अलग-अलग रखा जा सकता है। अधिक ठंड वाले क्षेत्रों में खिड़कियों पर पल्ले लगाये जायें जिससे गृह का तापक्रम नियंत्रित करने में आसानी होगी। 

वातायन

चूजों व पठोर गृहों में लंबी भुजायें की दीवारों में हर एक 10 फिट हिस्से में 1 मीटर चैड़ी व 1.75 मीटर ऊंची खिड़कियां लगाई जाती हैं। स्वयं चालित प्रबंध वाले मुर्गी घरों में खिड़कियां फर्श से लगभग 0.5 मीटर ऊंचाई पर दोनों लम्बाई की भुजाओं में लगाये जाते हैं। साफ हवा अंदर खीचने के लिये तथा दूषित हवा बार फेकने के लिये छत की ऊंचाई के समतल वायु चूषक पंखे (एक्जास्ट फेन) लगाये जाते हैं। 

मुर्गी गृह की छत बनाने के लिये ऐस्बस्टस की नालीदार चादरें सामान्यतः उपयोग की जाती हैं। लोहे की जस्ते से गेल्वेनाइज्ड चादरें भी उपयोग की जा सकती हैं। ये चादरें जल्दी गर्म व ठण्डी हो जाती हैं। सीमेन्ट कान्क्रीट का लेण्टर का छत भी बनवाया जा सकता है। शीतकाल में हवा मौजूद नमी भी द्रवित होकर छत की निचली सतह पर जम जाती है व टपक कर गहरी बिछाली को गीला कर देती है। 

दरवाजे 

दरवाजे को लम्बाई की दीवारों में लगाना चाहिए। चैड़ाई की दीवारों में दरवाजे लगाने से वर्षा का पानी मकान में आता है। सामान्यतः 1 मीटर चैड़े व 2 1/4 मी. ऊंचे दरवाजे अच्छे होते हैं दरवाजे की चैड़ाई मुर्गी घर में उपयोग किये जाने वाले साज सामान पर भी निर्भर रहते हैं। दरवाजे के सामने जीवाणु व विषाणु नाशक जल से भरा हुआ पैर डुबाने का कुण्ड होना जरूरी होता है। दरवाजा लोहे के फ्रेम पर मोटी लोहे की चादर व 3/4″ लोहे की 10 गेज गेल्वेनाइज्ड जाली का बना होना चाहिए।