कृमिनाशक प्रतिरोधकताः कारण एवं रोकथाम

पशुपालन साधारण कृषि का महत्वपूर्ण अंग है जो देश की अर्थव्यवस्था में अहम् भूमिका अदा करता हैं। पशुओं में परजीवियों से होने वाले संक्रमण के कारण पशुओं के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है एवं उनमे रक्तअल्पता, दस्त लगना एवं बाँझपन जैसे कई लक्षण देखने को मिलते है। परजीवी रोगों से होने वाले दुष्प्रभाव सामन्यतः पशुओं की उम्र, नस्ल, रोगप्रतिरोधक क्षमता एवं पोषण पर निर्भर करते है, सामान्यतः यह देखा गया है कि नवजात एवं छोटी उम्र के पशुओं में वयस्क पशुओं की अपेक्षा  लक्षण ज्यादा तीव्रता के साथ दिखाई पड़ते है। पालतू पशुओं में होने वाले विभिन्न परजीवी रोगों से बचाव के लिए बाजार में कई प्रकार की एन्थेल्मेंटिक दवाओं का प्रयोग किया जाता है जैसे कि बेन्जेमिडाजोल, लेवामीसोल, आईवरमेक्टिन, इत्यादि यह दवाये परजीवियो को खत्म कर के पशुओ को होने वाले परजीवी रोगों से बचाव करती है। यह दवाऐं इन परजीवियों को खत्म कर पालतु पशुओं से होने वाली आय को बढ़ाते है एवं इस प्रकार किसानों के सच्चे दोस्त होते है । परन्तु इन दिनों यह देखने में आया है कि यह दवाऐं परजीवियों पर अब उतनी कारगर नहीं बची है  जितनी कि यह पहले हुआ करती थीं । इसका प्रमुख कारण इन परजीवियों में उपलब्ध एन्थेलमेन्टिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध का उत्पन्न होना है । यह प्रतिरोध पशुओं को दवा देने के बाबजूद इन परजीवियों को मरने नहीं देता एवं यह निरन्तर पशुओं को संक्रमित कर उनसे होने वाले लाभ को कम करते रहते है । 

एन्थेल्मेन्टिक प्रतिरोध परजीवियों में धीरे-धीरे बढ़ता है एवं एक समय ऐसा आता है कि जब बाजार में उपलब्ध कोई भी एन्थेल्मेन्टिक दवा इन परजीवियों की रोकथाम में कारगर नहीं रह जाती । इस प्रकार की स्थिति कुछ विदेशों जैसे आस्ट्रेलिया एवं साउथ अफ्रीका में देखी गई है जहॉ पर कई बड़े पशुपालक भेड़ बकरी पालन को छोड़ने के लिए मजबूर हो गए क्योंकि वहॉ के परजीवियों पर कोई भी दवा कारगर नहीं बची है । एवं कंपनियों ने भी नई दवा की खोज में कम मुनाफा होने के कारण इस ओर पहल करना छोड़ रखा है । 

अतः हमने अगर समय रहते इस एन्थेल्मेन्टिक प्रतिरोध को कम करने के उपायों को नहीं अपनाया तो वह दिन दूर नहीं जब लोगों के पास इन परजीवियों की रोकथाम के लिए कोई उपाय नहीं बचेगा एवं इनसे हार मानकर पशुपालन उद्योग को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा । 

इस भयावह स्थिति को उत्पन्न होने से रोकने के लिए सर्वप्रथम परजीवियों की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाले कारकों को जानना बेहद आवश्यक है इसके बाद ही किसान एवं पशुचिकित्सक साथ में मिलकर इस खतरनाक चुनौती का सामना कर इसकी रोकथाम कर सकते है । 

एन्थेल्मेन्टिक प्रतिरोध को बढ़ाने वाले कारक 

1. एक ही दवा का बार-बार प्रयोग करना: 

सामान्यतः यह देखा गया है कि पशुपालक, पशुचिकित्सक द्वारा एक बार दी गयी एन्थेल्मेन्टिक दवा को बार-बार परजीवियों की रोकथाम के लिये प्रयोग में लाते रहते है । इस प्रकार लम्बे समय तक एक ही दवा के प्रयोग से परजीवियों में उस एक दवा के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न हो जाता है । और वह दवा कारगार नहीं रह जाती । 

2. दवा की उचित मात्रा प्रयोग में न लानाः 

डीवर्मिग के लिये दवा की उचित मात्रा का जानवरों के अनुपात में प्रयोग न करने से कुछ परजीवी खत्म नहीं हो पाते है । जिससे लम्बे समय में वह दवा अपनी कारगरता में कम हो जाती है । 

3. परजीवी रोगों की उचित जानकारी न होनाः 

किसान अपने पशुओं को दस्त बुखार या अन्य छोटी-मोटी बीमारियों में बिना पशुचिकित्सक से सलाह लिये एन्थेल्मेन्टिक दवा दे देते है इस प्रकार दवा के प्रयोग से एन्थेलमेन्टिक प्रतिरोध को बढ़ावा मिलता है । 

4. डीवर्मिग की दर:

वैज्ञानिक खोजों से पता चलता है कि साल में दो या तीन डीवर्मिग, परजीवियों की रोकथाम के लिये उपयुक्त है । इससे अधिक बार डीवर्मिग करने से प्रतिरोध उत्पन्न होता है । 

5. सही प्रकार से दवा न पिलाना: 

एन्थेल्मेन्टिक दवा को देते समय ध्यान रखना चाहिये कि दवा की नली जीभ के    पिछले सिरे पर हो, दवा पिलाने से पहले जानवर को चारा न खिलाया गया हो, दवा की सही मात्रा दी गयी हो आदि । इस प्रकार दवा देने से जानवर के शरीर में दवा सही मात्रा में पहुुॅचती है । एवं मौजूद परजीवियों को मारकर उनमें प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न नहीं होने देती । 

6. भेड़ एवं बकरियों का साथ में पालना: 

बकरियों में उपापचय दर अधिक होने के कारण उनमें एन्थेल्मेन्टिक दवायों का उपापचय भेड़ों की तुलना में जल्दी होता है । जिस कारण बकरियों को दवा की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है जिससे दवा की कमी में मौजूद परजीवी जल्द ही प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न कर लेते है । 

एन्थेल्मेन्टिक प्रतिरोधकता को रोकने वाले उपाय:

1. एन्थेल्मेन्टिक दवायों का बारी-बारी से प्रयोग- जानवरों की डी वार्मिग के लिये हर साल अलग प्रकार की दवायें दी जाये ताकि किसी एक दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न न हो । 

2. दवा की उचित मात्रा का प्रयोग- उचित मात्रा में दवा देने से मौजूद परजीवी पूर्णतः नष्ट हो जाते है । और उनमें प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न नहीं हो पाती ।

3. बीमार जानवर का पशुचिकित्सक द्वारा उचित परीक्षण कर लेने के पश्चात ही उसकों दवा दी जाये । मानसून शुरू होने से पहले व बाद में इन दवायों का प्रयोग करना लाभदायक होता है । 

4. भेड़ एवं बकरियों को अलग-2 पालने से भी एन्थेल्मेन्टिक प्रतिरोधकता को रोकने में सहायता होती है । 

5. पशुओं के परजीवियों में एन्थेल्मेन्टिक प्रतिरोध की समय-2 पर जॉच करवानी चाहिए । इसके लिये किसान जानवरों का गोबर पशुचिकित्सक के पास भेज सकते है । 

इस प्रकार हम देखते है कि कुछ छोटी परन्तु आवश्यक बातों को ध्यान में रखकर हम एन्थेल्मेन्टिक प्रतिरोध जैसी भयावह स्थिति को समय रहते रोक सकते है । इसके लिए पशुचिकित्सकों के साथ-साथ किसानों को भी जागरूक होना आवश्यक है ।