कैनाइन डिस्टेंपर

   कैनाइन डिस्टेंपर बहुत संक्रामक और  घातक बीमारी विषाणुजनित  रोग है। यह  वीषाणु  मुख्य रूप से श्वानों में श्वसन, जठरांत्र, तथा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र सहित कई प्रणालियों को प्रभावित करता है। आमतौर यह  वीषाणु कम आयु के श्वानों  को प्रभावित करता है, जिनका टीकाकारण नही हुआ हो|  

कारक: कैनाइन डिस्टेंपररोग  पैरामाइक्सोवायरस नामक विषाणु से होता   है और यह खसरा और रिन्डरपेस्ट वीषाणु से निकटता संबंधित है। 

संचरण: इस बीमारी  का संक्रामण श्वान ने  तीन तरीके से हो सकता हैं:-

  • संक्रमित श्वान  या वस्तु के साथ सीधे संपर्क के माध्यम से
  • संक्रमित वायु संपर्क के माध्यम से
  • माँ की नाल के माध्यम से

लक्षण: श्वान मे इसके मुख्य लक्षण तेज बुखार, आंख व नाक से पानी निकलना, उल्टी करना व दस्त लगना, खुर की गद्दी व नाक का सख्त होना, दौरा पड़ना व अंततः लकवा हैं। इसमें ज्यादा मृत्युदर एक साल से छोटे श्वानों  में होती है, जिनमें ज्यादातर न्यूमोनिया व मस्तिष्क शोथ पाया जाता है|   जठरांत्र (Gestro intertinal) व श्वसन (Repiratory) विकार में नाक से स्राव निकलना, उल्टी व दस्त होना, शरीर में पानी की कमी होना, मुंह से थूक व झाग निकलना, खांसी करना, जोर से सांस लेना व अंततः वजन का घटना मुख्य लक्षण हैं।

कुछ श्वानों मे यह वीषाणु  न्यूरोलॉजिकल विकार  विकसित करते है। जिसके संकेत निम्नलिखित हैं- 

  • मांसपेशियों में नियंत्रणविहीन झटके लगना
  • मुंह से अत्यधिक लार निकलना 
  • जबड़े की अत्यधिक हरकत होना,
  • दौरे पड़ना
  • खुर की गद्दी व नाक का सख्त हो जाना 

  कई श्वानों मे रोग से टीक होने के पश्चात भी शरीर की कुछ मांसपेशियों में झटके आते रहते हैं, जिनकी गंभीरता समय के साथ कम हो सकती है, परंतु खत्म नहीं हो सकती है।  

उपचार: इस बीमारी का एकमात्र इलाज इससे बचाव में ही है|  जिसमें कुत्ते का टीकाकरण होता है।  श्वान  को   नियमित  टीकाकरण करवे| अपने श्वान  को संक्रमित जानवरों और वन्यजीवों से दूर रखें| इसका पहला टीका 6 सप्ताह की आयु मे लगाया जाता है, बूस्टर  3 सप्ताह के अंतराल मे 16 सप्ताह की आयु तक लगाया जाता हैं| इसके बाद प्रतिवर्ष इसका टीकाकारण नियमित रूप से किया जाता है|