कैनाइन पार्वोवायरस रोग

कैनाइन पार्वोवायरस (CPV) संक्रमण एक अत्यधिक संक्रामक वीषाणु  बीमारी है जो श्वानों  को प्रभावित करती है। छह सप्ताह से छह महीने के बीच के युवा श्वान,  अनियमित  टीका/ बिना टीका वाले श्वानों को सबसे  अधिक जोखिम  होता हैं|

कारक: कैनाइन परवोवायरस टाइप 2 (CPV-2)

संचरण:  कैनाइन पार्वोवायरस का  संक्रमण निम्नलिखित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संपर्क के माध्यम से हो सकता हैं:

  • यह विषाणु सीधे एक श्वान  से दूसरे को फैल सकता है|  
  • संदूषित वातावरण और मलमूत्र के संपर्क से भी  फैल सकता है। 
  • यह संदूषित सतहों जैसे भोजन व पानी के बर्तनों, विश्राम की जगहों, कपड़ों आदि से भी फैल सकता है। 

लक्षण

वीषाणु  दो अलग-अलग रूपों में बीमारी प्रकट करता है।अधिक सामान्य रूप आंतों का रूप है, जो उल्टी, दस्त, वजन घटाने और भूख की कमी (एनोरेक्सिस) की विशेषता है। कम सामान्य रूप हृदय रूप है, जो भ्रूण की हृदय की मांसपेशियों और बहुत युवा पिल्लों पर हमला करता है, जो अक्सर मौत का कारण बनता है

कैनाइन परवोवायरस टाइप 2 (CPV-2) युवा और  वयस्क स्वानों  के जठरांत्र संबंधी मार्ग पर हमला करता है। पार्वोवायरस के लक्षण इस प्रकार हैं:

  • सुस्ती या आलस
  • भूख न लगना
  • बुखार
  • उल्टी
  • निर्जलीकारन 
  • खूनी पेचिश
  • यह बहुत कम आयु के श्वानों की हृदय की मांसपेशियों को प्रभावित करता है जिसके कारण श्वान  की मृत्यु हो सकती हैं|

उपचार: इस रोग का कोई प्रभावी उपचार नही है किन्तु सकेतिक लक्षणो के अनुरूप उपचार व सहायक देखभाल लाफदायक होता हैं|

बचाव

  • पार्वोवायरस से बचाव का सबसे अच्छा उपाय टीकाकरण है। अपने श्वान  को जल्द से जल्द इस बीमारी के खिलाफ टीका लगवाएं। इसका पहला टीका 6 सप्ताह की आयु मे लगाया जाता है, बूस्टर  3 सप्ताह के अंतराल मे 16 सप्ताह की आयु तक लगाया जाता हैं| इसके बाद प्रतिवर्ष इसका टीकाकारण नियमित रूप से किया जाता है|
  • समय समय पर  पशु चिकित्सक की सलाह लें और परामर्श के अनुसार समय-समय पर उसे ज़रूरी बचाव मुहैया कराएं।