कोविड 19 महामारी के दौरान दुधारू पशुओं में प्रजनन ॠतु पूर्व तैयारी एवं देखभाल

आज एक या दो राष्ट्र ही नहीं वरन् संपूर्ण विश्व कोविड – 19 महामारी के कठिन दौर से गुजर रहा है | भारत जैसे विकासशील राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की तो इस महामारी ने कमर ही तोड़ दी है |  पशुपालक राष्ट्र का एक महत्वपूर्ण तबका है और हमारा यह परम कर्तव्य है कि हम ध्यान रखें कि इस महामारी का पशुपालकों की आय पर कोई भी नकारात्मक प्रभाव ना पड़े | पशुपालकों की सतत् आय तभी संभव है जब उनके पशु दूध देंगे और वे तभी दूध देंगे जब वे गाभिन होने के उपरान्त किसी नवजात को जन्म देंगे |  यह हम सभी जानते हैं कि पशु प्रजनन ॠतु में ही गाभिन होते हैं और इसके लिए उनका इस काल में पूर्णतः स्वस्थ रहना आवश्यक है |  अत: हमारे पशुपालक भाइयों को चाहिए कि वे प्रजनन  ॠतु के पूर्व ही अपने पशुओं की देखभाल इस तरह से करें कि उनके पशु प्रजनन ॠतु के समय पूर्णतः स्वस्थ रहें, ज्यादा से ज्यादा गाभिन हों तथा नर एवं मादा दोनों की ही जनन क्षमता बरकरार रहे |  

प्रजनन ॠतु वह काल होता है जिसमें पशु (दुधारू पशु) मद / ॠतु  / प्रजनन चक्र में आता है, उसमें ॠतु के लक्षण दिखाई देते हैं तथा गर्भाधान के उपरांत वह गाभिन हो जाता है | सामान्यतः यह ॠतु सितंबर से फरवरी माह  तक रहती है | प्रजनन ॠतु से पूर्व पशु पालकों को चाहिए कि वे अपने पशुओं को  उच्च गुणवत्ता का संतुलित पौष्टिक आहार देवें | साथ ही उनकी साफ – सफाई का विशेष ध्यान रखें क्योंकि कई रोग ऐसे होते हैं जो कि स्वच्छता की कमी के कारण फैलते हैं | अत: पशुपालकों को नियमित पशुओं को स्नान कराना चाहिए | उन्हें बाह्य परजीवी जैसे जूएं, किलनी, गिंगोड़े इत्यादि से मुक्त रखने में नियमित साफ – सफाई कारगर सिद्ध होगੀ | दुधारू पशुओं के ਿपछल॓ हिस्से जैसे कि ॲাचल, थन, पीछे के दोनों पैर आदि की सफाई विशेष रूप से करनी चाहिए जिससे दूध में कोई कचरा ना गिर सके | बाड़े की सफाई भी नियमित करें | प्रजनन ॠतु के पूर्व पशुपालकों को चाहिए कि वे अपने पशुओं को कृमिनाशक देवें | इस हेतु प्याज तथा लहसुन का मिश्रण दे सकते हैं | इसके अलावा नीम की पत्तीयां भी खिलायी जा सकतीं हैं | इसके साथ ही पशुओं की खनिज की जरूरतों को भी पूरा किया जाना आवश्यक है | इसके लिए खनिज लवण की ईंट को बाड़े में जगह – जगह पर लटका देवें जिससे पशु उसको चाट सके और इस तरह से उसकी खनिज की आवश्यकता पूरी हो जाए | कैल्शियम की कमी की पूर्ति के लिए पानी की टंकी को चूने से पुतवा दें |आजकल बाज़ार में खनिज मिश्रण के तैयार पैकेट भी आते हैं जिन्हें 50 – 100 ग्राम प्रतिदिन प्रति पशु को दे सकते हैं |

जब भी पशु ॠतु में आएं तो पशुपालक पहचान लेवें कि उनका पशु ॠतु में आ चुका है | इसके लिए ॠतु के लक्षण जानना आवश्यक है जो कि इस प्रकार हैं – योनि मार्ग से पारदर्शी स्त्राव, मादा पशु का बार – बार पेशाब करना, ज्यादा रंगाने, मादा गाय का दूसरी मादा या सांड़ को अपने ऊपर चढ़ने देना  और इस समय उसका शांत खड़ी रहना, जननांग पर सूजन तथा उसका लाल होना, बैचेनी, खाने – पीने और दुग्ध उत्पादन में कमी इत्यादि |

कृत्रिम गर्भाधान का उचित समय मद के समय के अनुसार निर्धारित किया जाता है | यदि पशु सुबह ॠतु में आता है तो शाम को और यदि वह शाम को ॠतु में आता है तो सुबह कृत्रिम गर्भाधान किया जाना चाहिए | यदि कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो अच्छी नस्ल के पूर्णतः स्वस्थ सांड़ से प्राकृतिक समাगम भी करवाया जा सकता है |

उपरोक्त बातों का ध्यान रखकर हमारे पशुपालक भाई अपने पशुओं को नियमित गाभिन करा कर बछड़ा या बछिया सही समय पर प्राप्त कर अधिकाधिक दुग्ध भी प्राप्त कर सकते हैं और इस कोविड – 19 महामारी के कठिन दौर में भी मुनाफा कमा सकते हैं |

डॉ एन. के. बजाज ( सहायक प्राध्यापक, पशु मादा एवं प्रसूति विज्ञान विभाग)