गठिया चर्म रोग  (लम्पी स्किन डिसीज)

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यह एक विषाणु जनित संक्रामक विस्फ़ोटिय घातक बीमारी है जो मवेशियों  में त्वचा एवं शरीर के अन्य हिस्सों में गांठों के रूप में परिलक्षित होती है एवं द्धितीयक जीवाणु संक्रमण के कारण इसमें अन्य लक्षण पाए जाते हैं। परंपरागत रूप से यह रोग दक्षिण एवं पूर्व अफ़्रीकी देशों में पाया जाता है परन्तु १९७० के दशक में इसने पश्चिमी अफ्रीका में विस्तार किया तथा २००० के बाद यह रोग मध्य पूर्व के कई देशों जैसे तुर्की इत्यादि में भी फ़ैल गया। मध्य प्रदेश में भी यह रोग तेजी से अपने पैर पसर रहा है एवं उड़ीसा एवं छत्तीसगढ़ के रास्ते शहडोल, उमरिया, डिंडोरी, रीवा, मंडला सिवनी एवं जबलपुर से होते हुए प्रदेश के पश्चिमी हिस्सों की और अग्रसर है।  

कारण :

  • यह रोग भेड़ों के माता रोग से सम्बंधित कैप्रीपॉक्स विषाणु से सम्बंधित है एवं निथलिंग पॉक्स विषाणु द्वारा जनित रोग है एवं अक्सर महामारी या छिटपुट रूप में प्रकट होता है।  
  • प्रायः यह रोग गर्म एवं आर्द्र जलवायु वाले इलाकों में पाया जाता है तथापि सर्दियों में भी यह रोग पाया जा सकता है। इस रोग का प्रसारण काटने वाली मक्खी , मच्छर व किलनी इत्यादि के माध्यम से होता है। 
  • निचले एवं जल जमाव वाले क्षेत्रों में काटने वाले कीड़ों की अधिकता के कारण  खासकर जहाँ रोग प्रसार से बचाव हेतु संगरोध का पालन नहीं किया जाता है, वहाँ इस रोग का प्रकोप अधिक पाया जाता है. 
  • संक्रमित पशु की लार एवं अन्य स्राव में भी विषाणु  की उपलब्धता के कारण संसर्गीय संक्रमण भी संभव है।

लक्षण :

  • विषाणु के शरीर में प्रथम प्रवेश एवं प्रथम लक्षण परिलक्षित होने की अवधि (ऊष्मायन काल) ४ से १४ दिन तक हो सकता है।इस रोग में रोग प्रभावन दर ५ से ५० प्रतिशत तक होती है परन्तु मृत्युदर बहुत ही कम (१ से ५ प्रतिशत) होती है। 
  • सर्वप्रथम चमड़ी के नीचे दर्दनाक सूजन एवं इसके बाद तीव्र ज्वर (४१ डिग्री  सेo / १०६ डिग्री फ़ाo ), आँखों एवं नाक से स्राव, एवं अत्यधिक लार का निर्माण होता है। 
  • इसके पश्चात् शरीर के अन्य हिस्सों के साथ साथ त्वचा में विशेष रूप से चकत्ते/ गांठें उभारित होते हैं तथा दुधारू पशुओं के दुग्ध उत्पादन क्षमता में भारी कमी आती है।  
  • गांठें अच्छी प्रकार से परिचालित, गोल, थोड़ा उभरे हुए दृढ़ एवं दर्दनाक होती हैं एवं त्वचा के अलावा जठरांत्र अथवा श्वसन तंत्र में, थूथन पर, नासिका नली अथवा मुख की श्लेष्मा झिल्ली पर भी पाई जा सकती  हैं जिनमें कठोर भूरा अथवा पीलापन लिए ऊतक /मवाद पाया जा सकता है।  
  • क्षेत्रीय लिम्फ गंथियों में सूजन के अलावा थान, अयन, कंठ-कम्बल, अंडकोष, योनि एवं पैरों में भी सूजन पायी जा सकती है जिसके कारण  पशु चलने फिरने में असमर्थता दिखाता है एवं दुर्बल होता जाता है।  
  • कभी कभी द्धितीयक जीवाणु संक्रमण भी संभव है जिसके फलस्वरूप गांठों में मवाद निर्माण तथा त्वचा विलगन भी पाया जा सकता है। कभी कभी इन गांठों में मक्खियों द्वारा अंडे देकर कीड़े भी पड़ने की सम्भावना होती है।  
  • कालांतर में ये गांठें ठीक हो जाने के पश्तात त्वचा में परिगलन के परिणामस्वरूप कठोर उभरे हुए क्षेत्रों के रूप में दिखाई देती हैं एवं त्वचा से अलग होने के बाद एक घाव, तत्पश्चात एक निशान छोड़ जाती हैं।  
  • घातक संक्रमण से पूरी तरह से रोगमुक्त होने में काफी लम्बा समय लगता है तथा द्धितीयक निमोनिआ, थनैला, त्वचा की गांठों में कीड़े पड़ना, त्वचा में गहरे छिद्र बनना  आदि पाया जा सकता है। 
  • इसके अतिरिक्त, गाभिन पशुओं में गर्भपात एवं तत्पश्चात कई महीनों तक मद-चक्र (गर्मी) में न आने की समस्या भी आ सकती है।
  • दुग्ध उत्पादन एवं शारीरिक भार में कमी, मरणोपरांत चमड़े की गुणवत्ता में कमी  एवं  चिकित्सा में होने वाले व्यय के कारण पशु पालकों को आर्थिक नुकसान  झेलना पड़ता है।

उपचार एवं बचाव :

  • इस रोग के नियंत्रण हेतु कोई विशिष्ट उपचार उपलब्ध नहीं है। द्धितीयक जीवाणु संक्रमण को नियंत्रित करने हेतु प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) दवाओं का उपयोग किया जाना चाहिए एवं पशुओं की उचित देखभाल की जानी आवश्यक है। 
  • घावों में भी रोगाणुरोधक (एंटीसेप्टिक) दवाओं का उपयोग किया जाना चाहिए ताकि द्वितीयक जीवाणु संक्रमण से बचा जा सके तथा घाव फूटने के उपरांत कीड़े पड़ने से रोकने हेतु मक्खी रोधी दवाओं का उपयोग समुचित है। 
  • रोगी पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें तथा रोग संचरण वाले क्षेत्रों से पशुओं का आवागमन प्रतिबंधित होना चाहिए।  
  • रोग संचरण को रोकने हेतु मक्खी मच्छर एवं किलनियों की रोकथाम के उपाय करना आवश्यक है। 
  • पशुओं के बाड़े में विसंक्रामक (डिसइंफेक्टेंट) दवाओं का छिड़काव भी कराना उपयोगी होगा।  
  • देशी चिकित्सा के रूप में फूटी चर्म गांठों में हल्दी एवं तेल का  अथवा नीम की पतियों को पीस के लेप कर सकते हैं। समय समय पर पशुओं को नीम की पत्तियाँ डालकर उबाले हुए पानी से स्नान करने से भी रोग संचरण रोकना संभव होता है।
  • रोकथाम हेतु सजीव समजातीय एलएसडी विषाणु टीका  लगाया जा सकता है जो अभी वर्तमान में भारत में उपलब्ध नहीं है। भेड़ बकरियों में प्रयुक्त सजीव विषमजातीय माता रोग निष्क्रियित टीका भी उपयोग में लाया जा सकता है।