गायों में थन की संरचना एवं महत्‍व

दूध अपने आप में एक पूर्ण पौष्टिक आहार है तथा भारत में गायों का पालन मुख्‍य रूप से दुग्‍ध उत्‍पादन हेतु किया जाता है। गायों की स्‍तनग्रंथियों को सम्मिलित रूप से थन भी कहते हैं। थनों का संक्रमण सीधे उत्‍पादकता पर प्रभाव डालता है। दुग्‍ध उत्‍पादक पशुओं में उत्‍पादकता मुख्‍य रूप से उनकी नस्‍ल, आयु, दुग्‍ध उत्‍पादन की अवधि एवं स्‍तन ग्रंथियों अथवा थन की संरचना पर निर्भर करती है। अनुभवी व्‍यक्ति स्‍तनग्रंथियों की बाह्य संरचना को देखकर सटीक अनुमान लगा सकते हैं कि गाय उच्‍च दुग्‍ध उत्‍पादक है अथवा निम्‍न दुग्‍ध उत्‍पादक। 

थनों का विकास – थनों का विकास भ्रूणावस्‍था में ही प्रारंभ हो जाता है। जन्‍म के समय नर एवं मादा में अति अल्‍प विकसित स्‍तन ग्रंथियां पायी जाती हैं। धीरे-धीरे आयु में वृद्धि के साथ मादा में हार्मोन्‍स के प्रभाव से थनों का विकास होने लगता है। 

थन की बाह्य संरचना – गाय में चार स्‍तन ग्रंथियां पाई जाती है यह ग्रंथियां पेल्विक क्षेत्र में पायी जाती हैं जो दाएं एवं बाएं हिस्‍से में विभाजित हैं। प्रत्‍येक अर्द्धभाग दो स्‍तन ग्रंथियों द्वारा बना होता है। प्रत्‍येक स्‍तनग्रंथि का अग्रभाग कोन के आकार का होता है जिसे स्‍तनाग्र अथवा टीट कहते हैं। इसकी बाह्य त्‍वचा अत्‍यंत चिकनी होती है। स्‍तनाग्र का आकार थन के आकार से प्रभावित नहीं होता है अर्थात बहुत बड़े थन का स्‍तनाग्र भी बहुत बड़ा हो यह आवश्‍यक नहीं है। 

थन की आंतरिक संरचना – स्‍तन ग्रंथियां त्‍वचा से विकसित होती है। प्रत्येक स्‍तन ग्रंथि एक दूसरे से अलग होती है। स्‍तन ग्रंथियां शरीर के साथ त्‍वचा एवं संयोजक ऊतक के विकसित तंत्र द्वारा जुड़ी हुई होती हैं। संयोजक ऊतक का यह तंत्र प्रत्‍यके अर्द्धभाग को एक दूसरे से विभाजित करता है। थन की आंतरिक संरचना ग्रंथि ऊतक, वसा एव संयोजक ऊतक से मिलकर बनी होती है। थन में ग्रंथि ऊतक कोष्ठिकाओं के रूप में समायोजित होती है। 

थनों में रक्‍त एवं तंत्रिका प्रवाह – थनों में रक्‍त का प्रवाह अत्‍यंत आवश्‍यक है। दूध निर्माण हेतु आवश्‍यक पदार्थ रक्‍त वाहिकाओं द्वारा कोष्ठिकाओं तक पंहुचाए जाते हैं। लगभग 1 युनिट दूध निर्माण हेतु 400-500 युनिट रक्‍त की आवश्‍यकता होती है अथवा 1 लीटर दूध निर्माण हेतु लगभग 500 लीटर रक्‍त थनों से प्रवाहित होता है। थनों को रक्‍त फीमोरल धमनी की एक्‍सटर्नल प्‍यूडेंटल धमनी द्वारा, प्‍यूडिक धमनी एवं पेरिनियल धमनी द्वारा होती है।   

              C:\Users\ACER\Desktop\r746198_6145847.jpg

थनों में रक्‍त प्रवाह

उच्‍च उत्‍पादकता वाले पशुओं में थन की संरचना – 

  1. उच्‍च उत्‍पादकता वाले जानवरों में स्‍तन ग्रंथियों/थन का आकार अपेक्षाकृत बड़ा होता है (लगभग 50 किलोग्राम वजन से भी भारी हो सकते हैं दूध से भरे हुए थन)। 
  2. पीछे से देखने पर पिछले पैरों के बीच में थन का आकार उभरा हुआ होता है जिसे मिल्‍क मिरर (दूध प्रतिबिंब) के रूप में भी जाना जाता है।
  3. दुग्‍ध शिरा अत्‍यंत विकसित होती है साथ ही इसके शरीर में प्रवेश करने वाले स्‍थान (मिल्‍क वेल) का आकार भी बड़ा होता है। 
C:\Users\ACER\Desktop\EW9TXC.jpg

मिल्‍क मिरर

थन का रखरखाव – उत्‍पादन की दृष्टि से थन अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण अंग हैं। अत: इसका उचित  रख-रखाव अत्‍यंत आवश्‍यक है। थन का संक्रमण थनैला कहलाता है। दूध दोहने के पहले एवं बाद में थन को अच्‍छे से एंटीस¢fIVd द्वारा धोना चाहिए।