गैावंशीय पशुओं मेंरक्त स्त्रावी संेप्टिसीमिया (गलघोंटू ,पाश्चुरोलोसिस, शिपिंग फीवर)ः प्रसारण, लक्षण तथा रोकथाम
रोग कारक- यह एक बहुत ही संक्रामक जीवाणु जनित बिमारी है,जो कि पश्चुरैला मल्टोसिड़ा नामक जीवाणु से होती है। यह जीवाणु ग्राम निगेटिव, अवायुजीवी होता है। व दोनो सिरों पर अभिरजित होती है।


यह बिमारी मुख्य रूप से और गौवंषीय पशुओं मे होती है। 6महीने से 2 साल के बछड़े सबसे ज्यादी संवेदी होते है। इसके अलावा भेड़,बकरी,सुअर,घोडे़ और ऊँटों मे भी यह बिमारी पाई जाती है। कुछ जंगली जानवरो में भी यह बिमारी कभी -2 पाई गई है।


फैलाव – यह रोग इन प्राणियों में अधिक होता है जो अधिक कार्य करने से,लम्बी दूरी तक परिवहन,मौसम मे अचानक परिवर्तन के कारण तनाव में आ जाते है। बरसात के मौसम मे यह बिमारी सबसे ज्यादा होती है। इस रोग के जीवाणु सवंमित पशु के लार में होते है। लार के द्वारा ये खादय पद्रार्थो में पहॅुचते है।


रोग के लक्षण – निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर इस बिमारी को पहचान जा सकता है।
(1) उच्च तापमान (105-107 डिग्री फारनेहाइड)
(2) षरीर में लगतार कपकंपी होती है।
(3) सीने,गले और व्रिस्केट क्षेत्र मे सूजन होती है।
(4) साॅस लेने में कठिनाई होती है।
(5) अत्यधिक लार स्त्रावण और आॅखों से,नाक से लगातार संक्रमित पानी गिरता रहता है।
(6) साॅस लेने के दौरान घर्र -घर्र की ध्वनि सुनाई देती
(7) जीभ का बार -बार बाहर निकलना ।
(8) षरीर के ष्लेश्म झिल्लियाॅ लाल हो जाता है।

उपचार – वयोकि यह बहुत तीक्ष्ण प्रकृति की बिमारी है। इसलिए रोग होने पर तुरंत उपचार करना चाहिए। उपचार मे देरी होने पर विमार पशु को बचाने में मुष्किल होती है। फिर भी समय रहते निम्न प्रकार से उपचार किया जा सकता है। अधिक मात्रा मे एंटीवायोटिक देना चाहिए । जैसे कि -आक्सीटेट्रासाइक्लिन 5-10मि.ग्रा./कि.षरीर के भार के अनुसार ए
सल्फोनामाइड-जैसे सल्फााडिमिडीन -130-150मि.गा्र./वि.षरीर के भार के अनुसार प/अ नस में
इसके अलावा लक्षणत्मक उपचार जैसे एंटीइनफलोमट्री -दवाई जैसे बिटामेथाजोन,या डेक्सामेथाजोन-1 मि.ग्रा./कि.ग्राम षरीर के भारानुसार देना चाहिए।

रोकथाम व बचाव-
क्योंकि यह बहुत ही संक्रामक बिमारी है,इसलिये रोग को स्वस्थ्य जानवर में फैलने से बचाने के लिए रोगी पशु का रख -रखाव अलग कर देना चाहिए ।रोगी पशु का बचा हुआ पानी और खादय पदार्थ स्वस्थ पशु को कभी नही देना चाहिए । तथा रोगी पशु की मृत्यु हो जाने पर षव का उचित निस्तारण करना चाहिए। पशुषाला में निर्जमी कारकों का छिडकाव करना चाहिए । इस रोग के रोकथाम व बचाव का सबसे अच्छा तरीका है। पशु का हर साल 3 माह की उम्र से लेकर टीकाकरण करना चाहिए।