गैावंशीय पशुओं में खुरपका एवं मुंहपका रोगः प्रसारण, लक्षण तथा रोकथाम

यह बहुत ही संक्रामक व छूत से फैलने वाली विमारी है जो कि पिकौर्नाविरिडी कुल के, RF II विषाणु से होता है । जिसके छः विषाणु स्ट्रेन होते है। जैसे कि, O, A, C, SAT-1, SAT-2 SAT-3 और एशिया-1 (भारत मे मुख्य रूप से O, और एशिया-1 विषाणु की प्रवृत्ति या स्ट्रेन पाये जाते है। मुख्य रूप से O स्ट्रेन इसके बाद एशिया-1। यह विमारी सभी विभाजित खुरों वाले पशुओं व सुअरों मे पाई जाती है। 

प्रसारण-

  1. इस रोग का विशाणु संक्रमित पशु के स्त्रावों जैसे लार, मल-मूत्र ,दुग्ध आदि से बाहर निकलता है। 
  2. स्वस्थ पशु में यह रोग संक्रमित पशु के सम्पर्क में आने से । 
  3. संक्रमित खाद्य पदार्थ व पानी से । 
  4. संक्रमित पशु के सास द्वारा (ऐरोसोल प्रसारण) 
  5. संक्रमित सास से व मनुश्यो द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक । 
  6. कुछ कीट भी इस रोग को प्रसारित या फैलाने के माध्यम का कार्य करते है। 

लक्षण – इस रोग की पहचान निम्न लक्षणों के आधार पर किया जा सकता है। 

1. पशु के षरीर का तापमान अधिक हो जाना (101-104 डिग्री फारनेहाइड)

2. अत्यधिक लार स्त्रावण जो कि रस्सी की तरह मुह से जमीन तक लटकी रहती है। 

3. दुग्ध उत्पादन मे कभी आ जाना। 

4. मुख गुहा, जीभ और ओठों मे छाले हो जाते है। 

5. मुख के साथ पैरों पर खुरो के बीच व थनों मे भी छाले पाये जाते है। 

6. पैरो के छालों के फटने पर पशु को दर्द होता है। और वह लगड़ाकर चलता है या चल नही पाता। 

7. छालों के फूटने पर,मुख और पैरो मे फफोले में बदल जाते है। और इनमें कीडे़ पड़ जाने पर घाव हो सकता है। 

8. थनों मे संक्रमण होने से थनैला हो जाता है। 

9. गर्भित मादा पशुओं मे गर्भपात हो जाता है। 

10. युवा पशुओं मे इस रोग मे हद्रय प्रभावित होता है । अतः युवा पशुओं मे मुख्य लक्षण – 1. सांस लेने मे परेशानी 2. चक्कर आना 3. अनियमित हद्रय दर 4. अंत मे युवा पशुओं की मौत हो जाती है। 

उपचार –

क्योकि यह रोग विषाणु जनित रोग है, अतः इस रोग का कोई पक्का उपचार नही है। फिर लिए प्रतिजैविकवीय संक्रमण को रोकने के लिए प्रतिजैविक औषधियों जैसे – आक्सीटैन्द्रासाइक्लिन, जैटोमाइसिन आदि का उपयोग करना चाहिए । इसके अलावा कुछ कुछ, लक्षणात्मक और सहारात्मक उपचार भी करना चाहिए। जैसे- संक्रमित पशु के छालों को 1 प्रतिशत पोटेशियम परमैन्गेट घोल से धोकर बोरोग्लिसरीन लगाना चाहिए। 

पैरो के छालों के लिए सबसे पहले खूरों से गंदगी हटाकर 1 प्रतिशत फिनाइल से साफ करना चाहिए। खूरों के बीच या सावों पर प्रतिजैविक पाइडरों जैसे – बोरिक एसिड,या जिंक का छिड़कात करना चाहिए। यदि पैरो मे कीडे़ पड़ गये हो तो तारवीन का तेल,व कपूर, या नीम का तेल या फिनाइल लगाने  से कीडे़ मर जाते है। 

रोकथाम व बचावः- यह एक संक्रामक, छूत का रोग है। अतः इस रोग का रोकथाम के लिए, निम्नलिखित उपाय करना चाहिए। 

1. सबसे पहले रोगी पशु को स्थस्थ पशु से अलग कर देना चाहिए। 

2. संक्रमित पशु को खान-पान की अलग व्यवस्था करना चाहिए। 

3. संक्रमित पशु को पानी पिलाने के लिए गाव के तालाब, या नदियों मे नही ले जाना चाहिए। 

4. गावो मे नये पशु को खरीदकर लाने के पहले उसका टीकाकरण करना चाहिए। 

5. संक्रमित पशु को निकट किसी भी गाव मे नहीले जाना चाहिए। 

6. जिस भी क्षेत्र में यह रोग हुआ हो वहा से 6 महीने तक कोई पशु नही खरीदना चाहिए। 

7. ऐसे मादा पशु संक्रमित जिनके दूध पीने वाले बछडो हो उसे दूध पीने के नही छोडना चाहिए।

8. इस रोग से प्रभावी ढंग से गचाव के लिए पशु का टीकारण करना आवष्यक है।