गौवंशीय पशुओं में पथरी एक समस्या (यूरोलिथियेसिस)

आॅब्स्ट्रक्टिव यूरोलिथियासिस मूत्र मार्ग में कहीं भी पथरी के होने के बाद होता है। इस बीमारी के कारण पशुधन उद्योग को भारी आर्थिक नुकसान होता है । मूत्र मार्ग में पथरी का बनना एक गंभीर स्थिति होती है, जो आमतौर पर नर गौवंशीय पशुओं में, होती है। इस बीमारी के निदान हेतुु कई सर्जिकल तकनीकें एव ं उपचार उनके गुणांे और अवगुणों सहित साहित्यों मंे वर्णित हैं।

जुगाली करने वाले पशुओं में नर हो या मादा पथरी की समस्या सामान्य रूप से होती है लेकिन नर में यह समस्या अत्यधिक होती है। नर पशुओं के मूत्र मार्ग के अगले भाग में पथरी का होने की समस्या मुख्य रूप से छोटे जुगाली करने वाले पशुओ ं जैसे बकरो,ं भैड़ोे आदि में अधिक होती है।

बड़े जुगाली करने वाले पशुओं जैसे बैल, सांड पाड़ा आदि में पथरी अधिकतर पेशाब की थैली में सामान्यतः पाई जाती है लेकिन ये गुर्दो के पेल्विस, पेशाब की थैली ग्रीवा या फिर मूत्र मार्ग (यूरेथ्रा) में भी पथरी हो सकती है। कई बार पथरी यूरिनरी ब्लैडर से निकलकर सिग्मोइड प्लेक्सर (मूत्र मार्ग का एक मुडा हुआ भाग) में होती है।

भारत देश में कुल मिलाकर 5.04 प्रतिशत पशु हर साल इस समस्या से पीड़ित होते हैं। स्पीशीज के हिसाब से देखा जाए तो बकरो ं मंे 49.83 प्रतिशत, गौवंशीय पशुओं मंे 32.87 प्रतिशत कुत्तों मंे 14.53 प्रतिशत, घोड़ों मंे 1.38 प्रतिशत, भेड़ों में 1.04 प्रतिशत एवं बिल्लियों में 0.3 प्रतिशत इंसीडेंट है।

पथरी होने के मुख्य कारण

पशुओं में पथरी बनने की समस्या बड़ी जटिल है व इसके लिए केवल कोई एक कारक उत्तरदाई नहीं होता है, इसमें बहुत सारे कारक शामिल होते हैं जैसे कि फिजियोलॉजिकल, न्यूट्रीशनल मैनेजमेंट, खनिज लवणों का असंतुलन आदि। जिस आहार में कैल्शियम में फास्फोरस एवं मैग्नीशियम की मात्रा अधिक होती है या फिर कैल्शियम और फास्फोरस का इंबैलेंस होता है ऐसे पशुओं में फास्फोरस की की पथरी होने की संभावना अधिक होती है। अत्यधिक मात्रा में दाने खिलाना और फाइबर युक्त डाइट नहीं देना, पानी कम पीना, शरीर में पानी की कमी, मूत्र का क्षारीयता होना, पानी में खनिज लवण की अधिकता, सोडियम बाइकार्बोनेट की आहार में अधिकता, विटामिंस का असंतुलन या फिर विटामिन की कमी या फिर प्रोटीन की अधिकता यह सभी कारण कहीं ना कहीं पथरी के निर्माण में सहायक होते हैं। नर भैंस, बैल या सांड जैसे पशुआंे में सिगमॉड प्लेक्सर जो कि यूरेथ्रा का एक मुड़ा हुआ भाग होता है, में पथरी होने की या रुकने की संभावना सर्वाधिक होती है। इसके अलावा इसचियल आर्क में भी पथरी होने की संभावना अधिक होती है।

शरीर में पथरी के निर्माण की प्रक्रिया

शरीर में पथरी का बनना और उसका मत्रू मार्ग मंेे रुकावट पैदा करना एक जटिल प्रक्रिया है और इसमें विभिन्न चरण शामिल होते हैं। सर्वप्रथम नीडुस (छपकने) बनते हैं यूरिन सान्द्रित होता है और अंत में यह लवण के साथ प्रक्रिया करके जमने लगता है और पथरी का निर्माण होनेे लगता है।

नैदानिक लक्षण (क्लीनिकल लक्षण)

पशुओं के पेशाब रुकने के शुरुआती लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं यह रुकावट किस स्तर की है। भूख ना लगना, जुगाली बंद कर देना, पानी कम पीना आदि प्रमुख कारण है जो मूत्र मार्ग में पथरी बनने के संकेत देते हैं। जब पशु को पथरी की शुरुआत होती है व पूरी तरह से मूत्र मार्ग मंे रुकावट नहीं होती तब बदूं-बदूं पेशाब गिरता है। कई बार जब पूरी तरह पेशाब रुक जाता है तो पशु का पेट फूलने लगता है और गोबर चिकना होने लगता है, पेट दर्द होता है, वजन कम होने लगता है, जानवर दांत पीसने लगता है, पशु और कई बार गुदा भी बाहर की तरफ आने लगती है। इसके अलावा एनिमल अपनी कमर को या रीड की हड्डी को उठा लेता है, पैर को भी सिकुड़ता और फैलाता है, पूछ घूमाता है, पेट में लात मारने की कोशिश करता है, पेट दर्द होता है। मूत्र पूरी तरह रुक जाने पर रक्त भी आने लगता है।

रक्त एवं मूत्र की जांच

लंबे समय तक पथरी होने व शरीर में पानी की कमी होने पर हीमोकन्संनट्रेशन या रक्त का गाढ़ा हो जाना, डिहाइड्रेशन की वजह से इसमें पीसीबी, टीएलसी, टीईसी आदि मानक बढ़ जाते हैं। न्यूट्रेफिल काउंट भी बढ़ जाता है व ल्यूकोसाइटोसिस भी संभवतः तनाव के कारण होती है। इसके अलावा यूरिमिया, ब्लड यूरिया नाइट्रोजन यह भी बढ़ जाता है, क्रिएटनीन की मात्रा भी ब्लड मंे बढ़ जाती है। क्रिएटनीन की माता बढ़ जाना पशु के गुर्दों की कार्य करने की क्षमता का घट जाना दर्शाता है। सामान्य रूप से क्रिएटनीन 0.8 से लेकर 1.4 मिलीग्राम प्रति डेसी लीटर रक्त में होता है अगर इससे यह लेवल बढ़ जाता है तो यह गुर्दांे में शराबी कोे दर्शाता है।

जैसे-जैसे पशु कमजोर होता है उसके मांसपेिशयां भी कमजोर होती है जिससे शरीर में प्रोटीन टूटता है और इस वजह से रक्त जांच में अल्कलाइन फॉस्फेटस की मात्रा भी बड़ी हुई होती है।

पथरी का रासायनिक विश्लेषण

पथरी के निर्माण का भौतिक एवं केमिकल सिद्धांत समझने के लिए केमिकल कंपोजिशन के अध्ययन की आवश्यकता होती है। पथरी के गुणात्मक अध्ययन से उसके विभिन्न अवयवों का पता चलता है। इस विश्लेषण के लिए विभिन्न प्रकार की तकनीक का इस्तेमाल की जाती है जैसे कि ऑप्टिकल क्रिस्टलोग्राफी, डिफरेटं शिएशन इंफ्रारेड स्पक्ेट्रास्ेकॉपी, एक्स-रे स्पक्ेट्रास्ेकापेी एवं थर्मोग्राविमेट्री आदि।

पथरी के मात्रात्मक मात्रात्मक अध्ययन के लिए विभिन्न तकनीक इस्तेमाल की जाती है जिसमें कि

डायगनोस्टिक इमेज यूरालिथियेसिस -यह अध्ययन रेडियोलॉजी एवं अल्ट्रासोनोग्राफी से यूरिनरी ट्रैक्ट इनफेक्शन, ग्रानुलोमेटिस यूरेटराइटिस, प्रॉस्टेटिक डिसीज, न्योपलासिया आदि का पता चलता है।

यूरोरेडियोलोजी- इस अध्ययन से पथरी के विशेष गुणों का पता चलता है।

अल्ट्रासानोग्राफी -यह एक तकनीकी है जिससे यूरोलिायसिस की लोकेशन का पता चलता है, ब्लैडर की स्थिति क्या है वह पता लग जाती है। यह एक सुरक्षित तकनीकी है इसमें आयनाइजेशन का उपयागे नहीं होता है। पथरी का आकार प्रकार और संरचना और यूरिनरी ब्लैडर में उसकी लोकेशन सिस्टर सोनोग्राफी से पता की जा सकती है साथ ही मूत्र यूरिनरी ब्लैडर कि मोदी वालों की मोटाई और बेड के अंदर किसी प्रकार की कैंसर या फिर इलाज आदि को देखा जा सकता है।

उपचार

सही समय पर यूरोलिथियेसिस की पहचान होने पर उसका उपचार संभव है। कम प्रभावित मरीजों कोे ट्रेकंुलाइजर, एंटीस्पज्ेमाेिडक, इलेक्ट्रालेाइट आदि से ट्रीटमेटं किया जा सकता है। जब तक आवश्यकता ना हो डाइयूरेटिकस का उपयोग नहीं करना चाहिए। हाइपरकेलेमिया, हाइपानेेट्रिमिया होता है जिसकी वजह से मेटाबॉलिक डीअरेजं मंेट होता है। इसको सुधार करने के लिए इंट्रावेनस फ्लूड देने की आवश्यकता होती है ताकि शरीर में पानी की कमी ना रहे और एसिड बसे बैलंसे भी समुचित मात्रा मंे बना रह े हैं।

ऐसेे पशु जिनमंे ब्लड यूरिया नाइट्राजे न एवं क्रियेटिनिन की मात्रा बढ़ी हुई हो उन्हे ंपेरीटोनियल डायलिसिस की सहायता से ठीक किया जा सकता है। शल्य चिकित्सा मुख्यतः दो प्रकार की होती है पोस्ट स्क्रोटल एवं इश्चियल, वहां पर आॅपरेशन द्वारा निकाल दिया जाता है कई बार ऑपरेशन वहां से लीकेज होती है, और कई बार तो पेशाब की नली चिकित्सा वाली जगह पर लीक भी हो सकती है।

चिकित्सा का दूसरा तरीका, सिस्टोटॉमी है। सिस्टाटे ोमी मंे हम एक नली ब्लैडर मे ं फिक्स कर देत हैं जिससे कि पेशाब उसके द्वारा बाहर निकलता रहता है। इसके बाद केमिकल द्वारा उसका पथरी का उपचार करते हैं जिससे धीरे-धीरे पथरी घुलती रहती है और एनिमल स्वस्थ हो जाता है। इस प्रकार की शल्य चिकित्सा में कुछ परेशानियां भी होती है इसमें इन्फेक्शन, देर से घाव भरना, जलन होना, सूजन आ जाना आदि।

रोकथाम के उपाय

कुछ सामान्य से उपायों की सहायता से पथरी की संभावना को रोका जा सकता है जैसे कि इसमे ं प्रथम है कैल्शियम एवं फास्फोरस का अनुपात जो कि सामान्य रूप से 2ः1 होना चाहिए इसके लिए हम खुराक में 4 परसेटं नमक रख सकते हैं। साथ ही अधिक से अधिक मात्रा मंे पानी पिलाकर पथरी की संभावना को कम कर सकते हैं। पशुओं के आहार में कुछ परिवर्तन कर पथरीे बनने से रोका जा सकता है। रफेज टाइप की घास इसको खिला सकते हैं साथ ही अमोनियम क्लोराइड सप्लीमेटं मंे जोड़ा जा सकता है। केल्सियम एंड फास्फोरस की मात्रा कोे संतुलित किया जा सकता है। साफ पानी भी इस बीमारी का एक सरल उपचार है। समुचित मात्रा में पशु को पानी पिलाया जाए एवं साफ पानी हो जिसमे ं खनिज की मात्रा कम हो से भी इस बीमारी को रोका जा सकता है।

डाॅ. ए. एस. परिहार

सहायक प्राध्यापक

पशु शल्यचिकित्सा एवं क्षःरश्मि विज्ञान विभाग

पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, महू

नानाजी देशमुख पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर (म.प्र.)