चूजों के मृत्यु के मुख्य कारण और उसके उपाय

मुर्गी पालन एक ऐसा व्यवसाय है जिससे कम पूंजी, कम समय, कम मेहनत में अच्छी आमदनी प्राप्त किया जा सकता है। आज हमारे देश में एक अनुमान के मुताबिक लगभग 50 लाख लोग मुर्गी पालन रोजगार से जुड़े हुए हैं। अभी एक शोध के मुताबिक मुर्गी पालन का व्यवसाय करीब 14 प्रतिशत विकास दर के साथ बढ़ रही है साथ ही इसमें अभी भी असीम संभावनाएं हैं। मुर्गी का पालन मांस तथा अण्डों के लिये किया जाता है। इसे गांव के छोटे किसान भी कर सकते हैं बस उन्हें सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है। चूजें अपने जीवन के कुछ दिनों व सप्ताह तक बहुत ही नाजुक होते हे इस कारण बहुत ही अच्छे प्रबंधन की आवश्यकता होती है उन चूजे को स्वस्थ रखने के लिए। यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि चूजे की आपूर्ति अच्छी जगह से हो फिर भी 1-5 प्रतिशत मृत्यु दर चिंता का विषय है और किसान को आगे का नुकसान को रोकने के लिए सलाह की जरूरत है नही तो उन्हें काफी आर्थिक नुकसान हो सकता है।

प्रारंभिक चूजों की मृत्यु प्रबंधन, पोषण और बीमारी जैसे अनेक कारण हो सकते हैंः-

  1. प्रबंधन के कारणः- खराब प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक है। अच्छे प्रबंधन के साथ-साथ विश्वसनीय स्त्रोतों से प्राप्त करना भी बहुत ही महत्वपूर्ण है।

(क) उच्च ब्रूडिंग तापमानः- उच्च ब्रूडिंग तापमान चूजे के स्वास्थ्य और विकास को प्रभावित करता है। बहुत अधिक गर्मी के कारण चूजे निर्जलित हो जाता है और खाना में रूचि कम कर देते है।

(ख) कम निम्न ब्रूडिंग तापमानः- कम तापमान के कारण चूजे शीतलन से कपकपाने लगते है। लम्बे समय तक ठंड में रहने से चूजे में प्रतिरक्षा प्रणाली खराब हो जाती है। ठंड के कारण सभी चूजे एक साथ जमा होते है और घुटन के कारण उनकी मृत्यु हो जाती है।

(ग) उच्च आद्रताः- ब्रूडिंग घर में उच्च आर्द्रता के कारण सूक्ष्म जीवों का संक्रमण हो सकता है जिससे चूजों की मृत्यु हो सकती है।

(घ) उच्च चूजे के संग्रहणः- अत्यधिक चूजे का घनत्व के कारण बिस्तर सामग्री आसानी से गीली हो जाती है जो सूक्ष्म जीवों के विकास का माध्यम बन जाता है। अपर्याप्त खाना-पीना तथा जगह के कारण चूजे में भीड़-भाड़ की समस्या उत्पन्न हो जाती है और उनमें भुखमरी, नरभक्षण आदि समस्या उत्पन्न हो जाती है।

(ड.) लिटर संदूषण/मैलापनः- दूषित बिस्तर सामग्री के उपयोग से चूजे में बिमारी फैल सकता है और उसके मृत्यु का कारण हो सकता है। इस प्रयोजन के लिये कीटभूरहित बिस्तर सामग्री का उपयोग करना चाहिए।

(च) गलत या अपर्याप्त फीडर और पानीः- चूजे के पास फीडर और पानी की व्यवस्था होती है जो उनके लिए ही डिजाइन किये रहते है। गलत तरीकों से निर्मित फीडर और पानी की व्यवस्था के कारण फीड की उपव्यय तथा पानी का रिसाव होने लगता है जिससे लिटर सामग्री गीली हो जाती है और बिमारी का प्रकोप बढ़ जाता है।

(छ) जहरः- जहर के कारण चूजों में गंभीर समस्या हो सकती है। इसका कारण विषाक्त फीड, कीटनाशक, कीटामनाशक हर्बिसाइड्स आदि हो सकती है।

  1. पोषण के कारणः- अच्छे पोषण का अर्थ है संतुलित मात्रा में तथा समान रूप से आहार का वितरण।
    पानीः- चूजों के स्वास्थ्य को अच्छा रखने के लिये पानी का महत्वपूर्ण भूमिका है और उसके शरीर के तापमान को बनाये रखता है। फीड की कमी से अधिक पानी की कमी के कारण चूजों में मृत्यु का कारण बनती है। पानी रंगहीन, गंधहीन, बेस्वाद और रोग मुक्त होना चाहिए।

विटामिन की कमीः- विटामिन पोल्ट्री आहार के बहुत आवश्यक अंग है। वे शरीर के महत्वपूण्र प्रक्रियाओं जैसे उपापचय, विकास, प्रजनन, खराब हो चुके ऊत्तकों की मरम्मत और एंटी आॅक्सीडेंट के रूप में काम करते है।
ये विटामिन का दो प्रमुख समूह है, पानी में घुलनशील विटामिन ( जैसे विटामिन बी एवं सी) और वसा में घुलनशील विटामिन (विटामिन डी, ई, ए) इन विटामिन की कमी से प्रजनन, रक्त की कमी, अंडे उत्पादन में कमी, भ्रूण मृत्यु दर में वृद्धि आदि अनेक रोगों का कारण है।

  1. ई-कोलाई जीवाणुओं के कारणः- पक्षियों का यह एक जीवाणुजनित रोग है, जिससे कई प्रकार के संक्रमण पक्षियों में हो सकते हैं। इस जीवाण द्वारा कोली बेसीलोसिस, एगोरीटोनाइटिस, सालर्पिजाइटिस, हजारे डिजीज आदि रोगों के लक्षण देखे जा सकते हैं। सामान्यतः यह जीवाण्ु पशुओं, पक्षियों एवं मनुष्यों आदि के पेट एवं आंतो में पाया जाता है। स्ट्रेस एवं अन्य अवस्थाओं में होस्ट को संक्रमित कर विभिन्न रोग प्रकट करता है।
    कारण:- एश्केरिया कोलाई, ग्राम नेगेटिव रोड के आकार के जीवाणु।
    प्रसारः- इस रोग का प्रसार अण्डोे के माध्यम से हो सकता है, जिससे चूजों में अत्यधिक मृत्यु दर देखी जा सकती है। लिटर व बींट रोग फैलने में सहायक है। मंह एवं हवा के माध्यम से यह संक्रमण फैल सकता है।
    लक्षणः- काॅलीसेप्टीसीमिया- रक्त में इस जीवाणु के मिलने से यह अवस्था प्रकट होती है एवं इसमें सर्वप्रथम गुर्दाें एवं हृदय की झिल्ली में सूजन तथा हृदय में स्ट्रा कलर का तरल पदार्थ मिलता है।
    एयरसेक्यूलाइटिस- रक्त से अथवा सीधे ही श्वांस नी से यह जीवाणु फेफड़ों में पहुंचकर एयरसेक्यूलाइटिस नामक रोग प्रकट करता है, जिसमें उत्पादन कम होना, खांसी आना तथा रेटलिंग आदि लक्षण दिखलाई देते है।
    सेप्टिसीमिया- के कारण आवीडक्ट में भी संक्रमण पहुंच जाता है, जिससे अण्डा उत्पादन कम हो जाता है। चूजे के नाभि द्वारा संक्रमण प्रवेश कर ओमफलाइटिस रोग के लक्षण दिखलाता है, जबकि एयरसेक्यूलाइटिस के प्रभाव के साथ पेरेओनियम झिल्ली में सूजन पाई जाती है, जिसे एगपेरीटोनाइटिस कहते है।
    एंट्राइटिस- ई. कोलाई का आंतों में संक्रमण एंट्राइटिस नामक रोग पैदा करता है, जिससे आंतों के अन्दर की सतह पर सूजन पाई जाती है व पक्षी पतली बींट जैसे लक्षण करता है। इस अवस्था में आंतों में अन्य संक्रमण जैसे कि आइमेरिया प्रजाति के लगने की संभावना रहती है।
    कोलोग्रेल्यूलोमा अथवा हजारे डिजीज- आंतों एवं लीवर पर जगह-जगह ट्यूमर जैसी गांठे दिखाई पड़ती है। इस अवस्था को कोलोग्रन्यूलोमा कहते हैं।
    उपचारः- कुक्कुट फार्म पर रोग की जानकारी होने पर तुरन्त पशुचिकित्सक के सम्पर्क कर निदान करवायें। पशुचिकित्सक की सलाह पर ऐन्टीबायोटिक्स का उपयोग कर रोग का नियंत्रण किया जा सकता है।
  2. कुक्कुट फार्म में रोगों से बचाव हेतु सामान्य जानकारियांः-
    – कुक्कुट फार्म में स्वच्छता एवं कीटाणुनाशक की प्रक्रिया से ही रोगों से बचाव किया जा सकता है।
    – कुक्कुट घर के प्रवेश द्वार पर फुट बाथ हेतु सोडियम हाइड्रोक्साइड का घोल रखें।
    – फार्म के मुख्य प्रवेश द्वार पर वाहन के कीटाणु रहित करने के पश्चात् ही परिसर में प्रवेश करने दिया जाये।
    – आगन्तुक के कुक्कुट फार्म में प्रवेश पर नियंत्रण रखें। यदि प्रवेश आवश्यक हो तो गमबूट/शू-कवर, डिस्पोजेब कपउे, मास्क आदि पहनकर व हाथ साबुन से धोने एवं कीटाणु नाशक घोल से कीटाणु रहित करने के पश्चात् प्रवेश करने दिया जावे।
    – कुक्कुट फार्म में बाहर से आने वाले सामान अन्य उपकरण आदि को कीटाणु रहित कर उपयोग में लेवें।
    – कुक्कुट फार्म में मृत पक्षियों, संक्रमित लिटर, खराब अण्डे आदि के निस्तारण हेतु डिस्पोजल पिट् बनाकर निस्तारित करें अथवा जलाकर य गहरे गढ्ढे में कीटाणुनाशक दवा/ चूने के साथ गाड़ कर नष्ट कर दिया जाना चाहिए।
    – रोगग्रस्त क्षेत्रों में कुक्कुट पालन आॅल इन आॅल आऊट पद्यति अपनाकर कुक्कुट फार्म को पूर्ण रूप् से कीटाणु रहित करना चाहिए।
    – इसमें फाॅर्म के सभी पक्षियों को एक साथ विक्रय/निस्तारित करने के तीन सप्ताह पश्चात् पुनः नया बैच लाना चाहिए।
    – प्रथम सप्ताह में कुक्कुट घर का पुराना लिटर (बिछावन) बाहर निकाल कर फर्श अच्छी तरह से पानी एवं साबुन के घोल से साफ करना चाहिए। फर्श एवं दीवारों से बींट आदि रगड़ कर अच्छी तरह साफ करना चाहिए।
    – द्वितीय सप्ताह में दीवारों एवं फर्श पर कीटाणु नाशक घोल को छिड़काव करें। सभी दाने-पानी के बरतन व अन्य उपकरणों को भी साफ कर कीटाणु रहित करें व धूप में रखें।
    – तीसरे सप्ताह में दीवारों व छत पर चूने के घोल से सफेदी करनी चाहिए। कुक्कुट घर को चारों तरफ से बन्द कर फ्यूमिगेशन करना चाहिए।