छोटे चूजों, पठोर (ग्रोवर), अण्डा उत्पादन करने वाली मुर्गियों का प्रबंधन

छोटे चूजों का पालन पोषण

हेचरी से चूजों में तुरन्त चूजागृह में स्थानांतरण किया जाना चाहिए। चूजा गृह में चूजों को 6-8 सप्ताहों की उम्र तक रखा जाता है ये व्यवसायिक मुर्गियों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, अतः उनका प्रबंध सावधानी से किया जाना चाहिए। चूजा गृह से नये चूजों को लाने का उचित समय फरवरी से मार्च है। इससे मुर्गियों से अधिकतम अण्डा उत्पादन ठंड के महिनों में प्राप्त होगा तब अण्डों का विक्रय मूल्य अधिकतम मिलता है।

 कितनी संख्या में चूजों के लिए आदेश करें –

यदि हमें 1000 पठोर मुर्गी लेयर घर में पालना है तब हमें 1100 चूजों का आदेश करना चाहिए। यदि 5 प्रतिशत की चूजे हेचरी से प्राप्त हों तब भी 1100 चूजों का आदेश करें। इससे चूजों की मृत्यु, छटनी तथा नर चूजों की कमी को पूरी कर सकेंगे। यदि आवश्यक हो तो अग्रिम भुगतान करें। 

चूजों के आने के पूर्व चूजा गृह की तैयारी –

1. चूजा गृह से पुरानी बिछाली तथा चूजा गृह के उपकरण बाहर निकालें। पुरानी बिछाली का संग्रहण प्रक्षेत्र भवनों से 100 फिट दूर करें। धूल और मकड़ी के जालों को चूजा गृह में अंदर व बाहर की दीवारों, छत, बाहर की दीवारों तथा खिड़कियों को झाड़ू से साफ करें। 

2. धूल झराने के पश्चात् उन्हें ठंडे या गर्म पानी की दबाव युक्त बौछारों से धुलें। 

3. खिड़कियों की जालियों, लोहे या लकड़ी के चैखटों व उपकरणों को अच्छी तरह साफ करें।

4. दीवारों पर चूने से पुताई करें (मेलाथियान नुवान) जीवाणु, विषाणु व फफूंद नाशक तथा कीटनाशी को पानी में घोलकर सूखे फर्श दीवारों पर स्प्रेयर से अच्छी तरह छिटकाव करें। 

5. पानी के उपकरणों, दाने संग्रह के टंकियों, पाइप लाइन को जीवाणु नाशक द्रव से अच्छी तरह धुलकर उपचार करें। 

6. किलनियों, खटमलों को मारने के लिये दीवारों को या उनके अन्य छिपने के स्थानों पर ब्लो लेम्प या फ्लेम गन की सहायता से अग्नि ज्वाला से नष्ट कर दें। 

7. चूहे कुक्कुट आहार को खाकर दूषित करते हैं, व कई बीमारियों के फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं उनके बिलों का सीमेन्ट कांक्रीट से समय- समय पर बंद कर देना चाहिए। नालियों के मुंह में जालियां लगा देनी चाहिए। चूहों को मारने के लिए चूहा मारक दवायें जैसे जिंक फास्फाइड, एल्युमिनियम फास्फाइड, थैलियम सल्फेट बेरियम कार्बोनेट व आर्सेनिक ट्राई आक्साइड का उपयोग कर सकते हैं। चूहों को पकड़ने के लिये चूहेदानी का प्रयोग करें। पकड़े गये चूहों को पानी में डुबाकर मार देना चाहिए। 

8. फार्म को 2-15 दिनों के लिये बंद कर दें। 

9. फर्श पर 2-3″  मोटी तह नई गहरी बिछाली जैसे कि लकड़ी का बरूदा या चावल के भूसी (छिलकों) को बिछा दें। गर्मी में यह पतली व सर्दी में मोटी रखें। बिछाली पर अखबार का भूरा कागज बिछा दें। 

10. गहरी बिछाली या बैटरी ब्रूडर के फर्श की जाली पर अखबार या भूरा पेपर बिछा दें तथा मक्के का दलिया या चूजा आहार का छिड़काव कर दें। जिससे चूजे आहार व गहरी बिछाली में अंतर करना सीख जाते हैं। पानी व आहार के बर्तन रख दें निपल ड्रिंकर का उपयोग के पहले छोटे पानी के फव्वारे वाले बर्तन रखें। चूजा आहार चूजों की आहार प्लेट में भी परोस सकते हैं।

11. थर्मामीटर से बिछाली के पास का तापक्रम देखें। 

बैटरी ब्रूडिंग

बल्व या हीटर को चूजों के आने के 12 घण्टे पहले जला दें। चूजों के स्तर पर 29-320 से.मी. (85-900/फे.) तापक्रम बनाये रखें व आपेक्षित आर्द्रता 40-70 प्रतिशत हो। 

फर्श ब्रूडिंग

पर्याप्त संख्या में दाने व पानी के बर्तन रखें। इन्हें गाड़ी के पहिए जैसे स्थिति में रखें ।

स्थान

चूजों को ब्रूडर हाउस में उम्र के अनुसार फर्श स्थान की आवश्यकता होती है (तालिका….) चूजों की अधिक संख्या के कारण भीड़ हो जाती है व चूजे दबकर मर जाते हैं प्रारम्भ में प्रति चूजे 50-65 वर्ग से.मी. फर्श स्थान की आवश्यकता होती है। 2 मीटर व्यास वाले ब्रूडर के नीचे 200 चूजे पालना चाहिए। गैस ब्रूडर के नीचे 750-1500 चूजों का पालन कर सकते हैं। 

तापमान

ब्रूडर के नीचे और ब्रूडर के मकान में उचित तापमान रखना एक सफल चूजा पालन के लिये प्रमुख आवश्यकता है। आयु के अनुसार तापमान निम्न तालिका 6.1 में दिया गया है। सही तापमान पर सभी चूजे, चूजे रक्षक के अंदर समान रूप से घूमते और खाते पीते दिखते हैं। ठंड के दिनों में रात्रि में विद्युत उपलब्ध न होने से चूजों की मृत्यु दर बढ़ जाती है। ज्यादा तापमान कम करने के लिए या तो ब्रूडर की ऊंचाई बढ़ाई जा सकती है अन्यथा उसमें से बल्व कम किए जा सकते हैं। एक चूजे को 1.5 से 2 केण्डल वाट बल्व की आवश्यकता होती है। 

तालिका  – ब्रूडर के नीचे का आयु के अनुसार तापक्रम

चूजों की सप्ताहों में आयुसे.ग्रे.फे.
प्रथम32.090.0
द्वितीय29.085.0
तृतीय26.080.0
चतुर्थ23.075.0
पंचम21.070.0
षष्ठम21.170.0
सप्तम21.170.0
अष्टम21.070.0

   ब्रूडर के तापमान में अधिकता या कमी से परों का विकास कम गति से होना, शरीर का विकास दर कम होना, ब्रूडर घर के कोनों में या मध्य में चूजों का इकट्ठा होना, दबकर मरना और चूजों द्वारा एक दूसरे के अंगूठे खाना। चूजों का व्यवहार और चूजा रक्षक के भीतर फैलाव तापमान का सही दर्शक होता है। जब तापमान कम होता है तो बहुत से चूजे बल्व/हीटर के नीचे इकट्ठे होकर बैठे रहते हैं व कुछ चूजों की दबकर मृत्यु हो जाती है। अधिक तापमान होने पर चूजे – चूजा रक्षक के पास सटे रहते हैं वे अस्वस्थ दिखते हैं, हांफते हैं व मुंह खोलकर सांस लेते हैं। 

वातायन

चूजे गृह में हवाओं की शीत लहर से पर्दा लगाकर या खिड़कियां बंद कर वातायन कम किया जा सकता है व तापक्रम बनाये रखा जाता है। इस कारण से कमरे में आपेक्षिक आर्द्रता में वृद्धि हो जाती है। कम तापक्रम व वातायन से गहरी बिछाली गीली हो जाती है व हवा में अमोनिया वायु की प्रतिशत मात्रा बढ़ने लगती है। कमरे की हवा में अमोनिया 15-25 भाग प्रति दस लाख के अनुपात से अधिक न हो। 

चूजों का रक्षक (ब्रूडर गार्ड)

चूजे गर्मी के स्रोत से दूर जाकर ठंड से न मरें, इसके लिए यह एक घेरा होता है। यह गोल या षष्टाकार होकर ब्रूडर के किनारे से शुरू से 85-80 से.मी. अंतर पर खा जाता है। दस दिन के पश्चात् यह अंतर में वृद्धि कर लगभग 130 से.मी. किया जाता है। 15 दिन के पश्चात से अलग कर दिया जाता है। 

आहार व पानी का प्रबंध

प्रारम्भ के 4-5 दिनों में चूजों को पेपर या चूजों को आहार लाल प्लास्टिक ट्रे या चूजों के डिब्बों के ढक्कन में चूजा मेस/दलिया खिलाया जाता है। इसके पश्चात् चूजों के आहार के बर्तन में आहार परोसा जाता है। पहले दो दिन चूजों को मक्के की दलिया या चूजा मेस कागज पर छिटककर खिलाई जाती है। चूजों में पिसा हुआ गेहूं या मक्का खिलाने से चूजों में अवस्कर गुहा में मल सूख जाता है तथा अंत में चूजे मर सकते हैं।

पठोर (ग्रोवर) मुर्गियों का प्रबंध

यह कार्य बहुत ही दक्षता से मुर्गी कृषक को करना होता है। यदि मुर्गियों का विकास अच्छी तरह से होगा तभी वे भविष्य में अधिक अण्डा उत्पादन कर सकेंगी। इस काम का मुख्य उद्देश्य 18-20 हफ्ते में अण्डे देने वाली लगभग 1200 से 1400 ग्रा. वजन की नई मुर्गी (पुलेट) की वृद्धि करना होता है। इनको बढ़ते हुए दिनमान में पालना जल्दी लैंगिक परिपक्वता के लिये उत्तम होता है। इन्हें कृत्रिम प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। यह क्रमशः 900-1900 वर्ग से.मी., 7-10 से.मी. और 1.5-2.5 से.मी. तक आयु के अनुसार वृद्धि की जाती है। पीने के पानी की आवश्यकता तापमान, आर्द्रता, आहार में पोषक पदार्थों की उपलब्धता, वातायन उम्र व शारीरिक गतिविधि पर निर्भर करती है। तापमान 290 से.ग्रे. से अधिक होने पर पुलेट हांफने लगती है अतः आहार में अधिक ऊर्जा व जलपान की आवश्यकता में वृद्धि होती है। प्रति 1-2 माह में आंतरिक परजीवी जैसे गोल कृमि व फीता कृमि की रोकथाम के लिये दवाई पानी में दी जाना चाहिए। ये पदार्थ प्रत्याबल रोकने के लिए सुबह के समय दी जानी चाहिए। 

पठोर मुर्गियों की छटनी

ऐसी पठोर मुर्गियां जिनका शारीरिका भार कम हो बीमार हो शारीरिक गुण विभेद के अनुसार न हों, शारीरिक विकृति हो तो ऐसी मुर्गियों की छटनी कर देना चाहिए। ऐसा करने से श्रम, जगह आहार की बचत होती है तथा कमजोर बीमार पठोर मुर्गियां स्वस्थ पठोर मुर्गियों में बीमारी नहीं फैला पाती हैं। 

भीड़ से बचाव

ब्रूडर तथा पठोर, तथा ब्रूडर पठोर व लेयर घरों में सामान्यतयः पठोर मुर्गियों की भीड़ हो जाती है। इससे बचाव के लिए पठोर गृह में 20 सप्ताह के फर्श स्थान की आवश्यकता 1800-2000 वर्ग से.मी. की दर से ही पठोर मुर्गियों को रखना चाहिए। 

खाने व पीने की जगह

बढ़ती आयु के अनुसार खाने और पीने की जगह 7-10 रेखीय से.मी. और 1.5-2.5 से.मी. तक वृद्धि की जा सकती है। आहार की जगह इतनी हो जिससे 75-100% रखी गई मुर्गियां एक साथ भोजन गृहण कर सकें । पीने के पानी की जरूरत तापमान आपेक्षिक आर्द्रता, खुराक के घटक पदार्थ, वातायन तथा आयु पर निर्भर करती है। तापमान 290 से.ग्रे. से अधिक होने पर पानी की आवश्यकता में वृद्धि हो जाती है। 

प्रति 2-3 महिने में अंतरजीवी कीड़ों की दवाई टीकाकरण से पहले पिलाना। 9-10 सप्ताह की उम्र पर चोंच कुतर दें। कभी भी 16 सप्ताह के पश्चात चोंच न कुतरें। उचित शारीरिक विकास दर बनाये रखने के लिए जन्म दिन के हर चैथे सप्ताह शारीरिक भार 5-10 प्रतिशत पठोर मुर्गियों का ज्ञात करना चाहिए। झुण्ड का औसत मान ज्ञात कर यह देखना चाहिए कि 80-85 प्रतिशत पक्षी औसत भार से ± 10 प्रतिशत की विचलन सीमा में है या नहीं। यह मुर्गी की समान वृद्धि दर रखने के लिए आवश्यक है।

नियंत्रित आहार खिलाना

नियंत्रित आहार दो तरह से खिलाया जाता है। 

1. गुणवत्ता में कमी करना। 

2. आहार की मात्रा में कमी करना। 

नियंत्रित आहार खिलाने के निम्नलिखित प्रभाव देखने को मिलते हैं। 

1. 20 सप्ताह की आयु पर शारीरिक वृद्धि पर नियंत्रण रखना। मुर्गी की अण्डवाहिनी के चारों तरफ वसा जमा होने से भविष्य का अण्डा उत्पादन कम हो जाता है। 

2. लैंगिक परिपक्वता की आयु में देरी होना। 

3. भविष्य के अण्डा उत्पादन की तीव्रता में वृद्धि होना। 

4. लेयर हाउस में मुर्गियों की मृत्यु दर में कमी होना। 

5. अण्डा भार में वृद्धि होना। 

6. आहार समय में कमी होने से उत्पादन व्यय में कमी के कारण आय में वृद्धि होना।

आहार नियंत्रण की सावधानी

1. स्वैचिछक आहार खपत से 20 प्रतिशत कम कर आहार परोसना। 

2. आहार नियंत्रण की आयु 8-20 सप्ताह। 

3. पठोर मुर्गियों को दिन में दो समय आहार परोसना। 

4. आहार बर्तन का रेखीय जगह बढ़ाना जिससे सभी मुर्गियां एक साथ भोजन ग्रहण कर सकें। 

5. आहार में दी जाने वाली औषधियों व आहार पूरकों की मात्रा में कुछ वृद्धि करना जिससे आहार खुराक की कमी की पूर्ति हो सके। 

चूजों तथा पठोर मुर्गियों को आहार खिलाना।

चूजों की विकास दर पर निम्नलिखित कारकों का प्रभाव पड़ता है।

अ. व्यवसायिक लेयर चूजों व पठोरों का आनुवांशिक औसत शारीरिक आकार। 

ब. प्रति दिन खाये गये आहार की औसत मात्रा। 

स. आहारमें ऊर्जा व प्रोटीन। 

द. आवास व्यवस्था चूजों व पठोरों की क्रियाशीलता को प्रभावित करते हैं। अतः आहार खपत को भी प्रभावित करते हैं। जैसे गहरी बिछाली या पिंजरा पद्धति।

इ. पेट की बीमारियां जैसे विषाणु व जीवाणु जनित या काक्सीडियोसिस इनसे आहार खपत बहुत कम हो जाती है व पोषक तत्वों का अवशोषण प्रभावित होता है। 

प्रकाश का प्रबंध

इनको कृत्रिम प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती है। दिन का प्रकाश इनके लिए पर्याप्त होता है। प्रकाश उचित होने पर पठोर मुर्गियों की आहार खपत अधिक होती है। जिससे उनका समुचित शारीरिक विकास होता है। 

आहार को व्यर्थ न करना

आहार को व्यर्थ होने के निम्नलिखित कारण हैं –

1. अनुउत्पादक पक्षी। 

2. आहार बर्तनों से आहार गिरना। 

3. आहार बर्तनों को अधिक भरना। 

4. पठोर गृह में चूजों का होना तथा अन्य पक्षियों का प्रवेश। 

5. आहार बर्तनों की संरचना। 

6. चोंच कुतरना। 

पठोर मुर्गियों की उत्पादन कीमत में कमी कैसे करें –

लेयर उत्पादन का 70 प्रतिशत खर्च आहार पर होता हे। अतः आहार को व्यर्थ न करें। पठोर मुर्गियों को संतुलित आहार देना चाहिए इससे दाने का अधिकतम उपयोग होगा। आहार नियंत्रण से भी आहार पर व्यय कम होगा। 

श्रमिकों पर व्यय अधिक होता जा रहा है। अतः प्रक्षेत्र पर श्रम बचत के लिए उपकरण उपयोग करें व श्रमिक को अधिकतम कार्यभार प्रदान करें। मुर्गियों को बीमारी से बचायें। दवाईयों पर न्यायपूर्ण खर्च करें। व्यर्थ विद्युत का उपयोग न करें। प्रक्षेत्र में पक्षियों की मृत्युदर कम करें। प्रक्षेत्र में एक ही उम्र के चूजे पालें। ब्रूडर गृह, ग्रोवर व लेयर गृहों में कम से कम 100 फीट का अंतर रखें। इन घरों में श्रमिक भी अलग-अलग हों।

मुर्गियों को 18 सप्ताह की उम्र पर लेयर गृह में स्थानांतरित कर दें। यदि पठोर मुर्गियों का औसत वजन कम हो तो स्थानांतरण 2-3 सप्ताह के लिए स्थगित किया जा सकता है। इससे पठोर मुर्गियों को अण्डा उत्पादन से पहले नए घर के वातावरण से समायोजित होने का समय मिल जाता है। कम वजन वाली मुर्गियों को अलग रख कर 3-4 सप्ताहों के लिए विशेष आहार देना चाहिए। लगभग 2 प्रतिशत ज्यादा प्रोटीन, खनिज लवण, विटामिन्स और यकृत उत्तेजक आयुर्वेदिक दवाइयां खिलाने से उनमें से अधिकतम विकसित हो जाती हैं। इससे मुर्गियों की छटनी दर कम होकर मुर्गीपालक का नुकसान कम हो जाता है। 

लेगहार्न मुर्गियों का प्रबंध

अपेक्षित अण्डा वजन (55-58 ग्रा.) के साथ प्रति वर्ष प्रति मुर्गी अधिक अण्डा उत्पादन व कम आहार खर्च तथा कम से कम मृत्यु दर 0.5% प्रति माह या 6-8% प्रति वर्ष यह एक मुर्गी पालक का लक्ष्य होता है। 

पुलेट का स्थानांतर

अण्डे देने वाली पुलेट का 16 सप्ताह 18 सप्ताह की उम्र होने पर या इस उम्र पर अपेक्षित शारीरिक भार प्राप्त कर लेने पर ग्रोवर हाउस से लेयर हाउस में स्थानांतरित किया जाता है। सामान्यतयः लेयर मुर्गियों को पिंजरों में या लोहे की जाली तथा गहरी बिछाली पर रखा जाता है। जो पुलेट शारीरिक वजन प्राप्त नहीं कर पाती हैं उन्हें 2-3 हफ्ते ग्रोवर हाउस में ही रखकर संतुलित आहार खिलाया जाता है। इससे छटनी योग्य मुर्गियों की संख्या कम हो जाती है तथा उससे नुकसान कम होता है।

अण्डा उत्पादन करने वाली लेयर मुर्गियों का प्रबंध

प्रति वर्ष प्रति मुर्गी अधिक अण्डा उत्पादन, उचित अण्डा भार, प्रति दर्जन व प्रति किलो कम आहार खपत, कम मृत्यु दर यह लाभप्रद अण्डा व्यवसाय के लिये आवश्यक है। अण्डा उत्पादन हेतु आनुवंशिक क्षमता तथा उचित प्रबंध हेतु कुछ महत्वपूर्ण प्रबंध कार्य निम्नलिखित हैं। 

फर्श का स्थान, आहार और पीने के पानी की जगह 

अण्डे देने वाली मुर्गी (लेयर) के लिए गहरी बिछाली पद्धति में 1800-2200 वर्ग से.मी. और पिंजरों में 650 वर्ग से.मी. फर्श की जगह की सिफारिश की गई है। लगभग 12-15 रेखीय से.मी. आहार की जगह तथा 2.5 से.मी. जलपान की जगह लेयरों को दी जाती है। गहरी बिछाली पर लगभग 3-5 मुर्गियों के लिए एक अण्डे देने का घोंसला (एकल) अथवा सामुदायिक घोंसला प्रति 50 मुर्गियों को उपलब्ध कराया जाता है। घोंसले के सामने एक लकड़ी या लोहे की पट्टी (पर्च) लगाई जाती है। इसके सहारे से मुर्गियां घोंसले में प्रवेश करती हैं। कम फर्श आहार व जलपान की जगह बीमारियां असंतुलित आहार, मृत्यु दर की अधिक प्रतिशतता और अधिक प्रत्याबल, प्रकाश की तीव्रता और समय की कमी व स्वजाति भक्षण, अण्डा खाने की आदत से अण्डा उत्पादन में कमी हो जाती है। 

लेयर हाउस का तापमान 

जबलपुर मध्यप्रदेश में वर्ष भर दिन का औसत तापमान 300 से.ग्रे. से 470 से.ग्रे. तक परिवर्तित होता है। किन्तु अधिक उत्पादन के लिये तापमान का विचलन 180 से.ग्रे. से 220 से.ग्रे. होना चाहिए। कम या अधिक तापक्रम पर मुर्गियों में प्रत्याबल या दबाव उत्पन्न होता है। यद्यपि मुर्गियां 12.8-270 से.ग्रे. में यह दबाव सहन कर लेती हैं। किन्तु इसमें अधिक तापमान होने पर मुर्गी की औसत प्रति दिन की आहार खपत कम हो जाती है। जिससे अण्डा उत्पादन कम होता जाता है। 290 से.ग्रे. से अधिक तापमान पर मुर्गियां लगातार हांफती हैं। लगभग 400 से.ग्रे. और अधिक तापमान अण्डे का छिलका 0.30-0.34 मि.मी. से पतला होकर 0.25-0.30 मि.मी. रह जाता है। 

कृत्रिम प्रकाश

लगभग 20 सप्ताहों की आयु तक मुर्गियों को दिन का सूर्य प्रकाश पर्याप्त रहता है। किन्तु 21वें सप्ताह से प्रति सप्ताह प्रकाश में 20-30 मिनट वृद्धि कर अधिकतम 16-17 घण्टे तक प्रकाश दिया जाना चाहिए। पूरे कृत्रिम प्रकाश को आधा सुबह तथा आधा शाम को दिया जाना चाहिए। कृत्रिम प्रकाश के लिये बल्व, ट्यूब लाइट, सीएफ लैम्प, एल.ई.डी. लैम्प व प्रक्षेत्र के लिये मरकरी या हेलोजन से प्रकाश कर सकते हैं। प्रकाश की तीव्रता मुर्गी की आंख की सतह पर 1-3 फुट केण्डल या 10-30 लक्स होना चाहिए। 5 फुट केण्डल से अधिक प्रकाश देने पर मुर्गियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 

आहार खिलाना और जलपान

लेयर मुर्गी को प्रतिदिन की आहार की मात्रा दो भागों में सुबह और शाम देना चाहिए। ट्यूब फीडर में आहार सदैव भरा रहना चाहिए। व्यवसायिक श्वेत लेगहार्न मुर्गियां 105-120 ग्राम आहार ग्रहण करते हैं। आहार की प्रतिदिन की मात्रा का कम या अधिक होना आहार की गुणवत्ता, प्रत्याबल मौसम में परिवर्तन या बीमारी का सूचक होता हैं गुटिका या दलिया (मेस) खिलाने की अच्छी विधियां हैं। 

मुर्गियों को हमेशा ताजा साफ सुथरा कार्बनिक, खनिज तथा जैविक अशुद्धियों से मुक्त होना चाहिए। साधारणतः मुर्गी की औसत आहार खपत से जल की खपत 2.5-5 गुना औसम के अनुसार होती है। ठंड में मुर्गियां कम पानी पीती हैं तथा गर्मी में अधिक पानी पीति हैं। पेयजल का तापक्रम अधिक ठण्डा या अधिक गर्म नहीं होना चाहिए। 

मुर्गियों की छंटाई

मुर्गी प्रक्षेत्र की कार्य क्षमता तथा हानि को कम करने के लिए समय-समय पर अनुत्पादित तथा कम उत्पादन देने वाली मुर्गियों की छंटाई करते रहना आवश्यक है। 

लेखा जोखा और उनका परीक्षण

मुर्गी घर के व उपकरणों, खुराक की मात्रा, अण्डा उत्पादन, मृत्यु संख्या शव परीक्षण रिपोर्ट, छंटाई, दवाइयां टीकाकरण खर्च और आय का दैनिक विवरण आदि का लेखा रखना मुर्गी पालक के लिए आवश्यक होता है। इनकी साप्ताहिक मासिक, त्रैमासिक एवं वार्षिक समीक्षा करना आवश्यक है। इससे मुर्गी पालक को प्रबंधन की त्रुटियां समझने, उनको सुलझाने तथा दूसरे मुर्गी पालकों से दक्षता की तुलना तथा भविष्य की योजना बनाने में अत्यंत मदद मिलती है। अण्डों की उत्पादन लागत की गणना करन में मदद मिलती है।