दुग्ध ज्वर-दुधारू पशुओं में होने वाला एक प्रमुख रोग

  • दुग्ध ज्वर एक चयापचाय बीमारी है जिसमे पशुओं के रक्त में कैल्शियम की कमी हो जाती है तथा शरीर का तापक्रम बढ़ने की बजाय काम हो जाता है |
  • जानवर की बयान्त व उम्र बढ़ने से इस रोग के आसार भी बढ़ जातें हैं परंतु  यह ब्याने के पहले भी हो सकता है | संकर तथा विदेशी नस्ल की गायों में इस विकार को प्रमुखता से देखा जा सकता हैं |
  • इसमे मुख्यतः तीन अवस्थायेँ पाई जाती है –

प्रथमावस्था- जानवर उत्तेजित हो जाता है| सिर या टांगों की माँसपेशियों में खिंचाव आने के साथ -साथ जानवर हिलना डुलना बंद कर देता है | खाना-पीना छोड़कर दांतों को किटकिटाता है| पशु को थोड़ा ज्वर आ जाता है पिछले व अगले पैरों में जकड़न आ जाती है|

द्वितीयावस्था- जानवर सुस्त हो जाता है, अपनी गर्दन उदर की तरफ घुमाकर बैठ जाता है| मांसपेशियां ढीली पड़ जाती है तथा जानवर खड़ा होने में असमर्थ हो जाता है| दोनों नाक के बीच का हिस्सा सूख जाता हैं, आँख की पुतली चौड़ी हो जाती है| पेट का घूमना कम हो जाता है जिससे पशु कब्ज ग्रसित हो जाता हैं|

तृतीयावस्था- इस अवस्था में जानवर लगभग बेहोश हो जाता है तथा एक तरफ लेटकर चारों टांगें शरीर से दूर कर लेता है| जानवर बैठने में असमर्थ हो जाता है|

बचाव और उपचार –

  • दुधारू पशुओं के राशन में कैल्शियम व फास्फोरस युक्त मिनरल मिक्स्चर मिलाकर देने से काफी हद तक इस रोग से निजात पाई जा सकती है|
  • ब्याने के 10-15 दिनों तक जानवर का सम्पूर्ण दूध नहीं दुहना चाहिए, कुछ दूध की मात्रा उष मे बनी रहने देनी चाहिए|
  • उपचार हेतु पशुचिकित्सक की सलाह आवश्यक है|
  • रोग ग्रसित जानवर अगर लेटी हुई अवस्था में है तो उसे बैठाना चाहिए ताकि ड्रेनचिंग न्यूमोनिया से बचाया जा सके|
  •  इन्जेक्शन कैल्शियम बोरोग्लूकोनेट 400-800 मिली आधा नाड़ी में तथा आधा चमड़ी के नीचे लगाना चाहिए|
  • देशी इलाज के रूप में गिलोय के पत्ते खिलाए जा सकते है|