दुग्ध प्रसंस्करण का महत्व एवं विधियाँ

उत्पादन के तुरन्त बाद दूध को ठण्डा कर लेना चाहिए अन्यथा दूध संयंत्र में पहुंचने तक अम्लीय हो जायेगा । अम्लीय होने के साथ-साथ जीवाणु की संख्या भी अधिक हो जाएगी । यह भी सम्भव है कि इन जीवाणुओं में कुछ व्याधिजनक जीवाणु भी हो । सामान्य तापक्रम पर दूध को अधिक समय तक रखने से दूध के कुछ अव्यवो (Constituents) का विघटन (Decomposition) हो जाता है जिससे दूध का स्कन्दन भी सकता है । अतः दूध को पशु से दोहन के बाद यथाशीघ्र ठण्डा करना आवश्यक हो जाता है । भारत में इनके प्रसंस्करण के लिए कच्चा दूध आम तौर गाय या भैंस से लिया जाता है, लेकिन यदा कदा अन्य स्तनधारियों जैसे बकरी, भेड एवं ऊँट का दूध भी प्रयुक्त होता है I दुग्ध-उत्पाद या डेयरी उत्पाद से अभिप्राय उन खाद्य वस्तुओं से है जो दूध से बनती हैं। यह आम तौर पर उच्च ऊर्जा प्रदान करने वाले खाद्य पदार्थ होते हैं। इन उत्पादों का उत्पादन या प्रसंस्करण करने वाले संयंत्र को डेयरी या दुग्धशाला कहा जाता है। दूध का प्रसंस्करण निम्नलिखित विधियों के द्वारा किया जा सकता है 

1. दूध का शीतलन/अवशीतलन (Cooling/Chilling of Milk):

दुग्ध मुख्यतया गाँवों में उत्पादित किया जाता है जबकि इसका उपभोग केन्द्र शहरी क्षेत्र में होता है । अतः यह आवश्यक है कि दूध को उत्पादन के तुरन्त बाद या तो उपभोक्ता तक पहुँचा दिया जाए या उसे ठण्डा किया जाए । परम्परागत तरीके से दूधिया कच्चे दूध को इसी अवस्था में शहरों में ले जाकर उसे वितरित करते है ।  अतः दूध की गुणवत्ता अच्छी नहीं रह पाती है । उपभोक्ताओं को अच्छा दूध प्रदान करने हेतु वर्तमान में देश के लगभग सभी शहरों में दुग्ध संघ चल रहे है । दूध प्रसंस्करण का कार्य कुछ एक घण्टों में पूरा नहीं होता है । अतः दूध को संयंत्र या अवशीतन केन्द्र (Chilling Centre) पर ठंडा किया जाता है । कुछ गांवों का एकत्रित दूध (Collected Milk) एक निश्चित स्थान पर संग्रह कर लिया जाता है जिसे Assembling Centre कहा जाता है । कुछ संग्रह केन्द्रों (Assembling Centres) का दूध एक स्थान पर एकत्र कर लिया जाता है जहाँ दूध को ठण्डा करने का संयंत्र भी लगा रहता है उसे केन्द्र को अवशीतन केन्द्र (Chilling Centre) कहा जाता है । यहाँ दूध को मशीन द्वारा 4.C तापमान तक ठण्डा किया जाता ।  अवशीतलन का अभिप्राय दूध को एक ऐसे तापमान तक ठण्डा करने से है कि उसमें उपस्थित पानी बर्फ में परिवर्तित न हो तथा जीवाणुओं की वृद्धि रुक जाय। अवशीतन केन्द्र पर दूध को ठण्डा करने के लिए वही यंत्र प्रयोग में लाया जाता है जो पास्तुरीकरण प्रक्रिया की ‘उच्च ताप कम समय’ (HTST) विधि में तापन के लिए प्रयोग किया जाता है । अन्तर यह है कि इस यन्त्र में पास्तुरीकरण के समय दूध के तापन के लिए गर्म पानी या भाप का प्रयोग करते हैं जबकि अवशीतन के समय शीतलन माध्यम के रूप में ब्राईन घोल (Brine Solution) का प्रयोग करते हैं । दूध को अवशीतित अवस्था में पास्तुरीकरण की प्रक्रिया में जाने तक रखा जाता है ।

अवशीतनकेन्द्रकेमुख्यउपकरण (Major Items/Equipments at Chilling Centre):

किसीअवशीतनकेन्द्रपरनिम्नलिखितउपकरणउपलब्धहोनेचाहिए:

1. दूध को तोलने/नापने के उपकरण (Milk Weigh Tank and Weighing Scale)

2. दूध इक्टठा करने के उपकरण  (Drop/Dump Tank with Cover)

3. दूध के डिब्बों को धोने के उपकरण (Can Washer)

4. दुग्ध पम्प (Milk Pump)

5. सतही/प्लेट शीतक (Surface/Plate Cooler’s)

6. प्रशीतन इकाई (Refrigeration Unit)

7. शीत ग्रह (Cold Room)

8. दुग्ध परीक्षण इकाई (Milk Testing Unit)

9. अन्य आवश्यक उपकरण (Other Essential Equipments)

दूधकोअवशीतितकरनेकीविधियाँ (Methods of Cooling/Chilling of Milk): उत्पादन तथा संग्रह केन्द्र पर दूध को विभिन्न विधियों का प्रयोग करके ठण्डा किया जाता है ।

जिनमेंप्रमुखरूपसेप्रयोगकीजानेवालीविधियाँनिम्नलिखितहैं:

i. मशीन द्वारा गाय का दूध निकाल कर बन्द नलियों द्वारा प्रशीतन यंत्र (Refrigeration Plant) में ठण्डा करके बन्द नलियों द्वारा ही इसे भंडारण टैंकों में भेजा जाता है । यह दूध भडारण टैंकों तक पहुँचने में खुले वातावरण के सम्पर्क में नहीं आता है । अतः इसमें सूक्षम जीवाणुओं की संख्या बहुत कम होती है ।

ii. अवशीतन के लिए Ice Chambered Insulted का प्रयोग भी किया जाता है ।

iii. ताप अवरोधक (Insulated Tanks) टैंकों के ठण्डे पानी में दूध के डिब्बों को डुबो कर ठण्डा करना ।

iv. रोटोफ्रिज (Roto freeze) विधि में दूध के डिब्बों के ऊपर अवशीतित जल का फव्वारा चला कर डिब्बों को ठण्डा किया जाता है ।

v. अवशीतित पानी द्वारा ठण्डी हुई Coils से डिब्बों के अन्दर दूध को ठण्डा करना ।

vi. हवा से ठण्डी होने वाली इकाई (Condensing Unit) के प्रयोग द्वारा दूध में डूबने वाले शीतक (Immersion Cooler) का प्रयोग करके डिब्बों में दूध को ठण्डा करना ।

vii. टयूबयुक्त सतही शीतक (Tubular Surface Cooler):

इसमें सतही शीतक (Surface Cooler) के एक कक्ष में ठण्डे पानी की नलियां (Tubes) लगी होती हैं । कक्ष में से दूध प्रवाहित किया जाता है । जो नलिकाओं में से बहने वाले अवशीतित जल या ब्राइन सोलूसन के सम्पर्क में आकर ठण्डा होता है ।

दूध का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होता है जो नीचे आकर एक ट्रे में एकत्र होते हुए भंडारण टैंक में चला जाता है । शीतक दो भागों में बंटा होता है उपर अवशीतित जल की नलिकाएं तथा नीचे ब्राईन, अमोनिया या फ्रियोन गैस युक्त नलिकाएं (Coils) होती है ।

viii. प्लेटशीतक (Plate Coolers):

प्लेट शीतक का प्रयोग करके दूध को ठण्डा किया जाता है । इसमें प्लेटस (Plates) लगी होती हैं । एकान्तर (Alternate Plates) प्लेटों में ठण्डा पानी या प्रशीतक तथा बीच की दूसरी प्लेटों में दूध प्रवाहित होता है जो ठण्डी प्लेटों के सम्पर्क में आकर ठण्डा हो जाता है ।

ix. कैबिनेट शीतक (Cabinet Cooler):

कैबिनेट शीतक की कार्य क्षमता अधिक होती है । यह कई एक सतही शीतकों (Surface Coolers) को उदम (Vertical) स्थिति में संयुक्त करके कार्य में लिया जाता है । स्थान को कमी में कार्य करने के लिए यह विधि उपयुक्त है ।

2. डेरीचबूतरेपरदूधप्राप्तकरना (Receiving Milk at Dairy Platform):

डेरी संपन्त्र (Dairy Plant) में चबूतरे (Platform) पर दूध के डिब्बों में या टैंकर्स (Cans or Tankers) में लाया जाता है ।

यहाँपरदुग्धप्राप्तिकेलिएनिम्नलिखितक्रियाएं (Operations) कियेजातेहैं:

i. दूधउतारना (Milk Unloading):

दूध के डिब्बों को ट्रक या टैम्पू आदि वाहन से उतार लिया जाता है । इस कार्य में सुविधा के लिए प्लेटफार्म की ऊचाई ट्रक की फर्श की ऊँचाई के बराबर रखी जाती है । उतारे गये डिब्बों को श्रेणीकरण के लिए एकत्र कर लिया जाना है । यदि दूध को टैंकर्स में लाया गया है तो उसे सही स्थिति में खड़ा करके पाईप द्वारा जोड़ दिया जाता है ii. श्रेणीकरण (Grading):

दूध के मूल्य भुगतान हेतु दूध को गुणों के आधार पर विभिन्न वर्गों में बाँट लिया जाता है । यह सामान्यतया ज्ञानेन्द्रिय परीक्षण (Organoleptic Tests) के आधार पर किया जाता है । यहाँ दूध के वर्गीकरण करने वाला व्यक्ति (Milk) अनुभवी (Experienced) होने चाहिए ।

iii. दूधपरीक्षण (Milk Testing):

दुग्ध डिब्बों (Milk Cans) में आये दूध के श्रेणीकरण के लिए डिब्बे का ढक्कन खोल कर दूध का रूप, गन्ध, ताप तथा तलछट आदि का परीक्षण किया जाता है । दूध का मूल्य भुगतान वसा तथा वसा रहित ठोस एवं उपरोक्त सुग्राही परीक्षणों (Sensory Tests) के आधार पर किया जाता है । प्रयोगशाला परीक्षण के लिए दूध को मिला कर नमूना भर कर रख लिया जाता है तथा डिब्बों को खाली करा दिया जाता है । प्लेटफार्म पर होने वाले परीक्षणों को 2 वर्गों में बाँटा जा सकता है:

i. ज्ञानेन्द्रियसुग्राहीपरीक्षण (Organoleptic Sensory Tests):

इन्हें सुग्राही (Sensory) या जल्दी होने वाले परीक्षण (Rapid Platform Tests) भी कहा जाता है । क्योंकि ये जल्दी सम्पन्न हो जाते है । इस वर्ग में आने वाले मुख्य परीक्षण गन्ध (Flavour), स्वरूप (Appearance), ताप (Temperature), तलछट (Sediment) तथा अम्लता प्रतिशत (Acidity Percentage) है । ये परीक्षण दूध को देख कर छू कर या सूँघ कर किये जा सकते है ।

ii. प्रयोगशालापरीक्षण (Laboratory Tests):

प्रयोगशाला में दूध का लैक्टोमीटर पाठयांक (Lactometer Reading) तथा वसा प्रतिशत (Fat Percentage) आदि का निर्धारण (Determination) किया जाता है ।

3. दूध का तोलना (Weighing of Milk):

दूध को प्राप्त करके उसका मूल्य भुगतान करने तथा बेचने के लिए दूध का भार ज्ञात करना आवश्यक होता है । डिब्बों का दूध Weigh Bowl में उडेलते है । दूध उडेलने से पूर्व बाऊल को पैमाने पर रख कर Scale Dial की सूई को शून्य पर स्थिर कर लेते है । अब उसमें दूध उडेल कर उसके वजन का सही पाठयांक पड़ लिया जाता है । Weigh Tank का निकास वाल्व बडा होना चाहिए । जिससे तोलने के बाद वाल्व खोलते ही नीचे रखे Dump Tank में दूध की पूर्ण मात्रा शीघ्रता से चली जाए । इस टैंक से दूध को पम्प द्वारा ऊँचाई पर रखे कच्चे दूध के भंडारण टैंक (Raw Milk Storage Tank) में भेजा जाता है ।

टैंकर्स के दूध का आयतन फ्लो मीटर द्वारा ज्ञात किया जाता है जिसे बाद में गणना द्वारा भार में परिवर्तित कर लिया जाता है । दूध का आयतन ज्ञात करने के लिए एक विशेष यंत्र, Flow Meter का प्रयोग किया जाता है । (भार = आयतन × आपेक्षिक घनत्व) । यदि टैंकर्स को Weigh Bridge पर तोलना है तो टैंकर को तोलने से पूर्व उस पर जमे बर्फ या कीचड़ आदि को धोकर साफ कर लेना चाहिए तथा दूध का शुद्ध भार ज्ञात किया जा सके ।

4. दूध का पूर्वतापन (Preheating of Milk):

दूध को प्राप्त कर तोलने के बाद भंडारण टैंकों में एकत्र कर लिया जाता है दूध को पास्तुरीकृत करने से पूर्व छाना जाता है । भंडारण टैंकों में दूध 5C ताप पर ठण्डा रहता है । इस ताप पर दूध में वसा ठोस अवस्था में होती है तथा दूध की विस्कोसिटी (Viscosity) अधिक होती है ।

दूध को ठीक प्रकार से दक्षता पूर्वक (Efficiently) छानने के लिये उसका पूर्वतापन आवश्यक होता है । पूर्व तापन से दूध का वसा द्रव अवस्था (Liquid State) में आ जाता है तथा दूध की विस्कोसिटी भी कम हो जाती है अतः दूध की छनाई आसानी से हो सकती है । दूध को छानने से पूर्व 35 से 40C ताप तक गर्म किया जाता है ।

इसके अतिरिक्त पूर्वतापन क्रिया के बाद दूध में भडारण के समय आने वाली स्थूलता (Age Thickening) भी नहीं आ पाती है तथा उसकी उष्मा के प्रति स्थिरता (Heat Stability) भी बढ़ जाती है । 

5. दूध को छानना तथा स्वच्छीकरण (Filtration and Clarification of Milk):

दूध में से धुल आदि दूर करने के उद्देश्य से उसे 35-40C तापमान तक गर्म करके छाना जाता है । दूध को छानने के विकल्प के रूप में उस का स्वच्छीकरण (Clarification) भी किया जा सकता हैI दूध को छानने के लिए कपड़ा या छोटे छिद्रयुक्त पैड का प्रयोग किया जाता है ।

एकअच्छे छनने की निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए :

1. छिद्र इतने छोटे हो कि छोटे से छोटा धूल का कण भी पार न जा सके तथा छनने के ऊपर ही रुक जाए ।

2. कपड़ा या पैड को सहारा (Support) देने हेतु छनने को धातु के फ्रेम पर ठीक प्रकार से कसे, ताकि छनना दूध के दबाव के कारण फटे नहीं तथा छनने तथा फ्रेम के बीच से दूध न निकल सके ।

3. कपडे या पैड को सहारा देने हेतु धातु का छिद्र युक्त जाल या अन्य कुछ तार आदि लगा होना चाहिए जिससे दूध के दबाव के कारण छनना न फट सके ।

4. छने हुए तथा बिना छने दूध को अलग-अलग करने का अच्छा प्रबन्ध होना चाहिए तथा छने हुए दूध में बिना छना दूध न मिल पाये ।

5. दूध के छानने या छनने के धोने का समय बहाव का दबाव इतना रखा जाए ताकि वह टूट या फट न पाये ।

6. छनने की बनावट इस प्रकार की हो कि कपड़ा या पैड आसानी से बदला जा सके तथा उसके प्रत्येक हिस्से को साफ किया जा सके । ताकि लगातार कार्य करते समय पैड को बदलने में कोई परेशानी न हो ।

7. एक पैड या कपड़े को केवल एक बार ही प्रयोग किया जाना उचित होगा । प्रयोग किये गये पैड या कपड़े को धोकर दुबारा प्रयोग करने से दूध में संक्रमण (Contamination) बढने की सम्भावना बढ जाती है ।

स्वच्छीकरण (Clarification)  स्वच्छीकरण के लिए एक मशीन का प्रयोग करते हैं जिसे स्वछीकारक (Clarifier) कहा जाता है । यह रूप तथा रचना में अपकेन्द्री क्रीम पृथक्कारक (Centrifugal Cream Separator) की तरह का होता है ।

दूग्ध प्रसंस्करण के समय फिल्टर या क्लारीफर को पास्तुरीकरण मशीन में दूध के प्रवेश करने से पहले या पुनर्जनन भाग (Regeneration Section) के पास लगायी जाता है । क्लारीफर के उपयोग से दूध की गन्दगी को अधिक दक्षता के साथ निकल कर अलग किया जा सकता है जबकि फिल्टर मात्र धूल के छोटे कणों को ही निकालकर अलग करता है । क्लारीफर द्वारा दूध को साफ करते समय, उसके बाऊल में बाह्य पदार्थ जैसे दुख प्रोटीन, ल्युकोसाइट, अयन की दुग्थ कोशिकाएं, वसा, कैल्शियम फास्फेट, कुछ लवण, जीवाणु तथा कभी-कभी लाल रक्त कोशिकाएं भी एकत्र हो जाते हैं । इन पदार्थों को चीकट या कीचड़ (Clarifier Slime) कहा जाता है । 

6. दूध का समांगीकरण (Homogenization of Milk):

दूध को यदि किसी बर्तन में बिना हिलाये रख दिया उपस्थित वसा ऊपरी सतह पर क्रीम के रूप में एकत्र हो जाती है । स्प्रेटा दूध गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण नीचे बैठ जाता है । वसा कणों का आकार बढ्ने के साथ-साथ वसा की, उपरी सतह पर एकत्र होने की प्रवृति भी बढ जाती है । दूध को प्रसंस्करण के बाद काफी समय तक भंडारित करना समय परिवहन में दूध हिलता भी है । दूध के हिलने से भी वसा बड़े कणों के रूप में एकत्र हो जाती हैं । इस प्रकार दूध की वसा तथा स्प्रेटा दूध अलग-अलग होने से पूर्ण दूध की गुणवत्ता पर खराब प्रभाव पड़ता हैI 

वसा के पृथक्कीकरण को रेकने के लिए आवश्यक है कि दूध में वसा कणों को तोड़ कर इतना छोटा कर दिया जाए कि उसकी ऊपर उठने की प्रवृत्ति कम से कम रह जाए तथा दूध एक समांग विलयन (Homogeneous Solution) के रूप में बना रहे ।

इस प्रकार ”दूध में उपस्थित वसा कणों को तोड़ कर छोटा करने की किया समांगीकरण (Homogenization) कहलाती है ।” दूसरे शब्दों में हम इस प्रकार कह सकते है- ”समांगीकरण वह किया है जिसके द्वारा दूध की वसा गोलिकाओं को छोटी-छोटी गोलिकाओं में विभाजित किया जाता है ताकि दूध के भंडारण के समय उसके ऊपर क्रीम की पर्त (Cream Layer) सदा के रूप में वसा का एकत्रीकरण न हों तथा वसा दूध के समस्त आपतन में समान रूप में उपस्थित एवं वितरित रह सकें ।”

समांगीकरणयन्त्र (Homogenizer): यह एक मशीन होती है जो वसा गोलिकाओं को छोटे-छोटे कणों में विभक्त करती है । इसमें एक उच्च दबाव वाला Piston Pump लगा होता है जो दूध को उच्च दाब पर समांगीकरण वाल्व तथा इसकी सीट (Seat) के मध्य एक संकरे छिद्र से दाब द्वारा निकालता है ।

इस संकरे रास्ते में से होकर दबाव के साथ दूध के आने के कारण यह बहुत तेज गति से बहता है । फलस्वरूप वसा गोलिकाएं आपस में रगड कर तथा टकरा कर छोटे-छोटे कणों में विभक्त हो जाती है । जिस प्रकार से एक तेज गति से बहने वाली नदी में पत्थर टूट कर तथा रगड कर छोटे-छोटे आकार के हो जाते है । ठीक उसी प्रकार से इस यन्त्र के अन्दर वसा की बडी गोलिकाएं छोटी-छोटी गोलिकाओं में परिवर्तित हो जाता है । यन्त्र का वाल्व तथा Seat कठोर धात्वीय पदार्थ के बने होते है । 

7. दुग्ध आपूर्ति को सुरक्षित बनाना (Safeguarding the Milk Supply):

दूध की स्वच्छता (Milk Cleanliness) उसमें बाह्य पदार्थों की अनुपस्थिति को दर्शाती है जबकि दुग्ध सुरक्षितिकरण (Safeguarding) का अर्थ दूध को व्याधिजनक जीवाणुओं से मुक्त करना दर्शाता है । यह आवश्यक नहीं है कि साफ व स्वच्छ दूध उपभोग के लिए सुरक्षित भी होगा परन्तु सुरक्षित (Safe Milk) दूध हमेशा साफ व स्वच्छ ही होता है । मानव उपभोग के लिए दूध हमेशा साफ, स्वच्छ तथा सुरक्षित होना आवश्यक होता है ।

दूधकोसुरक्षितरखनेकीदोविधियाँहोतीहैं:

A. स्वच्छउत्पादनएवंस्वच्छतापूर्वकरखरखावकेद्वारा:

1. दूध का उत्पादन बिल्कुल स्वस्थ पशु से स्वच्छतापूर्वक कराया जाए ।

2. दूध से सम्बन्धित कार्य में लगे व्यक्ति पूर्णतया साफ, स्वच्छ व स्वस्थ हो ।

3. दूध के बर्तन धोने में व प्रसंस्करण में निर्जमीकृत पानी का प्रयोग किया जाए ।

4. मक्खियों आदि पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए ।

B. दुग्धपास्तुरीकरणद्वारा:

दूध को साफ व स्वच्छ करके एक निश्चित ताप पर उतने समय के लिए रखे कि उसमें उपस्थित सभी व्याधिजनक जीवाणु समाप्त हो जाए तथा पास्तुरीकृत दूध में अपास्तुरीकृत दूध का संक्रमण (Contamination) न हो ।

8. दूध का पास्तुरीकरण (Pasteurization of Milk):

पास्तुरीकरण में दूध के प्रत्येक कण को क निश्चित तापमान पर निश्चित समय के लिए गर्म करना जिससे उसमें उपस्थित सभी हानिकारक जीवाणु (Pathogenic Organism) नष्ट हो जाए तथा दूध की खाद्य महत्ता तथा संगठन पर कोई विशेष विपरीत प्रभाव न पड़े । पास्तुरीकरण के तुरन्त बाद दूध को भंडारण करने के लिए 4C तापमान पर ठण्डा किया जाता है ।”

    दूसरे शब्दों में अधिक स्पष्ट तौर पर हम यह भी कह सकते है कि ”दूध के प्रत्येक कण को कम से कम 145F तापमान पर 30 मिनट के लिए या 161F तापमान पर 15 सैकिंड के समय के लिए गर्म करना तथा तुरन्त ही 4-5C तापमान पर ठण्डा कर देने की प्रक्रिया को पास्तुरीकरण कहते है ।

दूध का निर्जमीकरण (Sterilization of Milk):

”वह दूध जो 100C या अधिक तापमान पर उतने समय के लिए गर्म किया जाए कि सामान्य ताप पर कम से कम 7 दिन तक उपभोग के लिए उपयुक्त अवस्था में रखा जा सके, निर्जमीकृत दूध कहलाता है ।”

इस क्रिया को निर्जमीकरण (Sterilization) कहा जाता है व्यवसायिक रूप में निर्जमीकृत दूध पूर्ण रूप से जीवाणु विहीन (Sterile) नहीं होता है क्योंकि इस तापमान एवं समय के संयोग पर स्पोर्स (Spores) बनाने वाले जीवाणु स्पोर अवस्था (Spore Form) में जीवित बने रहते हैं जो बाद में भंडरण के समय उपयुक्त दशायें मिलने पर वृद्धि (Growth) करके दूध को खराब कर देते है यदि इन स्पोर्स को नष्ट करने हेतु ताप या समय बढाया जाये तो दूध के सामान्य गुणों विशेष रूप से रंग व गंध पर विपरीत प्रभाव पडता है । फलस्वरूप पदार्थ की व्यवसायिक माँग धट जाती है ।