दूध का पास्तुरीकरण (Pasteurization of Milk)

 पास्तुरीकरण में दूध के प्रत्येक कण को एक निश्चित तापमान पर निश्चित समय के लिए गर्म करना होता है जिससे उसमें उपस्थित सभी हानिकारक जीवाणु (Pathogenic Organism) नष्ट हो जाए तथा दूध की खाद्य महत्ता तथा संगठन पर कोई विशेष विपरीत प्रभाव न पड़े । पास्तुरीकरण के तुरन्त बाद दूध को भंडारण करने के लिए 4C तापमान पर ठण्डा किया जाता है ।”

   दूसरे शब्दों में अधिक स्पष्ट तौर पर हम यह भी कह सकते है कि ”दूध के प्रत्येक कण को कम से कम 63C  तापमान पर 30 मिनट के लिए या 71.8C  तापमान पर 15 सैकिंड के समय के लिए गर्म करना तथा तुरन्त ही 4-5C तापमान पर ठण्डा कर देने की प्रक्रिया को पास्तुरीकरण कहते है । 

उच्चतापअल्पकालीनपास्तुरीकरण (High Temperature Short Time Pasteurization):

         इस विधि में प्रयोग होने वाले यन्त्र में कच्चा दूध एक तरफ से प्रवेश करता है तथा 71.8C ताप पर 15 सैकिंड के लिए पास्तुरीकृत होकर दूसरी तरफ से बाहर आना प्रारम्भ हो जाता है । अतः इस विधि में कार्य शुरू करने के 15 सैकिंड बाद पास्तुरीकृत दूध प्राप्त होना शुरू हो जाता है तथा कार्य चलने तक लगातार पास्तुरीकृत दूध प्राप्त होता रहता है । इस विधि में धारण विधि की भाँति पास्तुरीकृत दूध प्राप्त करने के लिए घण्टों प्रतीक्षा नहीं करनी पडती है । इस विधि का प्रयोग बडे पैमाने पर दूध को पास्तुरीकृत करने के लिए ही किया जा सकता है । छोटे पैमाने पर दूध के पास्तुरीकरण के लिए यह विधि उपयुक्त नहीं है । इस विधि में तमाम कार्य स्वचालित मशीनों द्वारा ही पूरा किया जाता है । अतः मानव श्रम (Man Power/Labour) की आवश्यकता कम पडती है ।

कुछ वर्षों पहले इस विधि में तापमान, समय तथा दूध के प्रवाह को नियंत्रित करने के यान्त्रिक साधन उपलब्ध नहीं थे अतः पहले इस विधि को फ्लैश (Flash) विधि के नाम से जाना जाता था । वर्तमान में मशीनों की गुणवत्ता अच्छी हो जाने से स्व-नियंत्रण यान्त्रिक तथा स्वचालित हो गया है और अब इस विधि को H.T.S.T. (High Temperature Short Time), उच्च ताप अल्प कालीन (पास्तुरीकरण) के नाम से जाना जाता है ।

उच्चतापअल्पकालीनपास्तुरीकरणयन्त्रकेप्रमुखभागोंमेंदुग्धपास्तुरीकरणकार्यइसयन्त्रकेविभिन्नभागोंकेकार्यनिम्नलिखितप्रकारसेहै:

1. फ्लोटनियन्त्रितसन्तुलनटैंक (Float Controlled Balance Tank):

यह, यन्त्र में कच्चे दूध की आप्रर्ति को नियन्त्रित करता है तथा F.D.V. से वापिस आये अपास्तुरीकृत दूध को प्राप्त करता है ।

2. पम्प (Pump):

दूध के बहाव को नियन्त्रित करने के लिए पम्प का प्रयोग करते हैं । Regenerator तथा Heater के मध्य Rotary Positive Pump या Balance Tank के एक दम बाद Centrifugal Pump का प्रयोग किया जाता है ।

3. प्लेटस (Plates):

सामान्य रूप से H.T.S.T. प्रणाली में Plate Heat Exchanger का प्रयोग किया जाता है । ये अवकारी इस्पात (Stainless Steel) की बनी होती है । ये प्रत्येक इकाई में Press द्वारा कसी रहती हैं । दो प्लेटों के बीच लगभग 3 मी.मी. का खाली स्थान रखा जाता है । इस खाली स्थान में एकान्तर प्लेटों (Alternate Plates) के मध्य दूध बहता है तथा शेष एकान्तर प्लेटों के बीच खाली स्थान में गर्म या ठण्डा (आवश्यकतानुसार) पानी विपरीत (Opposite) दिशा में प्रवाहित होता है ।

Regenerator की Alternate Plates में पास्तुरीकृत तथा कच्चा दूध एक-दूसरे के विपरीत दिशा में बहता है । जहां पास्तुरीकृत दूध से प्लेट गर्म होकर उसके दूसरी तरफ बहने वाले कच्चे दूध को गर्म करती है । इसी प्रकार पास्तुरीकृत दूध ठण्डा होता रहता है ।

दूध की मात्रानुसार प्लेटों की संख्या कम या अधिक रखी जा सकती है प्लेटों के ऊपरी व निचले सिरे पर उचित छिद्र होते है जिनके माध्यम से दूध एवं गर्म या ठण्डा पानी एकान्तर प्लेटों में बिना एक दूसरे में मिले बहता रहता है ।

4. पुनर्जनन (गर्मकरना) (Regeneration-Heating):

सन्तुलन टैंक (Balance Tank) से यन्त्र में आया हुआ कच्चा दूध शीतक (Cooler) में जाने से पूर्व पुनर्जनन भाग में पास्तुरीकृत दूध से गर्म होता है । इस विधि को दूध से दूध पुनर्जनन (Milk to Milk Regeneration) कहा जाता है । इससे कार्य में ऊर्जा व समय की बचत होती है । आगे इस कच्चे दूध को गर्म करने में कम ऊर्जा की आवश्यकता पडती है । इस भाग में 40F ताप युक्त कच्चा दूध 120F तापमान तक गर्म हो जाता है ।

5. छन्ना (Filter/Clarifier):

पुनर्जनन भाग के बाद 40 से 90 Mesh Cloth का एक फिल्टर दूध को छानने के लिए लगाया जाता है । सामान्य रूप से दो छन्ने लगाने जाते हैं । परन्तु एक समय में केवल एक ही छनना कार्य करता है ।

6. उष्मक (Heater):

छन्ना से छना हुआ दूध सीधा या समांगीकारक (Homogenizer) से होता हुआ उष्मक (Heater) में आ जाता है । यहाँ पर लगी प्लेटस में दूध को गर्म पानी की सहायता से 72C ताप तक गर्म किया जाता है । इस गर्म दूध को 15 सैकिंड तक इस ही तापमान तक धारण किया जाता है यह ध्यान रखने की बात है कि इन 15 सैकिंड में Holding Tubes में दूध का तापमान 71.8C से कम न होने पाये ।

7. धारक (Holders):

तापन के तुरन्त बाद दूध धारण कुण्डल (Holding Rules) या धारण प्लेटस (Holding Plates) में से गुजरता है । इनकी क्षमता तथा दूध के प्रवाह की गति में एक सम्बन्ध होता है जिससे दूध को इनसे गुजरने में 15 सैकिड का समय लगता है तथा दूध का तापमान 15 सैकिंड तक 71.8C रहता है ।

8. प्रवाहपथान्तरवाल्व (Flow Diversion Valve):

धारण कक्ष से दूध F.D.V. में आता है । इस वाल्व से दूध Balance Tank या Regeneration Chamber तथा Cooler में से होता हुआ भंडारण टैंक (Storage Tank) या Packaging Machine में जाता है ।

दूध का तापमान यदि 71.8C से कम हो जाए तो दूध F.D.V. से Divert होकर पुनः पास्तुरीकरण होने के लिए कर F.C.B.T. (Float Controlled Balance Tank) में चला जाता है । तापमान 71.8C या अधिक होने पर दूध का प्रवाह पुनर्जनन भाग की ओर जाता है । यहाँ से ठंडा होता हुआ दूध अन्तिम शीतलन के लिए Cooler में तथा Cooler में तथा Storage Tank में या Packaging Machine में चला जाता है ।

9. पुनर्जनन (शीतलन) [Regeneration (Cooling)]:

पास्तुरीकरण गर्म दूध F.D.V. से निकलकर पुनर्जनन भाग में Milk to Milk Regeneration क्रिया द्वारा ठण्डा लिए जाता है । यहाँ पर दूध के शीतलन कार्य में ऊर्जा की बचत होती है क्योंकि गर्म दूध Cooler में जाने से पहले Regeneration Section में, Balance Tank लिए आने वाले कच्चे ठण्डे दूध से काफी निम्न तापमान तक ठण्डा हो जाता है । पुनर्जनन 70-80% तक दक्षतापूर्ण हो जाता है । इस क्रिया में गर्म दूध 142F से 82F तथा 40F का ठण्डा दूध (कच्चा) 120F तक गर्म हो जाता है ।

10. शीतलक (Cooler):

पुनर्जनन भाग से दूध ठण्डा होने के लिये Coolers में प्रवेश करता है यहाँ पर शीतलक की प्लेट्स से होता हुआ गर्म दूध पहले ठंडे जल से तथा बाद में अवशीतित जल से ठण्डा होकर भंडारण टैंक में चला जाता है ।

कमसमयउच्चताप (H.T.S.T.) विधिकेलाभ:

1. अधिक मात्रा में दूध को पास्तुरीकृत करने की यह एक उत्तम विधि है ।

2. इस विधि द्वारा पास्तुरीकृत दूध की गुणवत्ता उत्तम रहती है ।

3. इस विधि में कम स्थान की आवश्यकता होती है ।

4. यह एक सतत विधि है अतः एक बार कार्य प्रारम्भ होने के बाद सतत रूप से पास्तुरीकृत दूध उपलब्ध होता रहता है ।

5. चूँकि अधिक मात्रा में दूध को पास्तुरीकृत किया जाता है अतः प्रति इकाई कम खर्च आता है ।

6. स्वचालित मशीनों का प्रयोग होता है अतः मानव ऊर्जा व समय दोनों की बचत होती है ।

7. पास्तुरीक्तण के तुरन्त बाद पैकिंग का कार्य प्रारम्भ हो जाता है ।

8. यन्त्र आसानी से साफ व स्वच्छ किया जा सकता है ।

9. पास्तुकरण यन्त्र (HTST) की क्षमता केवल प्लेटों की संख्या बढाकर अपेक्षाकृत् काफी कम खर्च से बढ़ाई जा सकती है ।

10. संसाधन (Processing) में होने वाले दुग्ध ठोस की हानि को घटाता है ।