नकड़ारोग (नेजल ग्रेनुलोमा): जानकारी एवं बचाव

यह एक फ्लूक है। जो सिस्टोसोमा नामक परजीवी की प्रजाति से होता है, यह परजीवी पशु के नाक के अंदर पाया जाता है तथा होने वाली बीमारी को सिस्टोसोमोसिस या नकड़ा रोग कहते है। इसके कारण पशु कमजोर हो जाते है। कभी-कभी इसके काटने पर बहुत खून के स्त्राव के कारण पशु की मृत्यु भी हो जाती है।

कारकः सिस्टोसोमा प्रजाति

इसमें नर व मादा अलग-अलग होते है। इनका आकार लम्बाकार (धागे की तरह) होता है तथा यह पशुओ की नाक में श्लेष्मा झिल्ली के नीचे रक्त शिराओं में प्रायः रहतें है। यह रोग भेड़ बकरी सहित अन्य बडे जानवरो में भी पाया जाता है। सरकेरिया के मनुष्य की त्वचा मे प्रवेश करने पर खुजली के लक्षण प्रकट होते है।

सिस्टोसोमा का जीवन चक्रः  

सिस्टोसोमा के जीवन की एक अवस्था घोंघे में पूरी होती है सरकेरिया अवस्था इसी घोघे से बाहर निकलकर पानी में घूमते रहते है। पशुओ के चरने के दौरान ये परजीवी पशु की त्वचा के सम्पर्क में आकर उसमें अंदर घुस जाते है तथा रक्त वाहिका के द्वारा उसके नाक में पहुंच जाते है। इसमें नर व मादा अलग-अलग बनते है। मादा बड़ी संख्या में अण्डे देती है। यही अण्डे नाक के स्राव द्वारा या गोबर के साथ बाहर आ जाते है। तथा इन अण्डो से निकली हुई मिरासिडियम अवस्था पुनः उपयुक्त घोंघो की तलाश करके उसमे प्रवेश कर जाते है। घोंघो से सरकेरिया अवस्था बाहर निकलकर पशुओ के शरीर में पहुंच जाती है।

लक्षणः

1. बार-बार छींक आना।

2. मवाद का बाहर आना।

3. ष्लेश्मा झिल्ली में सूजन हो जाना।

4. छोटी-छोटी गांठे नाक में बन जाती है जिससे सांस लेने में रूकावट तथा घर्र-घर्र की आवाज सुनायी देती है। 

5. आवाज के कारण इसको स्नोरिंग डिजीज भी कहतें है।

6. पशु बेचैन रहता है तथा कमजोर हो जाता है।

रोग की पहचानः 

गोबर की जांच करके, नाक के द्वारा बाहर आए हुए स्राव की जांच करके, लक्षणो के आधार पर।

उपचार

प्राजीक्वांटेल इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त कृमिनाशक है इसके अलावा टार्टारइमेटिक, एन्थियोमैलिन, सोडियम एन्टीमनी टारट्रेट आदि प्रकार के कृमिनाषक उपचार में कारगर है। परन्तु इनका उपयोग नजदीकी पशु चिकित्सक की सलाह पर ही करना चाहिए।

बचावः

1. बीमार जानवर का इलाज करके।

2. साफ एवं स्वच्छ पानी देकर। 

3. पानी के स्त्रोतो जैसे तालाब का तार से घेराव करके।

4. रूके हुए पानी को बहा देना, हो सके तो बांध करके जानवरो को चारा दे।

5. जो चारागाह इस परजीवी से दुशित हो उसमें जानवर को चराने से रोककर।

6. घोंघो का नियत्रण।

7. मोलस्कीसाइड का उपयोग करना जैसे कापरसल्फेट बेलुसाइड, फिस्कान आदि के द्वारा।

8. बत्तख को पालकर एवं घोंघो की आबादी को भौतिक शक्ति द्वारा नष्ट करना।