पशुओं की सामान्य बीमारियां  उपचार एवं टीकाकरण

  1. विषाणु जनित रोग
  1. खुरपका एवं मुह पका रोग 


   यह बहुत तेज़ी फैलने वाला  एक  विषाणु जनित रोग रोग है जोकि गाय, भैंस, भेड़, बकरी एवं सुअर आदि पशुओं में पाया जाता है  है| मुंहपका-खुरपका रोग एक अत्यन्त सुक्ष्ण विषाणु जिसके अनेक प्रकार तथा उप-प्रकार है, से होता है| संकर नस्ल  की गायों में यह बीमारी अधिक गम्भीर रूप से पायी जाती है| यह रोग बीमार पशु के सीधे सम्पर्क में आने, पानी, पशु चारा एवं दाना , बर्तन, दूध निकालने  वाले व्यक्ति के हाथों से, हवा से तथा लोगों के आवागमन से फैलता है| रोग के विषाणु बिमार पशु की लार, मुंह, खुर व थनों में पड़े फफोलों में बहुत अधिक संख्या में पाए जाते हैं| 


रोग के लक्षण :- यह रोग मुख्य रूप से ठण्ड के दिनों में ज्यादा होता है I रोग ग्रस्त पशु को 104-1060F तक  तेज़ बुखार हो जाता है| वह खाना-पीना व जुगाली करना बन्द कर देता है|दूध का उत्पादन गिर जाता है| मुंह से लार बहने लगती है तथा मुंह हिलाने पर चप-चप की आवाज़ आती हैं इसी कारण इसे चपका रोग भी कहते है बाद पशु के मुंह के अंदर,गालों,जीभ,होंठ तालू व मसूड़ों के अंदर,खुरों के बीच तथा कभी-कभी थनों पर छाले पड़ जाते हैं| ये छाले फटने के बाद घाव का रूप ले लेते हैं जिससे पशु को बहुत दर्द होने लगता है| मुंह में घाव व दर्द के कारण पशु खाना  बन्द कर देते हैंI  खुरों में दर्द के कारण पशु लंगड़ा चलने लगता है| गर्भ धारित पशुओ  में कई बार गर्भपात भी हो जाता है|  नवजात बछड़े एवं बछड़ी बिना किसी लक्षण दिखाए मर जाते है| लापरवाही होने पर पशु के खुरों में कीड़े पड़ जाते हैं तथा कई बार खुरों के कवच भी निकल जाते हैं| इस रोग में  पशु मृत्यु दर कम (लगभग 10%) होती है लेकिन इस रोग से पशु पालक को आर्थिक हानि बहुत ज्यादा उठानी पड़ती है| दूध देने वाले पशुओं में दूध के उत्पादन में कमी आ जाती है| ठीक हुए पशुओं का शरीर खुरदरा तथा उनमें कभी कभी हांफना रोग होजाता है| 

उपचार:इस रोग का कोई निश्चित उपचार नहीं है लेकिन  बीमारी की गम्भीरता को कम करने के लिए लक्षणों के आधार पर पशु का उपचार किया जाता है| संक्रमण को रोकने के लिए उसे पशु चिकित्सक की सलाह पर एंटीबायोटिक एवं दर्द निवारक इंजेक्शन  लगाए जाते हैं| मुंह व खुरों के घावों को फिटकरी या  पोटाश के पानी से धोते हैं|साथ ही घावों पर एंटी सेप्टिक मलहम लगाते हैI  

टीकाकरण एवं रोकथाम:  इस बीमारी से बचाव के लिए पशुओं को  वर्ष में दो बार टीके अवश्य लगवाने चाहिए| गो एवं भैस वत्सो  में पहला टीका कम से कम  4 माह की आयु में, तदोपरांत  बूस्टर डोज 1 माह बाद और उसके बाद  प्रति 6 माह पश्चात टीके लगाए जाने चाहिए|बीमारी हो जाने पर रोग ग्रस्त पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए| पशुओं के आवागमन, खरीद पशुमेला इत्यादि पर रोक लगा देना चाहिए| पशुशाला को साफ-सुथरा रखना चाहिएI इस बीमारी से मरे पशु को को खुला न छोड़कर गाढ़ देना चाहिए|

  1. जलांतक  (रेबीज)

     यह अत्यंत  ही खतरनाक विषाणु जनित रोग है और लैसा नामक विषाणु से फैलता है   यह रोग ज्यादातर कुत्तो एवं बिल्ली के काटने से फैलता है यह विषाणु  स्वस्थ पशु के शरीर में प्रवेश करते हैं तथा नाडियों के द्वारा मस्तिष्क में पहुंच कर उसमें बीमारी के लक्षण पैदा करते हैं| रोग ग्रस्त पशु की लार में यह विषाणु बहुतायत में होता है यह बीमारी रोग ग्रस्त पशुओं से मनुष्यों में भी आ सकती है अत: इस बीमारी का जन स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत महत्व है| अभी तक इस रोग का कोई उपचार नहीं खोजा जा सका है   विषाणु के शरीर में घाव आदि के माध्यम से प्रवेश करने के बाद कुछ  दिनों से लेकर  कई महीनो तक की अवधि में यह बीमारी हो सकती है| चेहरे पर काटे गए पशु में एक हफ्ते के बाद यह रोग पैदा हो सकता है|


लक्षण :-   श्वानो में यह  रोग  दो रूप में मिलता है पहले रूप में रोग ग्रस्त पशु काफी भयानक हो जाता है तथा दूसरा जिसमें वह बिल्कुल शांत रहता है|पहले अथवा उग्र रूप में पशु में रोग के सभी लक्षण स्पष्ट दिखायी देते हैं लेकिन शांत रूप में रोग के लक्षण बहुत कम दिखाई देते  हैं|

      गाय व भैंसों में इस बीमारी के भयानक रूप के लक्षण दिखते हैं| पशु काफी उत्तेजित अवस्था में दिखता है तथा बिना किसी कारण इधर उधर  भागने की कोशिश करता हैं| वह ज़ोर-ज़ोर से रम्भाने लगता है I पशु  अपने सिर को किसी पेड़ अथवा दीवार से टकराता है| कई पशुओं में मद के लक्षण भी दिखायी से सकते हैं| रोग ग्रस्त पशु  दुर्बल हो जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है|मनुष्य में इस बीमारी के प्रमुख लक्षणों में उत्तेजित होना, पानी अथवा कोई खाद्य पदार्थ को निगलने में काफी तकलीफ महसूस करना तथा अंत में लकवा लकवा होना आदि है|

उपचार तथा रोकथाम:-      एक बार लक्षण पैदा हो जाने के बाद इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है| जैसे ही किसी स्वस्थ पशु को इस बीमारी से ग्रस्त पशु काट लेता है उसे तुरन्त नजदीकी पशु चिकित्सालय में ले जाकर इस बीमारी से बचाव का टीका लगवाना चाहिए| इस कार्य में ढील बिल्कुल नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि ये टीके तब तक ही प्रभावकारी हो सकते हैं जब तक कि पशु में रोग के लक्षण पैदा नहीं होते|पालतू कुत्तों को इस बीमारी से बचने के लिए नियमित रूप से टीके लगवाने चाहिएI

टीकाकरण: रोग ग्रस्त पशु के काट लेने के पश्चात निम्नलिखित टीकाकरण समय सारिणी का पालन करना चाहिए  

प्रथम डोज़: काटने वाले दिन          चतुर्थ डोज़:  14वे दिन 

द्वितीय डोज़:  3रे  दिन                  पंचम डोज़: 28 वे दिन 

तृतीय डोज़:   7वे दिन                   छठवा डोज़:  90 वे दिन 

()जीवाणु जनित रोग

 (1) गलघोंटू रोग (एच.एस.):


     गाय व भैंस वंशीय पशुओ में  संपर्क से फैलने वाला  बहुत ही घातक  रोग है यह रोग पास्चुरेल्ला नामक जीवाणु से फैलता है यह रोग  अधिकतर बरसात के मौसम में होता है यह गो वंश की अपेक्षा भैंस वंशीय पशुओं में अधिक पाया जाता है| यह रोग बहुत तेज़ी से फैलकर बड़ी संख्या मे पशुओं को अपनी चपेट में ले लेता है I कईं बार बिना किसी स्पष्ट लक्षणों के ही पशु की अचानक मृत्यु हो जाती है| इस बीमारी  पशु पालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है| इस रोग से ग्रसित एवं जीवित पशुओ में मुख्य रूप से 106F तक तेज़ बुखार, गले में सूजन, सांस लेने में तकलीफ  मुह खोल कर सांस लेना तथा सांस लेते समय तेज़ घर्र घर्र की आवाज आदि लक्षण आते  है| 

उपचार तथा रोकथाम:- इस रोग से ग्रस्त हुए पशु को तुरन्त पशु चिकित्सक को दिखाना चाहिए अन्यथा पशु की मृत्यू हो जाती है| सही समय पर उपचार दिए जाने पर रोग ग्रस्त पशु को बचाया जा सकता है| इस रोग में मुख्य रूप से लक्षण आधारित दवाओं के साथ सेफ्टीफर सोडियम या सल्फा एंटीबायोटिक दिया जाता हैI रोगी पशु को अन्य पशुओ से दूर रख कर देखभाल करनी चाहिए  साथ ही रोग ग्रस्त पशु के अपशिस्ट एवं चारे को उचित स्थान पर नष्ट करना चाहिएI

टीका करण: इस रोग की रोकथाम के लिए वर्षा ऋतू के पूर्व रोगनिरोधक टीके लगाए जाते हैं| पहला टीका 6 माह की आयु में तथा इसके बाद प्रतिवर्ष यह टीका लगाया जाता हैं| ये टीके सरकारी पशु चिकित्सा संस्थानों द्वारा नि:शुल्क लगाए जाते हैं| 

(2) एक टंगिया या लंगड़ा बुखार (ब्लैक क्वाटर):


     यह रोग क्लॉस्ट्रीडियम नामक जीवाणु से फैलता है I यह रोग गाय व भैंसों दोनों में होता है लेकिन  गोपशुओं में यह बीमारी अधिक देखी जाती है तथा इससे ज्यादातर स्वस्थ एवं बड़े पशु ही  प्रभावित होते हैं| इस रोग में ज्यादातर पिछले पैरों के ऊपरी भाग में भारी सूजन आ जाती हैं जिससे पशु लंगड़ा कर चलने लगता है तथा प्रभावित हिस्से को ऊपर रखते हुए  बैठ जाता है| पशु को तेज़ बुखार आता है तथा सूजन वाले स्थान को दबाने पर चुर चुर की आवाज़ आती है|

उपचार तथा रोकथाम:- रोग ग्रस्त पशु के उपचार हेतू लक्षण आधारित दवाओं के साथ मुख्य रूप से पेनिसिलिन एंटीबायोटिक  दी जाती है I उपरोक्त उपचार किसी पशु चिकित्सक के माध्यम से ही कराना चाहिए I देर करने से पशु को बचाना लगभग असंभव हो जाता है I 

टीकाकरण:  इस बीमारी से बचाव के लिए सरकारी पशु चिकित्सा संस्थाओं में रोग निरोधक टीके नि:शुल्क लगाए जाते है पहला टीका 6 माह या अधिक आयु  में  तथा प्रतिवर्ष वर्षा ऋतू के पूर्व लगाए जाते हैंI 

 (3) ब्रुसिल्लोसिस:


     जीवाणु जनित इस रोग में गोपशुओं तथा भैंसों में गर्भवस्था के अन्तिम त्रैमास में गर्भपात हो जाता है| यह रोग पशुओं से मनुष्यों में भी आ सकता है|  पशुओं में गर्भपात से पहले योनि से अपारदर्शी पदार्थ निकलता है तथा गर्भपात के बाद पशु की जड़ रुक जाती है| इसके अतिरिक्त यह जोड़ों मेंसूजन पैदा कर सकता है या हाईग्रोमा (एक प्रकार की गांठ) घुटनों पर बन जाता है|

उपचार रोकथाम:- अब तक इस रोग का कोई प्रभाव कारी इलाज नहीं हैं| परन्तु लक्षण आधारित उपचार के साथ ओक्सीटेट्रासयिक्लिन एंटी बायोटिक कुछ हद तक  कारगर है  परन्तु कोई भी उपचार पशु चिकित्सक के माध्यम से करवाना चाहिए I यदि  किसी स्थान पर  इस  रोग के  अधिक पोजिटिव केस हों तो रोग की रोकथाम के लिए बछडियो में 4-8 माह की आयु में ब्रुसेल्ला-अबोर्टस स्ट्रेन-19 के टीके लगाए जा सकते हैं| इस बीमारी से ग्रसित पशु को प्रज़नन हेतु उपयोग नहीं करना चाहिए उपचार करने वाले पशु चिकित्सक को अत्यंत सावधानी पूर्वक उपचार करना चाहिए I

  1. थनैला रोग  

थनैला दुधारू पशुओं को होने वाला एक अत्यंत घातक  रोग हैI एक अनुमान के मुताबिक इस बीमारी से पूरे भारत में प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये का नुकसान होता हैं, जो अतंतः पशुपालकों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता हैं। थनैला रोग कई प्रकार  के जीवाणु ,विषाणु, माइकोप्लाज्मा एवं फफूंद से हो सकता है I इसके अलावा चोट तथा मौसमी प्रतिकूलताओं के कारण भी थनैला हो जाता हैं यह बीमारी सामान्यतः गायभैंस, भेड़ एवं बकरी   में मुख्य रूप से पायी जाती हैI रोग  से प्रभावित पशुओं में थन गर्म हो जाता हैं , दर्द होता है एवं सूजन आ जाती है। शारीरिक तापमान भी बढ़ जाता हैं। लक्षण प्रकट होते ही दूध की गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूध में दही के सामान थक्का बनने लगता है I कभी – कभी खून एवं मवाद आता हैI  पशु खाना-पीना छोड़ देता है एवं अरूचि से ग्रसित हो जाता हैं। रोग पुराना होने पर अयन में फाइब्रोसिस हो जाती है और पशु की दुग्ध उत्पादन क्षमता ख़त्म हो जाती है I यह  बीमारी लगभग सभी मौसमो में होती है परन्तु बारिश के दिनों में अधिक होती हैI 

उपचार 

इस रोग में लक्षण आधारित उपचार के साथ ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक दिए जाते है ये एंटीबायोटिक मुख्य रूप से इंजेक्शन या सीधे थनों में इंट्रा मेमरी टयूब से दिए जा सकते हैI यदि बीमारी को कुछ ही समय बीता है तो बर्फ से अयन की सिकाई करनी चाहिए यदि बीमारी को 7 दिवस से ऊपर हो गया है तो गर्म सिकाई करनी चाहिए I यह उपचार किसी पशु चिकित्सक की सलाह पर ही करवाना चाहियेI 

रोकथाम:

अभी तक इस बीमारी का कोई टीका नहीं बना है I अतः सावधानी ही सबसे महत्वपूर्ण हैI गाभिन पशु को शुष्क ( दूध छोड़ते) करते  समय   एंटी बायोटिक इंट्रा मेमरी टयूब चारो थनों में डाल देना चाहिए I दुग्ध दोहन से पूर्व अच्छी तरह हाथ धोना चाहिएI बीमार पशु का दूध अंत में निकालना चाहिए  दुग्ध शाला में नियमित सफाई करते रहना चाहिए I

(ग) बाह्म तथा अंत: परजीवी जनित रोग एवं नियंत्रण

  1. पशुओं में बाह्य परजीवी रोग एवं नियंत्रण


     पशुओं के शरीर पर बाह्म परजीवी जैसे कि जुएं,पिस्सु या चिचडी आदि प्रकोप सामान्यतः पाया जाता  हैं ये बाह्य परजीवी खून चूसते हैं  जिससे पशुओ में खून की कमी हो जाती है तथा वे कमज़ोर हो जाते हैं| इन पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता घट जाती है तथा ये पशु थेलेरिओसिस, बबेसिओसिस, सर्रा जैसी घातक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं| अतः  पशुओं में बाह्म परजीवी के प्रकोप को रोकने के लिए अनेक दवाइयां जैसे आईवरमेक्टिन, डोरामेक्टिन इंजेक्शन, डेल्टामेथ्रिन, अमित्राज़ आदि  उपलब्ध हैं जिन्हें पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार प्रयोग करके इनसे बचा जा सकता है|

(2) पशुओं में अंत:परजीवी रोग एवं नियंत्रण 


 पशुओं के पाचन तंत्र  में अनेक प्रकार के परजीवी पाए जाते हैं जिन्हें अंत: परजीवी कहते हैं| ये पशु के पेट, आंतों, यकृत से पोषक तत्त्व एवं रक्त चूस कर पशु को अत्यंत  कमज़ोर कर देते हैं  जिससे  वह  फेसियोलोसिस, गिड, हीमोंकोसिस, एम्फीसटोमोसिस जैसी बीमारियों का शिकार हो जाता है| इससे पशु की उत्पादन क्षमता में भी कमी आ जाती है| पशुओं को उचित आहार देने के बावजूद यदि वे कमजोर दिखायी दें तो ग्रसित पशु के  गोबर के नमूनों का  परीक्षण करवा लेना  चाहिए|  पॉजिटिव रिपोर्ट आने पर तुरंत पशु चिकित्सक से उपचार कराना चाहिए I अन्तः परजीवी  नियंत्रण हेतु अल्ब्नेडाज़ोल, ओक्सीक्लोज़ेनाइड, फेनबेनडाज़ोल आदि कई प्रकार की कृमिनाशक दवाईया उपलब्ध है  इन दवाओं को गोबर की जांच रिपोर्ट के आधार पशु चिकित्सक की सलाह पर देना चाहिएI साथ ही इनकी रोकथाम हेतु प्रति तीन महीने में और नवजात में १५ दिनों की आयु में पशु चिकित्सक की सलाह पर कृमिनाशक दवाईया देना चाहिए I

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