पशुओं में क्षयरोग/ तपेदिक ( ट्यूबरक्लोसिस/ टी०बी०) के कारण, लक्षण, बचाव एवं रोकथाम

क्षय रोग पशुओं में एक दीर्घकालीन संक्रामक छूतदार बहुत ही खतरनाक जूनोटिक अर्थात पशुजन्य रोग है,  और ये पशुओं से इंसानों और इंसानों से पशुओं में भी फैल सकता है। मनुष्य के स्वस्थ्य के रक्षा के लिए इस रोग से काफी सतर्क रहने की जरूरत है। 

  1. पशुओं में यह रोग माइकोबैक्टेरियम बोविस तथा मनुष्यों में माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस नामक जीवाणु से होता है। दोनों प्रजातियां पशु एवं मनुष्यों में क्षय रोग उत्पन्न कर सकती हैं।
  2. गाय, भैंस, बकरी, भेड़, शुकर, बिल्ली , घोड़ा, कुत्ता,  ऊंट, पक्षियों, मनुष्यो, जंगली पशु  प्रभावित होते हैं। 
  3. इस रोग के जीवाणु संक्रमित पशुओं के दूध, लार, मल अथवा नाशिका श्राव मैं विसर्जित होते हैं। 
  4. रोग कf संक्रमण स्वास या आहार नली, भोजन, पानी या दूध से होता है।
  5. दूध पीने वाले नवजात बच्चों को या युवा बछड़ों में इस रोग का संक्रमण पाचन तंत्र के मार्ग द्वारा होता है। बछड़ों में जन्मजात क्षय रोग भी हो सकता है। 
  6. यह  रोग  एक संक्रमित पशु से दूसरे स्वस्थ्य पशु के सम्पर्क में आने से भी आसानी से फैलता है। 
  7. यह रोग पशुओं से मनुष्यो में भी फैलता है।
  8. मनुष्यों में यह संक्रमण संक्रमित पशुओं के संसर्ग में रहने वाले या संक्रमित पशु के रोग पशु का कच्चा दूध एवं बिना पाश्चुरीकृत दूध व ऐसे दूध से बने पदार्थों का सेवन या कच्चा या अधपका मांस का सेवन करने से भी यह रोग हो जाता है। 
  9. यह रोग आम तौर पर फेफड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकता हैं। 

लक्षण

  1. लंबे समय तक सूखी खांसी, श्वांस में कठिनाई, भूख में कमी,शुष्क चमड़ी,कार्यक्षमता में कमी एवं कन्धे और पुट्ठै की लसिका ग्रंथियो के आकार में वृद्धि तथा उसके फेफड़ों में सूजन हो जाती है। कभी – कभी नाक से खून निकलता है। 
  2. इस बीमारी से प्रभावित पशुओं में हल्का ज्वर (102-103 डिग्री फैरनहाइट) रहता है।
  3. पशु कमजोर और सुस्त हो जाता है। 
  4. कभी-कभी थनैला रोग की समस्या भी पायी जाती हैं। 
  5. अंतिम अवस्था में पशु अत्यंत दुबला पतला हो जाता है।

निदान 

सामान्यता पीड़ित पशु में क्षय रोग पहचानना अत्यंत कठिन होता है। संदेह होने पर संक्रमित पशुओं को पशु चिकित्सक से पशु जाँच कराने पर पशु के क्षय रोग से पीड़ित होने की संभावना व्यक्त करता है ता रोगी पशुओं को तुरंत बाड़े के अन्य पशुओं से अलग करना चाहिए क्योंकी यह एक असाध्य रोग है।

बचाव,  रोकथाम एवं उपचार

  1. पशुओं में क्षय रोग की कोई संतोषजनक चिकित्सा नहीं है और ना ही कोई टीका उपलब्ध है। 
  2. मनुष्य पाश्चुरीकरण युक्त दूध का ही सेवन करें या दूध को ठीक प्रकार से उबालकर दूध का सेवन करें
  3. मनुष्य में इस रोग से बचाव के लिए बीसीजी का टीका बच्चों को कम उम्र में लगाया जाता है।
  4. इस बीमारी की रोकथाम में बहुत समय लगता है। 
  5. टीबी के उपचार में एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग करके बैक्टीरिया को मारा जाता है। 
  6. माइक्रोबैक्टीरिया कोशिका दीवार की असामान्य संरचना और रासायनिक संघटन के कारण प्रभावी टीबी का उपचार कठिन है, जो कि दवाओं के प्रवेश को बाधित करते हैं और कई एंटीबायोटिक दवाओं को अप्रभावी करते हैं।
  7. स्टृप्टोमाइसिन, रिफाम्पिसिन, आइसोनियाजिड का संयुक्त तरीके से लंबे समय (कम से कम 6 माह) तक प्रयोग करना चाहिए जो लाभकारी प्रभाव दिखाता है।
  8. खनिज तत्वो व विटामिन से पूर्ण पौष्टिक आहार देना चाहिए|
  9. पशुशाला में पशुओं के रहने  का स्थान पर्याप्त व हवादार होना चाहिए एवं उसमें दिन के समय सूर्य का प्रकाश अवश्य आता हो।
  10. पशुओं के बाड़े को साफ-सुथरा रखना चाहिए साफ-सफाई का बेहतर प्रबंधन,  नियमित विसक्रंमण का प्रबंध करना चाहिए।  
  11. जो व्यक्ति पशुओं की देखभाल करता हो वह भी क्षय रोग से मुक्त हो।
  12. बीमार पशुओं की देख-भाल करने वाले व्यक्ति को भी स्वस्थ पशुओं के बाड़े से दूर रहना चाहिए|
  13. बीमार पशुओं के आवागमन पर रोक लगा देना चाहिए|
  14. रोग से प्रभावित क्षेत्र से पशु नहीं खरीदना चाहिए| 
  15. रोगी पशु के गोबर, मूत्र, शराव एवं चारे आदि को जला देना चाहिए या गहरे गड्ढे में गाड़ देना चाहिए। 
  16. पशुशाला यदि पक्की है तो उसे जीवाणुनाशक औषधि 5% फिनोल अथवा 5% फॉर्मलीन के घोल से भली-भांति धोना चाहिए।
  17. इस बीमारी से मरे पशु के शव को खुला न छोड़कर गाढ़ देना चाहिए|