पशुओं में गर्भाधान: सामान्य जानकारी


गर्भाधान वह प्रक्रिया है जिसमें मादा पशु नर पशु से समागम के बाद गर्भधारण करती है। हमारे देश की उत्तम नस्ल की अच्छे प्रबंधन में फार्म पर पली बछिया प्रायः 2) वर्ष तथा भैंस की पड़िया प्रायः 3) वर्ष में गर्भ धारण करने योग्य हो जाती है, लेकिन ग्रामीण परिवेश में बछियों के गर्भधारण करने का यह समय प्रायः 5 या 6 वर्ष के बाद ही आता है। इसी तरह संकर नस्ल की बछिया सरकारी या गैर सरकारी फार्म पर 1) से 2 साल में ही गर्भधारण करने योग्य हो जाती है।, लेकिन यही बछिया जब गाँव में किसान के पास होती है तो उसको गर्भधारण करने में 4-5 साल लग जाते हैं।
सफल गर्भाधान एवं पूर्ण रूप से गर्भधारण करने योग्य होने के लिए मादा पशुओं के शारीरिक विकास के साथ-साथ उसके जननेन्द्रियों का विकास भी बहुत आवश्यक है। अनेक प्रकार की खनिज लवणों की कमी के कारण एवं कुपोषण के कारण मादा जननांगों का समुचित विकास नहीं हो पाता और गर्भाधान में समस्या बनी रहती है, या गर्भाधान देर से होता है। गर्भाधान एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और परिपक्व नर पशुओं द्वारा नैसर्गिक रूप से गर्भाधान ही प्राकृतिक गर्भाधान है। पशु पालकों को प्राकृतिक गर्भाधान के बारे में स्वयं ही जानकारी होती है। प्राकृतिक गर्भाधान के समय कुछ सावधानियाॅं अवश्य ही लेनी चाहिए जैसे कि सांड किसी भी बीमारी से ग्रसित नहीं होना चाहिए, बहुत अधिक उम्र के सांड का प्रयोग नहीं होना चाहिए, मादा और नर के शारीरिक अनुपात में बहुत भिन्नता नहीं होनी चाहिए तथा प्रयोग में लाये जाने वाले सांड के पूरे स्वास्थ्य परीक्षण की जानकारी होना चाहिए।


प्राकृतिक गर्भाधान के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक गाँंव में हर समय वहाँं की मादा पशुओं की संख्या के अनुपात में सांड मौजूद हो लेकिन प्रायः ऐसा नहीं हो पाता है और इसके लिए उपयुक्त संख्या में अच्छे सांडों की कमी बनी रहती है। इसके साथ ही हमारे देश में अच्छे दुधारू पशुओं की कमी है और इन कम दूध देने वाले पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए संकर प्रजनन कार्य पिछले लगभग 50 वर्षों किया जा रहा है। संकर प्रजनन का यह कार्य मुख्य रूप से कृत्रिम गर्भाधान विधि द्वारा प्रतिपादित किया जाता है।
कृत्रिम गर्भाधान पशुओं में प्रजनन की एक आधुनिक और वैज्ञानिक विधि है। यह वह विशेष क्रिया है जिसके द्वारा उन्नत नस्ल के स्वस्थ परीक्षित सांड़ों के वीर्य को कृत्रिम विधि के माध्यम से एकत्रित करके गर्मी में आये हुए मादा पशु के जननांगों में उचित स्थान पर रखा जाता है। कृत्रिम गर्भाधान के निम्न लाभ हैं-

  1. कृत्रिम गर्भाधान द्वारा प्राकृतिक गर्भाधान की तुलना में कहीं ज्यादा (लगभग 20 से 40 गुना) पशुओं को गर्भित किया जा सकता है।
  2. कृत्रिम गर्भाधान में परीक्षित सांड़ों एवं परीक्षित वीर्य का प्रयोग किया जाता है अतः बीमारी फैलने की संभावना कम रहती है।
  3. इस विधि द्वारा छोटी गायों को भी सफलतापूर्वक गर्भित किया जा सकता है।
  4. इस विधि में उपयोग होने वाले वीर्य को एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से लाया जा सकता है।
  5. पशु पालकों को अलग से सांड़ पालने की आवश्यकता नहीं रहती है।
  6. कृत्रिम गर्भाधान करते समय मादा पशु के जननांगों की जाँच हो जाती है तथा इस तरह अनेक प्रकार की बीमारियों एवं बांझपन (स्थायी या अस्थायी) के कारणों का पता चल जाता है जिसका समय से इलाज किया जा सकता है।

कृत्रिम गर्भाधान की सफलता के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना अति आवश्यक हैः-

  1. पशुओं में गर्मी के लक्षण एवं उसकी पहचान
  2. कृत्रिम गर्भाधान का उचित समय
  3. यदि पशु गर्भधारण कर चुका है तो उसकी जाँच द्वारा पुष्टि।

पशु में गर्मी के लक्षणः
पशु के गर्मी में आने के लक्षण निम्न हैं-
पशुओं का बैचेन होना, चारा कम खाना, बार-बार रंभाना, बार-बार पेशाब करना और पँूछ उठाना, दूध कम हो जाना, दूसरे पशुओं पर चढ़ना तथा दूसरे पशुओं को अपने ऊपर चढ़ने देना, पेशाब के रास्ते अण्ड़े की सफेदी जैसी लार आना, भग द्वार तथा भगनासा का गुलाबी हो जाना इत्यादि।
कृत्रिम गर्भाधान कब करायें ?

  1. कृत्रिम गर्भाधान कराने के लिए यह आवश्यक है कि गाय या भैंस गर्मी में हो। सामान्य अवस्था में वयस्क गाय या भैंस 20 से 22 दिन के बाद गर्मी में आती है और वह करीब 24 घंटे गर्मी की इस अवस्था में रहती है। गर्मी की इस अवस्था के दौरान ही पशु को गर्भित कराना चाहिए। इसके लिए यह आवश्यक है कि यदि पशु सुबह गर्मी में आया है तो उसे उसी दिन शाम को या यदि शाम को गर्मी में आया है तो दूसरे दिन सुबह गर्भित कराना चाहिए।
  2. कृत्रिम गर्भाधान के बाद यदि पशु फिर 20-22 दिन बाद गर्मी में आये तो उसे फिर से गर्भित कराना चाहिए, क्योंकि अधिकतर पशु एक बार में ही गर्भधारण नहीं कर पाते हैं।
  3. यदि पशु ने गर्भधारण कर लिया है तो किसान उसे ठीक प्रकार से संतुलित आहार देकर ब्याने तक रख सकता है और यदि बार-बार गर्भित कराने के बाद भी गर्भधारण नहीं किया है तो उसकी सही समय पर जाँच कराकर के इलाज कराना चाहिए।
  4. कुछ पशुओं में अंण्डाशय से अंडाणु का विसर्जन देर से होता है जाँंच के बाद ऐसे पशुओं को गर्मी की अवस्था में 12 घंटे में दो बार गर्भित कराना चाहिए।
  5. स्वस्थ पशु एवं ऐसे पशु जिसमें गर्भधारण नहीं हुआ है, में यदि गर्मी के लक्षण निश्चित समय पर नहीं दिखाई पड़े तो ऐसे पशुओं की जाँच करानी चाहिए।
  6. कभी-कभी गर्मी के समय निकलने वाला स्त्राव पारदर्शी न होकर पीला या दही की तरह सफेद होता है ऐसा बच्चेदानी की बीमारी के कारण होता है ऐसे पशु को गर्भित नहीं कराना चाहिए, बल्कि उसका इलाज कराना चाहिए।
  7. गर्भाधान के बाद 3 महीने तक पशु यदि गर्मी में नहीं आता तो उसे निश्चित् रूप से गर्भित नहीं मान लेना चाहिए, बल्कि गर्भावस्था की जाँच के बाद ही निश्चित होना चाहिए।