पशुओं में चटकन की बीमारी एवं निदान


यह बिमारी अस्थि तंत्र की बीमारी है, जिसका प्रकोप किसान भाईयो को उनके गायों एवं भैसों मे देखने को मुख्यतः मिलता है । इस बीमारी को गाॅंवो मे प्रायः चटकन के नाम से जाना जाता है एवं अंग्रेजी मे इसे अपवर्ड फिक्सेषन आॅफ पटेला के नाम से बुलाते है एवं काफी लोग स्टिंªग हाल्ट भी कहते है जो कि वैज्ञानिक रूप से गलत है, स्टिंªग हाल्ट इसी तरह के लक्षणों से मिलती जुलती बीमारी है जो कि ज्यादातर घोड़ो मे होती है ।
जोड़ की रचना:- यह बीमारी पीछे के पैरौं मे होती है तथा घुटने के ऊपर वाले जोड़ मे होती है जिसे स्टाइफल ज्वाइंट कहा जाता है । इस जोड़ मे घुटने की कटोरी नुमा एक संरचना होती है जो कि फीमर एवं टिबिया के जोड़ के ऊपर आगे की तरफ स्थित होती है। जब पषु चलता है तब यह कटोरी फीमर हड्डी की नाल के ऊपर फिसलते हुये ऊपर की तरफ जाती है एवं जब पषु पैर सिकोड़ता है तब ये कटोरी नाल मे नीचे आती है । अतः पशु के चलते समय पटेला यानी की कटोरी फीमर हड्डी की नाल के ऊपर एवं नीचे मुवमेंट करती रहती है । पटेला को यह गति प्रदान करने की लिये तीन तरह के तंतु जोड़ मे होते है।


पटेला (कटोरी) का जोड़ मे अटकना:- उपरोक्त बनाये गये तंतु या लिगामेंट लचीले होते है । जिनके सपोर्ट से जोड़ की कटोरी ऊपर नीचे मूवमेंट करती है । जब लिगामेंट का लचाीलापर ठीक रहता है तो पटेला के मूवमेंट मे कोई दिक्कत नही रहती है किंतु जब कड़कपर आने लगता है अथवा जोड़ की संरचना मे कोई विकृति हो गयी हो, उस अवस्था मे जब पशु अपना पैर पूरा सीधा करता है तब ये कटोरी/पटेला फीमर हडृडी की नाल के ऊपरी सिरे मे फॅंस जाती है एवं नीचे नही आ पाती है । परिणाम स्वरुप पशु अपना पैर मोड़ नही पाता तथा पैर को सीधे ही या तो लहराकर चलता है या घसीटकर चलता है ।


लक्षणः

इस तकलीफ से ग्रस्त पशु मे निम्नानुसार लक्षण मिलते है।
अ. ये पशु जब खेत में काम पर लिये जाते है तो ठीक चलते रहते है पर जब सुबह सुबह काम पर निकाले जाते है तब इन्हे उठने एवं चलने मे ज्यादा समस्या रहती है अर्थात जब षरीर गर्म रहता है तब लक्षण नही दिखते किंतु शरीर ठंडा होने पर पैर लम्बाई में अकड़ जाता है, क्योंकि पटेला लाॅंक हो जाती है।
ब. जब ये बीमारी चरम पे होती है तब तो पशु हर समय ही तकलीफ मे रहता है एवं चलते नही बनता।
स. जब बीमारी से त्रस्त पशु चलता है तो पूरा पीछे का कोई भी पैर सीधाई मे लाॅक हो जाता है एवं पूरे पैर को या तो गोलाई मे घुमाके चलता है अथवा घसीटकर चलता है ।
द. जब ये बीमारी दोनो पिछले पैरौं मे हो जाती है तो पशु की दशा दयनीय हो जाती है तथा पशु ना तो खड़ा हो पाता है और ना हीे चल पाता है
इ. प्रारभिंक अवस्था शुरु के कुछ कदमो मे पशु तकलीफ मे दिखता है किंतु कुछ कदम चलने के बाद ठीक से चलने लगता है ।


उपचारः

इस बिमारी का उपचार केवल शल्यचिकित्सा से ही संभव है इसके उपचार के लिए मीडियल पटेलर लिगामेंट (तंतु) को ब्लेड द्वारा काट दिया जाता है जिससे कि पटेला जकड़न से मुक्त हो जाती है एवं फीमर की नाल मे ऊपर नीचे मूवमेंट पशु के पैर सीधा करने एवं मोड़ते समय करने लगती है।
ओपन षल्यचिकित्सा विधि:- इस विधि में पशु को गिरा करके जिस पैर की शल्यचिकित्सा करनी हो उसे नीचे रखते है । तीन पैर एक रस्सी से बाॅंध कर आगे की तरफ खींच के रखते है। एवं नीचे का पिछला पैर पीछे की तरफ जमीन से सटाकरके खींचके रखते है । पटेला के ठीक ऊपर एक गड्डा सा महसूस करके वहा पर दो इंच का चीरा लगाते है एवं मिडियल लिगामेंट को बाकी दो लिगामेंट से अलग करके ब्लेड से काट देते है। टिंचर बेंजोइन काटन मे लगाके जख्म की जगह लगा देते है । तत्काल ही पशु मुक्त करके दौड़ा के देखा जाता है सही शल्यचिकित्सा होने पर पशु ही ठीक चलने एवं दौड़ने लगता है ।


क्लोस षल्यचिकित्सा विधि:- इस तरह की शल्य चिकित्सा मे भी पशु को ऊपर बतायी गयी विधि से गिराके तैय्यार करते है। एवं स्प्रिट से आॅपरेशन की जगह साफ करके एवं पटेला के ऊपर गड्डा महसूस करके स्कालपल को आड़ा धुसा देते है। इस अवस्था मे ब्लेड मिडिल एवं मिडियल पटेलर लिगामेंट के बीच मे होता है । तत्पष्चात ब्लेड की धार को मिडियल लिगामेंट की तरफ मोड़ के उसके नीचे से कट करते हुए ऊपर तक आते है। लिगामेंट के कटने की स्पष्ट आवाज सुनाई देती है तथा एक बड़ा सा गड्डा बन जाता है । इस क्लोज्ड विधि मे चमड़ी मे चीरा नही लगता हैै। अतः अनुभवी एव जानकार सर्जन द्वारा किया जाना उचित रहता है। यदि मीडियल की जगह मिडिल पटेलार लिगामेंट कट जायेगा तो पशु और भी ज्यादा लॅगड़ा हो सकता है।