पशुओं में प्रजनन सम्बंधी समस्यायें एवं समाधान


प्रजनन सम्बंधित समस्या दुधारू पशुओं में उत्पादन की कमी का एक प्रमुख कारण है। प्रजनन विकारों के कारण दुधारू पशुओं की प्रतिवर्ष संख्या कम हो रही है। एक पशु से सामान्यतः एक बच्चा प्रतिवर्ष होना चाहिये। परन्तु सही प्रबंधन एवं देखभाल न होने के कारण ऐसा नहीं हो पाता है। जिसका मुख्य कारण प्रजनन सम्बंधी समस्या है। जिनमें से कुछ प्रमुख प्रजनन संबंधित समस्या निम्नानुसार है –

  1. आमदकाल /गर्मी में नहीं आना/एनइस्ट्रस ;।दवमेजतनेद्धरू. इस स्थिति में गाय/भैंस के मादा पशु गर्मी के लक्षण नहीं दिखाते हैं संतुलित आहार की कमी से पशु गर्मी में नहीं आते हैं। विटामिन एवं खनिज विभिन्न प्रजनन कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। इनकी कमी से विभिन्न प्रजनन समस्याएं हो सकती हैं। हरे चारे की कमी एवं अधिक तापमान भी गर्मी के दौरान आमदकाल की समस्या को बढ़ाता है। हर्मोन्स संबंधित असंतुलन भी आमदकाल का कारण हो सकता है।
    लक्षण:- प्रसव के 90 दिन बाद जो गाय/भैंस गर्मी में आने के लक्षण नहीं दिखाते या परिपक्वता की आयु होने पर भी गर्मी के लक्षण नहीं दिखाते हैं।
    उपचार:- पशुओं के आहार में पर्याप्त हरा चारा व दाना खिलायें प्रत्येक पशु को रोजना 50 ग्राम खनिज मिश्रण खिलायें, गर्मी के दिनों में भैंसों को पानी में लोटने की सुविधा दी जाये, या उनके ऊपर पानी के बौछारें डाली जायें। पशुओं को नियमित समय पर पेट के कीड़े मारने की दवाइयां अवश्य दें। जब इस उपचार से भी काम न बने तो पशु चिकित्सक द्वारा हार्मोनयुक्त चिकित्सा प्रयोग में लायी जा सकती है।
  2. पशुओं का बार-बार फिरना/ रिपीट ब्रीडिंग (त्मचमंज ठतममकपदह)/बारम्बार प्रजनन:- इस परिस्थिति में पशु बिल्कुल सामान्य दिखता है परंतु 3 या अधिक बार गाभिन कराने के बावजूद भी वह गर्भधारण नहीं कर पाते। अतः पशु 20 से 22 दिन पश्चात पुनः गर्मी में आ जाता है, यह समस्या निम्न कारणों से हो सकती है।
    – अण्डाणु का उत्सर्जन न होना या देरी से होना।
    – अण्डाणु का वृद्ध होना।
    – मादा में प्रजनन सम्बंधी हार्मोन्स की कमी।
    – कुपोषण भी समस्या का प्रमुख कारण हो सकता है।
    उपचार:-कृत्रिम गर्भाधान विशेषक द्वारा ही गर्मी के सही समय पर उच्च गुणवत्ता वाले वीर्य से पशु का गर्भाधान कराया जाये। यदि भैंसों में कोई प्रजनन संबंधी रोग पाया जाता है तो उसका उपचार करायें।
    – गर्भाशय में संक्रमण के कारण बार-बार प्रजनन की समस्या हो तो गर्भाशय के अंदर एंटीबायोटिक का प्रयोग करें।
    – पशु चिकित्सक द्वारा हार्मोन उपचार भी कराया जा सकता है।
  3. अस्पष्ट मदकाल /सांइलेंट हीट (ैपसमदज भ्मंज)/सांइलेंट इस्ट्रसः- इस स्थिति में पशु के गर्मी में आने के बावजूद भी गर्मी के लक्षण प्रकट नहीं होते हैं। पोषक तत्वों की कमी अस्पष्ट मदकाल का बहुत बड़ा कारण है, कुछ हार्मोन की कमी में भी अस्पष्ट मदकाल आता है।
    उपचार:-पशुओं को अधिक उर्जा एवं प्रोटीन वाला आहार देना चाहिये एवं हरा चारा भी खिलायें।
    – रोजना 50 ग्राम खनिज मिश्रण खिलायें।
    – सांड अस्पष्ट मदकाल की पहचान करने में बहुत ही दक्ष होते हैं। अतः गर्मी का पता लगाने के लिये गाय/भैंस में नसबंदी किये हुये सांड का प्रयोग करें।
    – कृत्रिम गर्भधारण के समय वीर्य को सही समय व समुचित स्थान पर छोड़ा जाना चाहिए।
  4. सिस्टिक ओवेरियन डिजनेरेशन (अण्डेदानी में गंाठ)ः-
    – यह बीमारी संकर नस्ल के दुधारू पशुओं में अधिक देखी जाती है।
    – प्रायः तीसरे से पंाचवे ब्यांत में ज्यादा होती है।
    – इस बीमारी से अण्डाशय (ओवरी) का साइज बड़ा हो जाता है।
    – यह बीमारी अनुवंाशिक होती है।
    – इस बीमारी में पशु बार-बार लंबे समय तक गर्मी में आता है या कई बार लम्बे समय तक गर्मी में नहीं आता है।
    उपचार:- इस बीमारी के निदान तथा रोगोपचार के लिये पशु चिकित्सक से सलाह लें।
    – समय रहते अगर उपचार नहीं करवाया तो यह स्थायी बांझपन का कारण हो सकता है।
  5. भू्रण की मृत्यु:- गर्भकाल की किसी भी अवस्था में भ्रूण की मृत्यु हो सकती है। गर्भकाल के छठे से 18 दिन तक 45 प्रतिशत भ्रूणीय क्षय होने की प्रबल संम्भावना होती है। इसका कारण कमजोर कार्पस ल्यूटियम का बनना है जिसके फलस्वरूप प्रोजेस्ट्रोन का स्तर न्यूनतम हो जाता है। पशु नियमित अन्तराल पर कामोत्तोजना का लक्षण प्रदर्षित करता है या फिर 30 दिन या उससे अधिक अन्तराल पर कार्मोत्तोजना की प्रवृत्ति दोहराता है।
    उपचार:- गाभिन पशु को अलसी खिलायें एवं पशुचिकित्सक की सलाह पर हार्मोन उपचार भी ले सकते है।
  6. गर्भाशय में संक्रमण:- कामोत्तोजना और प्रसव के समय संक्रमण गर्भाशय में प्रवेश करता है रक्त के माध्यम से संक्रमण का गर्भाशय मंे प्रवेश करने की संभावना कम ही होती है। प्रसव के बाद गर्भाशय में संक्रमण हो तो पशु उदासी के लक्षण भूख की कमी, बुखार, कमजोरी इत्यादि लक्षण दिखाता है। योनी मार्ग से पीला बदबुदार मवाद श्रवित होता है।
    प्रसव के प्रथम चार हफ्ते के दौरान संक्रमण गर्भाशय के उपरी स्तर पर रहता है और इसे एंडोमेट्राइटिस कहते है। इस बीमारी में कामोत्तोजना सामान्य होती है। परन्तु पशु रिपीट ब्रीडर बन जाता है। इस बीमारी का समाधान एंटीबायोटिक से किया जा सकता है।
    निष्कर्ष:-पशुओं में प्रजनन सम्बंधी समस्या के कई कारण हैं और जाटिल भी हो सकते है, इसलिए प्रजनन समस्याओं के स्टीक कारणों का निर्धारण करने के लिए प्रजनन सम्बंधी समस्या वाले पशुओं की जाॅच पशुचिकित्सक से अवश्य करवाएं।