पशुओं में फोरेन् बाडी सिंड्रोम की बीमारी एवं निदान

अफरा / टिम्पेनी जैसी पेट की बीमारियाॅं गाय व भैंस मे बहुत आम है। इस बीमारी के लम्बे समय तक बने रहने से पशुओं की दुधारू क्षमता और खेत में काम करने की शक्ति कम हो जाती है जिसके कारण किसानो की आय पर नकारात्मक असर होता है। इसलिये किसानों को इस बिमारी के कारण व निदान के प्रति जागरूक होना आवष्यक है। जानवर का पेट चार हिस्सो में होता है।

सामान्यतः पेट फूलना दो प्रकार का होता है। पहले प्रकार की टिम्पेनी में: जब जानवर द्वारा ज्यादा गैस बनाने वाला खाना खाया जाता है तक गैस बनने के कारण पेट का आकार बढ़ा हो जाता है। इस बीमारी को आसानी से दवाईयाॅंे के द्वारा ठीक किया जा सकता है। दूसने प्रकार के पेट फूलने को रिकरेंट टिम्पेनी कहते है। इस बीमारी मे पेट फूलना बार बार होता है एवं दवाईयों के देने के बाद भी पूरी तरह से ठीक नही होता है इस बीमारी को फोरेन् बाडी सिंड्रोम कहा जाता है

रिकरेंट टिम्पेनी होने के निम्नलिखित कारण है।

अ. जानवर की यहाॅं वहॅंा चरने की आदत।

ब. जानवर द्वारा लोहे की नोंकदार वस्तु जैसे कील, वायर, चेन, सिक्का या अन्य मेटल की वस्तु को खाना । मेटल जैसी वस्तुओं के खाने के कारण इसे हार्डवेअर बीमारी कहते है।

स. जानवर द्वारा अन्य तरह की वस्तु जैसे प्लास्टिक, पॅालीथीन, रस्सी, कपड़ा, जूट थैला आदि खाना इस तरह की बीमारी को साइलेंट किलर कहा जाता है ।

द. लम्बे समय से पेट फूलने या अपच खाने से रूमन के पाचन प्रक्रिया कम या बंद हो जाती है जिसके कारण जानवर द्वारा खाया गया खाना पेट में इकट्ठा  होता रहता है। जिसे रूमिनल इम्पेक्शन कहते है ।

अधिकतर ज्यादा मात्रा में प्लास्टिक व अन्य बाहरी वस्तुओं रूमन में इकट्ठा  होकर  बड़ी सी अवरोधक का रूप ले लेती है ।

लक्षणः

      पेट फूलना, शुरूआत मे पशु खाना पीना कम करता है धीरे धीरे बंद कर देता है।

      कमजोरी होना

      दूध कम करना देना

      दर्द के लक्षण होना

      गोबर कम करना

      नुकीली वस्तु यदि रेटिकुलम से हृदय में घुस जाये तो गले मे सूजन सांस मे दिक्कत, उल्टी जैसे लक्षण देखने को मिलते है।

      जुगाली नहीं करना, ग्रंट करना, बार बार पेट फूलना एवं हृदय साइड में परिवर्तित होना।

      नुकीली बाहरी वस्तु के कारण पेट के दूसरे हिस्सों में मवाद, घाव, व सूजन होना ।

      डायफ्रेग्मेटिक हर्नियाः नोकरी धातु के कारण पेट का कुछ भाग फेफड़ों वाली कैविटी में जाना जिससे पशुओं में सांस लेने में दिक्कत के साथ अन्य लक्षण भी देखने को मिलते हैं ।

 जांच:

यदि जानवर में इस तरह के लक्षण होते हैं। तो तुरंत पशु चिकित्सक को दिखाया जाना चाहिए परिक्षण निम्नलिखित द्वारा जांच कर सकता है ।

1       पशु की बीमारी के लक्षण़ों  से

2       स्टेथोस्कोप द्वारा फेफड़ों की कैविटी की जांच व रूमन/पेट की हलचल की जांच

3       मेटल डिटेक्टर से पेट में मेटल की वस्तु की जांच

4       एक्सरे के द्वारा मेटल की वस्तु आदि की जांच

5       अल्ट्रासोनोग्राफी के द्वारा

6       लेप्रोस्कोपी के द्वारा

7       पेट खोल कर जांच करना

उपचार:

यह एक गंभीर बीमारी है बहुत बार इस बीमारी के कारण पकड़ में नहीं आता है  और पशु पालक अपने जानवर को खो देता है । फॉरेन बॉडी सिंड्रोम खुले में चरने वाले मवेशियों में ज्यादा देखने को मिलता है क्योंकि पॉलीथिन में कचरा फेंक देते हैं । आवारा मवेशी इन पॉलिथीन व प्लास्टिक को खा लेते हैं । बीमारी का निदान विशेष्ज्ञ षल्य चिकित्सक द्वारा होना चाहिए ।

ऑपरेशन की तैयारी :

1       सलाइन देना चाहिए ।

2       एनेस्थीसियाः ऑपरेशन लोकल एनएसथीसिया द्वारा किया जाता है ।

3       ऑपरेशन की साइट को अच्छी तरह से साफ करना ।

4       लेप्रो रूमैनोटोमी: पेट में चीरा लगाकर रूमन में से सारा जमा हुआ इंपैक्टेड  अपच बाहर निकाला जाता है रूमन रेटिकुलम (स्टमक) से धातु जैसी वस्तुओं को निकालना । रूमन में पालक केला डाल ताकि ऑपरेशन के बाद पचाने में आसानी हो । पेट को वापस सूचर्स के द्वारा बंद कर दिया जाता है । ऑपरेशन के समय पेट के दूसरे हिस्सों में मवाद, घाव, सूजन व डायफ्रेग्मेटिक हर्निया होने की संभावना को भी सुनिश्चित करना चाहिए । 

5       ऑपरेशन के बाद की देखभाल संक्रमण से बचाने के लिए एंटीबायोटिक देना चाहिए । दर्द का इंजेक्शन 4 दिन तक देना चाहिए । गांव की सुरक्षा और ड्रेसिंग करनी चाहिए । ऑपरेशन को दूसरे व तीसरे दिन सलाइन लगाना चाहिए ।

डांॅ. रेशमा जैन

सहायक प्राध्यापक

पशु शल्यचिकित्सा एवं क्षःरश्मि विज्ञान विभाग

पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, महू

नानाजी देशमुख पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर (म.प्र.)