प्रोबायोटिक्स युक्त दुग्ध एवं मांस उत्पाद

इस नवीन युग का उपभोक्ता काफी जागरूक है, वह अपने भोजन से प्राप्त होने वाले पोषण के अलावा उससे सम्बन्धित स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के प्रति चिंतित भी है। इसलिए रोजमर्रा की जिन्दगी में प्रोबायोटिक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। हालाकि प्रोबायोटिक के क्षेत्र में अब भी प्रारम्भिक दौर है इसके बावजूद ये आषाजनक प्रतीत होते है। 

जीवित सूक्ष्मजीवों जिन्हें पर्याप्त मात्रा में मेजबान में प्रषासित करने पर स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते है ऐसे सूक्ष्मजीवों को प्रोबायोटिक कहतें है। ये सूक्ष्म जीव हमारे शरीर की आंतो में माइक्रोबियल संतुलन बनाने में सहायक है।  

प्रोबायोटिक्स युक्त उत्पाद- मुख्यतः इन्हे दुग्ध एवं मांस के उत्पादों में उपयोग किया जाता है क्योंकि दुग्ध एवं मांस की संरचना प्रोबायोटिक्स जीवों के विकास के लिए उपयुक्त है। 

प्रोबायोटिक्स युक्त दुग्ध उत्पाद – दही, पनीर, आइसक्रीम, किण्वित (फरमेन्टेड) दुग्ध इत्यादि। 

प्रोबायोटिक्स युक्त मांस उत्पाद – किण्वित सासेज आदि। 

प्रोबायोटिक से प्रदान होने वाले स्वास्थ्य लाभ :-  

  • लेक्टोज असहिष्णुता (लेक्टोज इलटालरेन्स) को कम करना – यह लेक्टोज पाचन को बढ़ाता है। 
  • कोलेस्ट्राल के स्तर एवं उच्च रक्तचाप की सम्भावना को कम करना
  • प्रतिरक्षा प्रणाली में वृद्धि करना 
  • एंटी कारसिनोजेनिक गतिविधि प्रदर्शित करना। यह विशेष रूप से पेट के कैंसर के जोखिम को कम करतें है। 
  • प्रोबायोटिक्स, विटामिन K के उत्पादन एवं कैल्सियम, फास्फोरस, प्रोटीन, वसा आदि के अवशोषण में मदद करते है। इसी कारण से यह शिशुओं में रोटावायरस एवं वयस्को में एंटीबायोटिक संबंधित दस्त से बचातें है। 
  • इूरीटेबल बाउल सिंड्रोम एक जीर्ण हालत है जिसकी मुख्य विशेषता दस्त/कब्ज, पेट में दर्द और अन्य गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल लक्षण है और इस स्थिति में प्रोबायोटिक्स बहुत प्रभावकारी हैं।
  • ये एलर्जी या इक्जिमा के खिलाफ संरक्षण भी प्रदान करते है। 
  • उनके अलावा ये रोगजनक के दमन में भी सहायक है।

प्रोबायोटिक्स की कार्यविधि – 

  • ये म्यूसिन के स्त्राव को बढ़ा देते है जो इपिथिलियल परत पर होने वाले रोगजनक के आक्रमण को रोकता है।
  •  ये आंतो में उपस्थित रिसेप्टर्स के लिए अन्य रोगजनक से प्रतिस्पर्धा करतें है। 
  • ये पोषक तत्वों के लिए अन्य रोगजनक से प्रतिस्पर्धा करतें है। 
  • ये प्रतिरक्षा प्रणाली को उत्तेजित करते है। 
  • ये जीवाणुरोधी पदार्थो का उत्पादन करते है। 

वर्तमान में उपयोग किये जाने वाली प्रोबायोटिक उपभेदों (स्ट्रेन) के मुख्यतः तीन प्रकार हैं। 

1 लैक्टोबेसिलस प्रजातियाँ- लैक्ट. एसिडोफिलस, लैक्ट. प्लांटारम, लैक्ट. ब्रेविस। 

2. बायफिडो बैक्टिरियम प्रजातियाँ – बाय. बायफिडम, बाय. लांगम, बाय. इनफेन्टिस। 

3. अतिरिक्त प्रजातियाँ – स्ट्रेप्टोकोकस लैक्टिस आदि।  

प्रोबायोटिक्स मुख्य रूप से पाचन में सुधार, लेक्टोज असहिष्णुता, उच्च रक्त चाप में कमी, रक्षातंत्र में वृद्धि एवं डायरिया से बचाव आदि विशेषताओं के कारण सफलतापूर्वक उपयोग में लाया जा रहा है। पूर्व तथ्यों से प्रतीत होता है कि इसके स्वास्थ्य परिणाम लाभदायक एवं आशाजनित है जिनमें वृद्ध मनुष्यों में इसका उपयोग विशेष रूप से प्रासंगिक हो सकता है। अतः प्रोबायोटिक्स हमारे शरीर के प्रति फायदेमंद एवं सुरक्षित है।