बकरियों के बच्चों का वैज्ञानिक पद्धति से पालन-पोषण

बकरी से मिलने वाला दूध परिवार की आवश्यकता को पूरा करने तथा नर बच्चों को बेचकर घर के अन्य कार्यो के लिए धन जुटाने में प्रयोग किया जाता रहा है। बकरी के बच्चों की देखभाल लालन-पालन की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता इस कारण बकरी के बच्चों में मृत्युदर काफी अधिक रहती है तथा जो बच्चे जीवित रहतें हैं उनमें शारीरिक विकास कम हो जाता है वैज्ञानिक तकनीक के प्रयोग से बकरी के बच्चों में मृत्युदर कम करके तथा शारीरिक विकास दर बकरी पालन से अधिक लाभ अर्जित करना स्मभव है । बकरी के बच्चे पालने के तीन प्रमुख पहलू हैः

1. बकरी के बच्चों का आहार प्रबंधन।

2. बीमारियों से बचाव। 

3. आवासीय व्यवस्था। 

1. बकरी के बच्चों का आहार प्रबंधन – जन्म से तीन माह की आयु तक जन्म के बाद बच्चों को दिये जाने वाला सर्वप्रथम आहार खीस है बच्चों के पालन-पोषण में खीस का विशेष महत्व है। खीस ब्यांत के बाद तीन दिनो तक बकरी के थनो से प्राप्त होने वाला तरल पदार्थ है। इसमें प्रोटीन की मात्रा सामान्य दूध की तुलना में लगभग 4 गुना अधिक अर्थात 16-18 प्रतिशत तक होती है इम्यूनोग्लोविन प्रोटीन का वह अंश है जो बच्चों में उसकी आंतो द्वारा जन्म से 6 घंटे की अवधि में पूरी तरह रक्त में समायोजित कर लिया जाता है। यही इम्यूनोग्लोविन बच्चों में बीमारियों के प्रति अवरोधकता उत्पन्न करती है। और यह उन्हे खीस से ही आती है। खीस का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य बच्चे को ऊर्जा प्रदान करना है जो बच्चे को बाह्य वातावरण के प्रभाव से बचाती है। खीस की मात्रा व उसके पिलाने का सही समय- खीस की मात्रा बच्चे के शरीर भार के लगभग 1/10 भाग के बराबर दी जानी चाहिए।

3-12 माह की आयु वाले बच्चों का आहार प्रबंधन- तीन माह की आयु के बाद नर एवं मादा बच्चों अलग-अलग रखकर पालना चाहिए। तीन माह की आयु पर दूध पिलाना बंद कर उन्हें आवश्यकतानुसार दाना-चारा खिलायें। छः माह की आयु तक दिये जाने वाले दाने में पाच्य प्रोटीन की मात्रा 14-16 प्रतिशत तथा उसके बाद 12 माह की आयु तक दाने में 12-14 प्रतिशत तक निर्धारित करें। दाने के अतिरिक्त प्रतिदिन 250-500 ग्राम हरा चारा तथा इच्छानुसार सूखा चारा खिलायें अगर चराने की सुविधा है तो प्रतिदिन 6-8 घंटे चराने के अतिरिक्त शारीरिक वजन के अनुसार दाना दें। मोटे तौर पर शारीरिक भार के 1.5 प्रतिशत के बराबर दाना खिलानें से उनकी शरीर रक्षा एवं वृद्धि हेतु आवश्यक खाद्य तत्वों की पूर्ति हो जाती है। अगर हरा चारा  दलहनी फसलों का है तो वजन के केवल 1 प्रतिशत के बराबर ही दाना दें। विभिन्न खाद्य प्रयोगो के अनुसार 3-6 माह के बीच दाना तथा झरबेरी की सूखी पत्तियों का 60:40 के अनुपात में मिश्रण तैयार कर खिलाने से 6 माह की आयु पर 25 किलोग्राम हो जाता है। मादा बच्चे कम आयु पर प्रजनन योग्य हो जातें है। 

2. बीमारियों से बचाव – निमोनिया, दस्त आंतशोध तथा काक्सीडिओसिस बकरी के बच्चों में होने वाली प्रमुख बीमारियाँ है। 

निमोनिया – यह खासतौर से छोटी आयु के बच्चों में जाड़े के मौसम में होने वाला रोग है। इससे बचाव के लिए बच्चों के रखने के स्थान को साफ-सुथरा एवं सूखा रखना बहुत आवश्यक है। फर्श पर सूखी मुलायम घांस बिछावन प्रयोग करें कम जगह आवश्यकता से अधिक बच्चे रखने से भी बच्चों में निमोनिया हो सकता है। रात के समय इनके रहने के स्थान में उचित वातायांन का होना आवश्यक है जाड़े के दिनो में वातायांन बाड़े के फर्श के क्षेत्रफल लगभग 5 प्रतिशत होना चाहिए। दिन के समय उंन्हें धूप में रखना चाहिए। और रात में बाड़े के अन्दर रखना चाहिए। रात में बाड़े के अन्दर का तापमान बहुत कम न होने पाये इसके लिए चार इंच मोटे छपरा की टाटियां (पैनल) काफी लाभकारी सिद्ध हुये हैं। 

दस्त – बच्चों में दस्त होने के कई कारण है शुरूं की अवस्था में दस्त का मुख्य कारण बच्चों को आवश्यकता से अधिक दूध पिला देना से होता है। प्रदूषित चारा-दाना खाने से भी दस्त हो जाता है। आंतशोध तथा ई.कोलाई उत्पन्न रोंग का लक्षण के रूप में ही दस्त हो जाता है। अतः दस्त न हो इसके लिये दूध की सही मात्रा को मिलाने एवं रहने के स्थान तथा दाना-चारे की स्वच्छता बनायें रखने के लिये विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। 

काक्सीडियोसिस – काक्सीडियोसिस से बचाव के लिए लगभग एक माह की आयु पर 30 मि.ली. सलमैट प्रति 23 किलोग्राम शरीर भार के हिसाब से बच्चों को पिलायें। दूसरे दिन से 5 वें दिन तक दवा की मात्रा आधी कर दें। सलमैट के साथ-साथ प्रति बच्चे 2 मि.ली. बी कम्पलैक्स प्रतिदिन दें। इसके अतिरिक्त इस बात का भी ध्यान रखा जाय कि बच्चे न तो मिट्टी और न ही दूषित चारा खायें। इसके लिए शुरूं की अवस्था में फर्श पर सूखी मुलायम घास की बिछावन प्रयोग करें। 

3. आवास प्रबंधन- आवास के उचित प्रबन्ध हेतु निम्न बातों को विशेष रूप से ध्यान में रखना आवश्यक है। 

  • आवास की जगह स्वच्छ, हवादार एवं उचित रोशनदान युक्त हो। 
  • जन्म के पश्चात् लगभग एक सप्ताह तक बच्चों को उनकीं माँ के साथ रखें अलग-अलग बकरियों के लिए 1.2 से 1.5 वर्ग मीटर आकार के बाड़े  बनायें इस प्रकार की व्यवस्था से बच्चों का समय से आवश्यकतानुसार दूध पिलाने में सुविधा रहती है साथ ही बकरी एवं बच्चे एक साथ रहते हुये एक दूसरे को पहचान जाते हैं। 
  • आवास के फर्श को सूखा रखें। इसके लिए समय-समय पर फर्श की मिट्टी की गुड़ाई करके मिट्टी बदल देनी चाहिए। 
  • जाड़े के दिनो में फर्श पर सूखी मुलायम घांस की बिछावन का प्रयोग करें जिसे सूखा रखने के लिए आवश्यतानुसार बदलतें रहें। 
  • जाड़े के दिनो में वातावरण की सीमा बाड़े के फर्श के क्षेत्रफल के लगभग 5 प्रतिषत के बराबर रखें। 
  • आवास में पर्याप्त स्थान की व्यवस्था होना आवश्यक है। विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों की आवासीय स्थान हैं। 

उपरोक्त बकरी पालक इन बातों को उपयोग में लाकर बकरी पालन से और अधिक लाभ कमा सकेगें।