बकरियों के रोग एवं निदान 

बकरी पालन एक तेजी से विकसित होने वाला व्यवसाय है  जो कि कम लगत एवं सामान्य देखरेख में शुरू किया जा सकता है |बकरी को गरीब कि गाय भी खा जाता है| बकरियों  में अनेक कारणों  से कई बीमारिया  होती है जिसके परिणामस्वरूप उनके स्वास्थ्य एवं  उत्पादन में कुप्रभाव होता है व सही समय पर उपचार ना मिलने से पशु की मृत्यु भी हो जाती है | बकरी पालन सुचारू रूप से चलने के लिए आवश्यक है कि पशु स्वस्थ  रहे और यह तभी संभव है जब बकरियों के स्वस्थ सम्बंधी बीमारियों व उनके रोकथाम कि सही जानकारी होगी | अत: बकरियों  में सामान्यत होने वाले रोग व उसके प्राथमिक रोकथाम के बारे  में जानकारी  आवश्यक है –

पी.पी.आर.- यह एक वीषाणु जनित घातक रोग है | यह  किसी भी  आयु कि बकरियों  में हो सकता है | इस रोग का संक्रमण बकरियों में दूषित हवा, पानी, व  भोजन से होता  है | यह रोग सम्पर्क में आने वाली दूसरी बकरियों में बहुत तेजी से फैलता है इस रोग से ग्रषित बकरियों में बुखार , नाक व आँख से पानी का बहना, पतले दस्त, मुह के अन्दर छाले का पड़ना  मुख्यात देख जाने वाले लक्षण है | 

उपचार व रोकथाम 

इस  रोग का कोई प्रभावी उपचार नहीं है परन्तु संक्रामण को  फैलने से रोकने के लिए जीवाणु नाशक औषधियों प्रयोग करना चाहिए| एन्रोफ्लोक्सासिन नामक एंटीबायोटिक इस रोग में काफी असरदार है |  लक्षण के आधार पर एंटीइन्फ्लेमेंट्री,एंटीपायरेटिक एवं एंटी एलर्जिक देना चाहिए  | रोग ग्रसित बकरियों को स्वस्थ बकरियों से अलग रखे |निदान के लिए पशुओं व पशुघर को साफ स्वच्छ रखे |बचाव के लिए  समय पर टीकाकरण  आवश्यक  है |

थनैला रोग :यह  सभी दुधारू पशुओं में होने वाला रोग है,  जो की पशुओ  में  कई प्रकार  के जीवाणु , विषाणु , फफूंद व यीस्ट से होता है | दुग्ध हेतु पाली गई  बकरियों में यह  रोग  देखा जा सकता है | थनो में चोट व प्रतिकूल पारिस्थिती में थैनेला रोग होने की संभावना बढ़ जाती है| थैनेला रोग से प्रभावित पशुओं  के थनों में सुजन , दूध गर्म  करने पर फटना , दूध में छिछडे व खून का आना थनैला  रोग के लक्षण है | सामान्यतया थनैला रोग एक या एक से अधिक थनों को प्रभावित कर  सकता है | समय पर उपचार ना मिलने पर थनों में सुजन कठोर हो जाती है | परिणामस्वरूप दूध का स्राव स्थाई रूप से बंद हो जाता है | विषम परिस्थितियो  में थनों के सड़ने जैसी अवस्था भी उतपन्न हो सकती है  

  • निदान के लिए पशुओं को व पशुघर को साफ स्वच्छ रखे |
  • दूध दुहने के बाद थनों को साफ करे |
  • समय समय पर दूध की जाँच अवश्य करे |

दूध के रंग , स्वाद व किसी भी प्रकार का परिवर्तन  होने पर तुरंत परिक्षण कर उपचार करे|परिक्षण के लिए कई तरह के टेस्ट  कर जैसे CMT, SCC, PH परिक्षण से  रोग की पुस्ती की जा सकती है | बचाव के लिए एंटीबायोटिक्स, एंटीइन्फ्लेमेंट्री,एंटीपायरेटिक नियमित रूप से दिए जाने चाहिए|

बकरियों में चेचक (माता रोग) 

चेचक  बकरियों में तीव्र गति से संक्रमित होने वाला विषाणु जनित रोग है जो पाक्स विषाणु द्वारा होता है इस रोग से सभी आयु के  पशु प्रभावित होते है| इसमें पशु को बुखार आता है तथा त्वचा पर दाने निकल आते है| चेचक रोग का संचरण रोग ग्रसित पशुओं का दुसरे पशुओं से, दूषित चारा, दूषित भोजन, गोबर  इत्यादी का अन्य स्वस्थ पशुओं के संपर्क में आने से होता है| गोपशुओं में ग्वालो के हाथो से भी रोग का संचरण होता है|  इस  रोग का कोई प्रभावी उपचार नहीं है परन्तु संक्रामण को  फैलने से रोकने के लिए जीवाणु नाशक औषधियों व मलहमो का फफोलो पर प्रयोग करना चाहिए| इसके लिए टिंचर आयोडीन का प्रयोग किया जा सकता है| संक्रमित बकरियों को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए एवं तुरंत चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए|

खुरपका व मुहपका रोग : यह विषाणु-जनित (पिकोर्ना नामक विषाणु) संक्रामक रोग है | यह रोग प्रायः गाय, भैस, बकरी, सुअर में पाया जाता है   सामान्यतया यह रोग सभी आयु के पशुओं मे देखा जा सकता है ǀ इस रोग के प्रकोप की संभावना बसंत व वर्षा ऋतु में अधिक होती है | 

लक्षण:- तीव्र ज्वर (४०-४१°c), मुंह, थन, व खुरो के बीच व निचली सतह पर छाले, लंगड़ापन, लगातार  अत्यधिक मात्रा में लार का टपकना, गर्भ का गिर जाना, दुधारू पशुओं में दुग्ध उत्पादन में गिरावट व जुगाली करने में असामर्थ्यता इस रोग के मुख्य लक्षण है| 

उपचार:- रोग ग्रसित पशुओं के उपचार के लिए सर्वप्रथम रोगी पशु को स्वस्थ पशुओ से अलग रखे |खुरो  व मुंह के छाले एंटीसेप्टिक लोशन जैसे पोटाश, फिटकरी, बोरिक एसिड व नमक को  पानी में डालकर धोये,  रोग के बचाव के लिए टीकाकरण सर्वोतम उपाय है | ऐसे क्षेत्र जहा रोग का प्रकोप अधिक है वहा वर्ष में दो बार नियमित टीकाकरण करके पशुओं को इस रोग से बचाया जा सकता है|

निमोनिक पाश्चुरेलोसिस –  यह पाश्चुरेला हिमोलिटिक नामक जीवाणु के कारण होता है जो अति  तीव्र  गति से दूसरे पशुओ  में संचारित होता है |यह रोग प्राय सभी आयु के बकरियों  में देखा  जा सकता है| अचानक जलवायु परिवर्तन, पशुओं मे पोषक तत्वों की कमी  या पशु को लम्बी दूरी की यात्रा करवाना व अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों में इस रोग के होने की  संभावना  अधिक हो जाती हैǀ सामान्तया यह रोग बर्षा ऋतु के  मौसम मे अधिक होता है| पशुओं में मुख्यतया यह रोग संक्रमित भोजन और पानी से होता है|  श्वसन से भी संक्रमण हो सकता है| रोग  ग्रसित पशुओं से यह रोग तीव्र गति से अन्य पशुओं में संचारित  होता है|

 वयस्क बकरियों इस रोग के मुख्य लक्षण  तीव्र ज्वर ,  अवसाद  सांस लेने में कष्ट, खासी   एवं श्वास के दौरान घर्र घर्र की ध्वनि है | बछड़ो में शीध्र मृत्यु भी इस रोग में हो जाती है  |

उपचार – 

  1. पशुओ को प्रतिवर्ष वर्षात्रतु  से पूर्व इस रोग का टीकाकरण करवाना चाहिए 
  2. रोगग्रस्त पशुओ को अन्य स्वस्थ पशुओ से अलग रखना चाहिए  
  3. पशुघर  को साफ व स्वच्छ  रखना चाहिए 
  4. रोग के  लक्षण दिखाई देने पर शीघ्र पशुचिकित्सक से संपर्क करे 
  5. इस रोग के उपचार में सेफ़्तिओफ़र सोडियम, ऑक्सी टेट्रास्यकलिन नामक एंटीबायोटिक्स काफी असरदार है इसके साथ  ही लक्षण के आधार एंटीइन्फ्लेमेंट्री,एंटीपायरेटिक नियमित रूप से दिए जाने चाहिए|

अफरा –  यह बकरियों  मे अचानक उत्पन्न होने वाला एक घातक रोग है| अफरा बकरियों    के अलावा अन्य पशु को भी  प्रभावित करता है |अफरा उत्पन्न होने पर पशुओं   को  साँस लेने मे तकलीफ होने लगती है और पेट का आकार सामान्य से बढ़ जाता है ǀ अफरा होने के कई कारण हो सकते है जैसे कि पशुआहार मे परिवर्तन, चारे का प्रकार एवं मात्रा और रुमेन सूक्ष्म जीव आदिǀ हरा रसीला चारा, फालीदार पौधे व अनाज की अधिक मात्रा मे सेवन अफरा का प्रमुख कारण है| कई बार कीड़े या जहरीले पदार्थ खाने से भी अफरा होने का डर रहता है विशेषकर गर्मी के दिनों मे क्योंकि इन दिनों पाचन तंत्र कमजोर पड़ जाता है विनौले जैसे तेलिय आहार भी अफरा का कारण बन सकते है ǀ अधिक मात्रा मे गैस का उत्पन्न होना या गैसों के निकाय मे अवरोध होना अफरा का मुख्य कारण है|  

लक्षण:- 

बायीं  तरफ के पेट का फूलना सबसे स्पष्ट संकेत है ǀ दर्द वैचेनी भूख न लगना सांस लेने मे तकलीफ आमतौर पर पाये जाने वाले लक्षण है ǀ अफरा से पीड़ित पशु जीभ बाहर निकालकर तेज व गहरी सांस लेता है ǀ जुगाली न करना,जमीन पर लेट कर पैर पटकना, पेशाब व मल त्यागने मे तनाव लगना  जैसे लक्षण अफरा से पीड़ित पशु में दिखाई देते है इस रोग मे समय पर ईलाज न मिलने पर पशुओं की मृत्यु भी हो जाती है ǀ

उपचार:-

  • उपचार के लिए सबसे पहले आधा लीटर खाद्य तेल पशु को पिलाये ǀ
  • पशु के बाएं तरफ के पेट को ट्रोकार एवं केनुला से पंच करके  जिससे की रुमेन की गैस बाहर निकल सके ǀ
  • पशु को भूसे की पर्याप्त मात्रा खाने को दे ǀ 
  • झागिये अफरा के उपचार के लिए हम एंटीफोमिंग एजेंट का उपयोग  कर सकते है ǀ 

रोकथाम :-

पशुओं को संतुलित मात्रा मे आहार दें ǀ पशुओं के आहार में अचानक परिवर्तन न करें| पशुओं को अधिक मात्रा में बरसीम, ज्वार व लूसरन आदि ना दें तथा समय – समय पर पशु चिकित्सक की सलाह अवश्य लें ǀ

संक्षेप- 

उपरोक्त सभी रोग बकरियों के स्वास्थ के लिए घातक है|  इन  रोगो की संक्षिप्त जानकारी के साथ साथ पशुपालको को इन रोगों के निदान व बचाव की भी जानकारी होनी चाहिए|  | इन रोगों के निदान के लिए निम्न बातें आवश्यक है 

  1.  बकरियों  का रखरखाव सही व सुचारू रूप से करना चहिये|
  2. समय समय पर बकरियों   को विभिन्न बिमारियों का टीका अवश्य लगवाये|
  3. बकरियों  का नियमित रूप से परिक्षण करना चहिये|
  4. बकरियों  को संतुलित व पौष्टिक आहार उपलब्ध करना चहिये|
  5. बकरियों  को  सदैव साफ व स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाये|
  6.  बकरियों को नियमित रूप से टीकाकरण करवाये| 
  7. समय समय पर पशुचिकित्सक की सलाह लेनी चहिये|
  8. रोगग्रस्त पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चहिये|
  9. पशु के रहने का स्थान अति घना  ना हो तथा वायु के आदान प्रदान की उत्तम व्यवस्था होनी चहिये|

बकरियों मे टीकाकरण करने से पहले बातों का ध्यान दें –

  • टीकाकरण से तीन चार दिन पहले पशुओं को तनाव मुक्त रखना चाहिए |
  • टीकाकरण से पूर्व पशुओं को कृमिनाशक अवश्य दें |
  • टीकाकरण सदैव  पशु चिकित्सक की सलाह से करें |
  •  टीका लगाने से पहले उसकी गुणवत्ता ठीक से परख  लें |
  • डी वार्मिंग के 5-7 दिन बाद ही टीकाकरण करें।
  • बकरी का स्वास्थ्य अगर ठीक नहीं है तो टीकाकरण नहीं करवाना चाहिए।

बकरियों में लगने वाले प्रमुख टीकों के नाम

निम्नलिखित बिमारियों के टीके बकरियों में लगाये जाते हैं| पशु चिकित्सक (Veterinary Surgeon – VS) की सलाह पर  सही समय में बीमारी से पहले प्रतिवर्ष नियमित रूप से बकरी का टीकाकरण करवाएं।

  1. पी पी आर
  2. एफ एम डी
  3. एंटेरोटोक्सिमिया l 
  4.  चेचक  
  5. टेटनस 
  6. ब्लैक क्वार्टर