बकरियों में पाये जाने वाले अंतः परजीवी

  1. बकरी में कौन से परजीवी सामान्यतः पाये जाते हैं?

बकरी में पाए जाने वाले परजीवी को दो तरह के होते हैं ।

  • शरीर के बाहर (चमड़ी पर)-बाह्य परजीवी 
  • शरीर के अन्दर- अंतः परजीवी

बकरी में पाये जाने वाले मुख्य आंतरिक परजीवी- 

  • लंगवर्म (फेफड़ा में पाये जाना वाले कृमि) -डिक्टियोकालस प्रजाति, मुलेरियस
  • स्टोमक वर्म (पेट में पाये जाने वाले कृमि)- हिमान्कस कान्टार्टस जिसको बार्बर पोल वर्म भी कहतें है। 
  • लीवर फ्लूक (यकृत में पाये जाने वाले कृमि)- फैसिओला हिपैटिका
  • इन्टेस्टिनल परजीवी (आंत में पाये जाने वाले कृमि) -काक्सीडिया प्रजाति। 
  1. परजीवी बकरी को संक्रमित कैसे करता है?
  • लंगवर्म और लीवर फ्लूक प्रजनन करना तथा बढ़ना दोनो प्रक्रिया घोंघे के अन्दर करते हैं। घोंघे रूके हुए पानी में जीवित रहतें है। बकरी जब पानी पीने पहुॅचती है तो परजीवी के द्वारा सक्रमित होने का खतरा हो जाता है। 
  • पेट में पाए जाने वाले कृमि के अण्डे तथा लार्वा नम वनस्पति पर पाए जाते हैं जैसे कि ओस लगी हुई घांस यह लार्वा घांस पर घूमते हैं तथा बकरी द्वारा खा लिए जाते हैं।
  • काक्सीडिया युवा जानवरों को ज्यादा प्रभावित करता है क्योंकि इनके अन्दर प्रतिरोधक क्षमता कम रहती है। 
  • काक्सीडिया के उसिस्ट जमीन पर रहते हैं जीवित रहती है लेकिन कोई नुकसान नहीं करते जब तक कि जानवरों की बहुत भीड़ न हो। कम जगह में ज्यादा संख्या में बकरियों को नही रखना चाहिये।
  1. परजीवी रोग कैसे उत्पन्न करते है?

परजीवी के यांत्रिक उत्तेजन के कारण बहुत ज्यादा नुकसान होता है। ज्यादा संख्या में परजीवी किसी अंग में पहुच कर उसको प्रभावित तथा उसके कार्यं में रूकावट पैदा करते है। 

लंग वर्म – लंग वर्म फेफड़ों में जाकर संक्रमण करते हैं। पशु स्थानीय प्रतिक्रिया के साथ म्यूकस तथा बलगम के सहारे परजीवी से मुक्त होने की कोशिका करतें है। इसलिए जानवर दर्द तथा संक्रमण के कारण खांसता है। 

स्टोमक वर्म- स्टोमक वर्म को बहुत ज्यादा मात्रा में खून चूसने वाला परजीवी भी कहतें है। जो रक्त प्रवाह में जाकर स्टोमक के अस्तर को नष्ट कर देता है। और पेट में दर्द, दस्त खून की कमी, वजन कम होना इत्यादि करता है। क्योंकि ग्रसित बकरी खाए हुए पदार्थ को पूर्ण रूप से पचाने में असमर्थ हो जाती है। 

लीवर फ्लूक- ये फ्लूक लीवर में छेद करके सुरंग बना कर क्षतिग्रस्त कर देतें है। क्षतिग्रस्त उतक कार्य नहीं कर पाते, लीवर अपना सामान्य कार्य जैसे खूंन मे से दूषित और खराब उत्पाद को साफ करना आदि। करने में असमर्थ हो जाता है, ये दूषित पदार्थ खूंन में इकट्ठा होकर दूसरे अंग को नुकसान पहुँचाते है।

काक्सीडिया- काक्सीडिया आँत की परत को नष्ट कर देते हैं। जिससे पोषक तत्वों का अवशोषण नहीं हो पाता। मुख्य सामान्य लक्षण हैं – दस्त, वजन कम होना। 

  1. परजीविता का विशिष्ट लक्षण क्या है। 
  • वजन कम होना- जानवर सही तरीके से सारे पौष्टिक तत्व नही ले पाता।
  • दस्त- इसको हम सीधे तौर पर पूँछ के नीचे पिछले हिस्से तथा गंदी पूँछ पर देख सकतें है। 
  • रूखा बाल परत- जब पोषक तत्व कम हो जाते है तो जानवर के शरीर से बाल की चमक खोने लगती है। 
  • अवसाद- इसमें जानवर अपने सिर और कान को नीचे की तरफ गिराए रहता है और लम्बे समय तक खड़े रहने में असमर्थ रहता है। 
  • कमजोरी -जानवर आसानी से पकड़ में आ जाता है और चलने के दौरान लड़खड़ाता है। 
  • रक्ताल्पता -खूंन की कमी के कारण बकरियों के मसूड़े आँख तथा मूलाधार सफेद दिखतें हैं।
  • बुखार – जैसे कान और पैर ठण्डे हो जातें है।
  • तेजी से सांस लेना- (लंग वर्म की घटना में) इसमें जानवर अधिक आक्सीजन अपने खराब फेफडें से लेने की कोशिश करता है। 
  • खाँसना (लंग वर्म में) -जानवर खूब खांसता है क्योंकि उसके क्षतिग्रस्त फेफड़ो में उत्तेजना होती है। 
  1. परजीविता का उपचार कब करना चाहिए

 जब जरूरत हो तथा जिस जानवर को जरूरत हो तो उसी का उपचार करना चाहिए। परजीवी के अण्डे जब सूक्ष्मदर्शी में मिले तो जरूरी नहीं है कि उक्त जानवर का उपचार जरूरी हो। जैसे -लंगवर्म और लीवर फ्लूक का अण्डा पाये जाने पर तुरंत उपचार करतें हैं, लेकिन स्टोमक वर्म और काक्सीडिया का उपचार केवल बहुत ज्यादा संख्या होने पर ही किया जाता है। 

अतिसंवेदनशील वर्म जो पर्यावरण में पाए जातें हैं उसके मदद से प्रतिरोधक क्षमता वाले वर्म की जनसंख्या को नियंत्रित करने में मदद करतें हैं क्योंकि ये प्रतिरोधक क्षमता वाले वर्म से जोड़ कर लेते है। 

अगर बकरी बहुत ज्यादा स्टोमक वर्म से ग्रसित है तो आँख देखकर भी जान सकते हैं क्योंकि ह्रास होने से ऊतक का रंग पीला हो जाता है। 

  1. परजीविता का उपचार कैसे करें

बकरी में पाए जाने वाले परजीवी के लिए कुछ ही दवा अनुमोदित हैं। 

 लीवर फ्लूक- गोबर में कोई भी अण्डा मिलने पर। 

 लंग वर्म – गोबर में कोई भी अण्डा मिलने पर । 

 बार्बर पोल वर्म – जब गोबर में अण्डो की संख्या 500 प्रति ग्राम हो । 

 कास्सीडिया – जब गोबर में 100 अण्डा प्रति ग्राम हो। 

उपचार – हमेशा पशुचिकित्सक के संरक्षण या निर्देशानुसार करना चाहिए। कुछ कृमिनाशक खासतौर के परजीवी के खिलाफ काम करतें है और कुछ के विरूद्ध नहीं क्योंकि परजीवी के द्वारा उस कृमिनाशक के विरूद्ध प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। जब कृमि ज्यादा हो तो सारे परजीवी को एक साथ नहीं मारना चाहिए, उपचार करते समय कृमि की संख्या का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि मरे हुए वर्म से पाचन तंत्र में अवरोध हो सकता है। ऐसी दशा में कम खाने के साथ बार-बार अंतराल में उपचार करना चाहिए। और साथ ही साथ पशुचिकित्सक की सलाह लेते रहना चाहिए। कुछ कृमिनाशक मुंह से खिलाते या पिलाते हैं एवं कुछ इंजेक्शन के द्वारा चमड़ी के नीचे लगातें है। सामान्यतः सुई द्वारा दिया हुआ कृमिनाशक ज्यादा असरदार तथा ज्यादा समय तक से बना रहता है। जानवर सुई वाले कृमिनाशक की ज्यादा प्रतिक्रिया देता है बजाय मुँह से खिलाने पर। 

  • ग्रसित जानवर को इलाज के दौरान स्वस्थ जानवर से अलग रखना चाहिए। 
  • इलाज वाले जानवर को साफ मैदान तथा परजीवी रहित जगह पर घुमाना चाहिए। 
  • उपचार के एक महीने बाद उस उपचार या दवा का असर देखना चाहिए। 
  • अगर दुबारा से जानवर में बहुत ज्यादा परजीवी संक्रमण दिख रहा है तो दुबारा से उपचार करके फिर एक महीने बाद पुनः जाॅच करना चाहिए। 
  • अगर फिर भी परजीवियों पर असर नहीं दिख रहा है तो उपचार बेअसर है और परजीवी झुंड के दूसरे जानवर को प्रभावित कर सकता है। 
  • परजीवता का उपचार के साथ संलग्न –
    • पुनः बीमारी न हो। 
    • साथ ही साथ ऐसी बकरियों का चयन करना चाहिए जो परजीवी के विरूद्ध प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न कर लें। 
  1. परजीविता को कैसे रोकें?
  • सबसे पहले तो बकरियों परजीवियों के सम्पर्क से बचायें।  
  • साफ-सुथरा पर्यावरण उपलब्ध कराएं। 
  • बाड़ो या अहातों को अतिप्रजनन से दूर रखें। 
  • संतुलित आहार दें जिससे जानवर स्वस्थ रहें तथा प्रतिरोधक क्षमता बढ़े मुख्यतः बच्चा देने के बाद । 
  • चारागाह को बदलतें रहना चाहिए।
  • सुबह एवं शाम को चारागाह में ले जाने से बचना चाहिए क्योंकि ओंस की बूंदो के साथ लार्वा घांस पर रहतें है। 
  • स्वस्थ जानवर का चुनाव करना चाहिए।
  • समय-समय पर पशुचिकित्सक की सलाह लेते रहना चाहिए।