ब्रायलर कुक्कुट उत्पादन एंव उसका महत्व

1. ब्रायलर कुक्कुट पालन –

2. ब्रायलर कुक्कुट पालन के लाभ –

3. ग्रामीण क्षेत्र में ब्रायलर कुक्कुट प्रजाति का चयन

4. ब्रायलर मुर्गी पालन में सुधार हेतु आवश्यक सुझाव-

5. ब्रायलर के मांस में पोषक तत्व मूल्य

6. कुक्कुट गृह निर्माण में आवश्यक बातें –

7. डीप लिटर (गहरी बिछावन) पद्धति

8. ब्रायलर में टीकाकरण एंव सावधनियाॅं

9. गर्मियों में ब्रायलर की देखभाल

10. प्रकाश व्यवस्था

11. तापक्रम व्यवस्था

12. ब्रूडिंग इकाई

13. ब्रूडर गार्ड

14. ब्रायलर च्ूजों की देखभाल

15. ब्रूडर हाउस को तैयार करना

16. सफल ब्रूडिंग का परीक्षण

 17. 1000 चूजों को रखने के लिए आवश्यक सामग्री

 18. ब्रायलर के रहने की जगह, दाना व पानी के लिए आवश्यक जानकारी

ब्रायलर कुक्कुट पालन-

भारतवर्ष में घर के मुर्गीपालन का कार्य आदिकाल से होता रहा है। 70 प्रतिशत से अधिक उत्पादित अंडों एवं ब्रायलर की खपत शहरों एवं कस्बों में होती है, जबकि भारत की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी गावों में निवास करती है। तेजी से विकसित होने वाले ब्रायलर कुक्कुट प्रजातियों में रोग प्रतिरोधक क्षमता, वातावरण के प्रति अनुकूलन कम पाया जाता है तथा इनके तेज विकास के लिये विशिष्ट रूप में निर्मित एवं समस्त पोषक तत्वों से सम्पूर्ण कुक्कुट आहार की आवश्यकता होती है। 

कुक्कुट पालन आज एक उधोग के रूप मे स्थापित हो चुका है तथा पिछले कुछ दशको मे ग्रामीण क्षेत्रो मे भी यह व्यवसाय के रूप मे अपनाया जाने लगा है। ग्रामीण विकास मे कुक्कुट पालन की दो विभिन्न भूमिकाए है। प्रथमः छोटे व सीमांत किसानो, भूमिहीन मजदूर, बेरोजगार शिक्षित युवको आदि  के लिए एक सम्मानिय व लाभप्रद व्यवसाय प्रदान करता है। तथा दूसरा यह कि कुक्कुट एक पौश्टिक आहार प्रदान करता है।

व्यवसायिक ब्रायलर फार्मिग का मुख्य आधार  उन्नत नस्ल के चुजे तथा चुजो का समुचित प्रबंधन है। क्योकि चूजे ही बडे होकर आय का स्त्रोत बनते है। अतः अधिक आय के लिए ब्रायलर चूजो का पालन ध्यानपुर्वक एव वैज्ञानिक ढं़ग से करना चाहिए। 

ब्रायलर पालन निम्न कारणो से लोकप्रिय एवं लाभप्रद व्यवसाय के रूप मे स्थापित होता जा रहा है।

1 कम भूमि की आवश्यकता

2 कम प्रारंभिक लागत

3 पैसे की शीघ्र वापसी

4 व्यापार मे लचिलापन

5 ब्रायलर द्वारा दाने को मास मे परिवर्तित करने मे  अधिक संक्षमता

ब्रायलर कुक्कुट पालन के लाभः-

1. स्वरोजगार प्रदान करने में।

2. ब्रायलर का मांस प्रोटीन, विटामिन व खनिज लवण का अच्छा स्रोत है। यह गर्भवती महिलाओं और बढ़ते बच्चों में कुपोषण की समस्या दूर करता है। इस तरह यह सीमांत व लघु कृषकों के सामाजिक व आर्थिक उन्नति में सहायक है।

ब्रायलर मुर्गी पालन में सुधार हेतु आवश्यक सुझाव-

1. उचित जनन द्रव्य का उपयोग –  अज्ञात कुल के देशी कुक्कुट में स्थानीय वातावरण के अनुकूल, आहार प्रबंध के प्रत्याबल, अधिक गर्म तापमान व रोग प्रतिरोधी क्षमता अधिक होती है। परंतु इनसे शरीर भार में बढ़ोतरी धीरे होती है। अतः इनके स्थान पर संकर  तथा विदेशी नस्लों का उपयोग किया जाए।

उदाहरण 

विदेशी प्रजाति – प्लाई माउथराॅक व कार्निस एंव उसकी संकर नस्ले।

उन्नत देशी क्रास – कैरी रैनब्रो, कैरीब्रो, विशाल कैरी, धनराज कैरीब्रो मृत्युन्जय कैरीब्रो, ट्रापीकाना।

द्विकाजी कुक्कुट – कैरी देवेंद्र कैरी निर्भीक कैरी श्यामा उपकारी हितकारी आदि संकर नस्लें।

भारतीय प्रजाति ( बैकयार्ड ग्रामीण ब्रायलर हेतु ) –

मुर्गियों की भारत में मुख्यतः 19 देशी प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनका उत्पत्ति स्थान निम्न हैः-

आंध्र प्रदेश – असील, डेन्की, कालास्थी, घागस।

महाराष्ट्र – अंकेलेश्वर एवं बर्सा।

आसाम – चीतगांव, डेवोथिगिर, फ्रिजल फाऊल एवं मीरी।

पश्चिम बंगाल – हरिंगहाटा।

उत्तर प्रदेश – ब्राउन देशी।

पंजाब – पंजाब ब्राउन।

काश्मीर – फेवरेला।

केरल – टीलीचेरी।

निकोबार – निकोबारी।

म. प्र. – कड़कनाथ।

इसके अलावा टीनी प्रजाति पूरे भारत में पाई जाती है। गर्म एवं आद्र स्थानों में नेकेड नेक एवं फ्रिजल फाऊल पाई जाती है। उपरोक्त सभी कुक्कुट प्रजातियाँ अपने भौगोलिक वातावरण हेतु अनुकूलित हैं।

2. संतुलित आहार संपोषण 

3. बीमारियों की रोकथाम – खासकर मरक्स, रानीखेत और गुम्बोरो बीमारी के अनिवार्य टीकाकरण की व्यवस्था की जाए।

ब्रायलर के मांस में पोषक तत्व मूल्य –

    प्रोटीन 19-21 प्रतिशत, जबकि पकाये हुए में 25-35 प्रतिशत

    वसा 3-5 प्रतिशत

    जल 74-76 प्रतिशत

    ऊर्जा 125-150 कैलोरी/100 ग्राम

    कोलेस्टराल 70 mg/100 ग्राम

सामान्यतः प्रतिदिन 200-300 उह कोलेस्टराल ग्रहण करने की मात्रा सुरक्षित मानी जाती है और ब्रायलर मांस में कोलेस्टराल की मात्रा 70 उह /100 ग्राम होती है और ब्रेस्ट मांस में वसा की मात्रा 1.3 प्रतिशत मात्र होती है जो कि अन्य पशु व कुक्कुट प्रजातियों की तुलना में अत्यंत कम है। अतः ब्रायलर मांस का सेवन उच्च रक्तचाप व डाइबिटिज मरीजों के लिये भी उच्च गुणवत्ता युक्त प्रोटीन का अच्छा स्रोत है।

कुक्कुट गृह निर्माण में आवश्यक बातें –

घर की दीवारें दोनों तरफ से तीन फीट उठी होनी चाहिए और इसके ऊपर पाँच फीट की ऊँचाई तक ळण्प्ण् तार की जाली होनी चाहिए। इस प्रकार दीवारों की कुल ऊँचाई 8 फुट और बीच में छत की ऊँचाई 11 फीट होनी चाहिए। घर का फर्श जमीन से 2-2.5 फीट ऊँचा होना चाहिए। छत एस्बेस्टस या ऐल्युमिनियम की चादर की होनी चाहिए। जो शेड के चारों तरफ 3-4 फीट छज्जे के रूप में बाहर निकली हो। इससे बारिश घर के अंदर प्रवेश नहीं कर पायेगी और सूर्य के प्रकाश का ताप कम पड़ेगा। मुर्गी घर का लंबवत पक्ष पूर्व-पश्चिम की ओर होना चाहिए जिससे सूर्य की गर्मी का प्रभाव कम से कम पड़े। घर की चैड़ाई में पक्की दीवारें पूरी ऊँचाई तक होनी चाहिए। कमरे के कोनों को गोलाई में बनाना चाहिए ताकि चूजे एक साथ इकट्ठे न हों और कुचलने में न मरें। मुर्गी घर के दरवाजे की लंबाई 6 फीट, चैड़ाई 3 फीट होनी चाहिए।

आवास के फर्श निर्माण हेतु मिट्टी, ईंट व पत्थर का चूरा का उपयोग किया जा सकता है, जबकि छत हेतु छप्पर, टाइल, डामरशीट, ऐल्युमिनियम या पालीथीन की शीट का उपयोग स्थानीय उपलब्धता के आधार पर किया जा सकता है।

कुक्कुट गृह निर्माण में अन्य आवश्यक बातें –

  • छोटे फार्म से शुरु करके धीरे धीरे विकास द्वारा बड़ा फार्म खोलना अच्छी नीति है।
  • फार्म खोलने के लिए सबसे प्रमुख है जगह का चुनाव, जो बाढ़ या जल जमाव से प्रभावित न हों, जिसमें पानी की सुलभता हो तथा बारह महीने विक्रय केन्द्र को जोडने वाली सड़क से जुड़़ा हो।
  • चूजे हमेशा विश्वसनीय हैचरी ,जिसे रेण्डम सेम्पल टेस्ट द्वारा प्रमाणित किया गया हो, से ही लेने चाहिए। ब्रॅायलर के लिए व्हाइट कार्निस या राॅक या उनके क्राॅस अच्छे होते है।
  • एक एकड़ भूमि में 10 से 12 हजार ब्राॅयलर  रखे जा सकते हैं। 
  • मुर्गी घर का निर्माण ऊँची भूमि पर होना चाहिए ,जहाँ पानी नहीं रुके तथा हवादार हो। फर्श जमीन से एक फीट ऊँर्चाइ पर हो । बारिश की बौछार रोकने के  लिए 1 मीटर का छज्जा ओवर हैंग होना चाहिए।
  • ब्राॅयलर के लिए एक वर्ग फीट प्रति किलो ब्राॅयलर की जगह देनी चाहिए ।
  • एक मुर्गी घर से दूसरे मुर्गी घर की दूरी कम से कम 20-30 फीट होनी चाहिए।
  • फार्म में छोटे  पेड़ जैसे शहतूत, नीम आदि छाया के लिए होनी चाहिए।
  • मोटे तौर पर 1000 लेयर अण्डे देने वाली मुर्गियों  और 2000 ब्राॅयलर पर एक वर्ष में बराबर पूँजी लगानी पड़ती है तथा बराबर लाभ मिलता है।
  • ब्राॅयलर माँस वाली नस्ल के चूजे होते है, जिनका वजन 4 सप्ताह में 1 किलो होता है। मुर्गी घर बनाते  समय उसके प्राकृतिक  शत्रु जैसे सर्प, बिल्ली, कुत्ते, चूहा आदि से बचाव का पूरा ध्यान रखकर आवश्यक उपाय करना चाहिए।

मुर्गी घरों का आकार –

1. 100 मुर्गियों के लिये = लंबाई 6 मीटर, चैड़ाई 4.5 मीटर, ऊँचाई 3 मीटर

2. 200 मुर्गियों के लिये = लंबाई 9 मीटर, चैड़ाई 6 मीटर, ऊँचाई 3 मीटर

3. 500 मुर्गियों के लिये = लंबाई 30 मीटर, चैड़ाई 7.5 मीटर, ऊँचाई 3 मीटर4. 1000 मुर्गियों के लिये = लंबाई 30 मीटर, चैड़ाई 9 मीटर, ऊँचाई 3 मीटर