भैंसों में प्रजनन हीनता: मुख्य कारण एवं निवारण

भैंसों में अनेकों प्रजनन संबंधी समस्यायें हैं जो उनकी प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती हैं, जिससे भैंसे प्रजननहीनता का शिकार हो जाती हैं और अंततः उनकी उत्पादन क्षमता काफी कम हो जाती है। यदि हम भैंसों में प्रजननहीनता के कारकों की जानकारी रखें एवं उनके निदान के लिए प्रयास करें तो वर्तमान उत्पादन दर को और ज्यादा बढ़ा सकते हैं। भैंसों में प्रजननहीनता के अनेकों कारण हैं परन्तु मुख्य कारण निम्नलिखित हैं जो अधिकतर भैंसों को प्रभावित करते हैं।

1. अमदकाल (Anoestrus)

2. पुटीय डिम्बग्रंथि (Cystic Ovaries)

3. कई बार गाभिन कराने के बाद भी गर्भ न रूकना (Repeat Breeding)

4. गर्भपात (Abortion)

1. अमदकाल

अमदकाल स्वयं कोई बिमारी नहीं है परन्तु अन्य बीमारीयों का लक्षण है। इस अवस्था में भैंसे गर्मी पर नहीं आती हैं। भैंसों में अमदकाल मुख्यतः तीन अवस्थाओं में हो सकता है 

(क) अण्डाशय पर पीतपिंड (कार्पस ल्यूटियम) उपस्थित न हो

कई अवस्थायें/बिमारीयाँ ऐसी हैं जिनमें अण्डाशय पर पीतपिण्ड नहीं पाया जाता है। ओसर में अमदकाल मुख्यतया अण्डाशय का छोटा होने, अविकसित जननांगों, कुपोषण एवं शरीर के अल्प विकास की वजह से हो सकता है। कई पुरानी बीमारियों, उम्र का अधिक होना, अण्डाशय का शिथिल होना, हार्मोन्स की कमी एवं असंतुलन तथा अधिक दुग्ध उत्पादन का भार भैंसों में अमदकाल की स्थिति उत्पन्न कर देता है।

अण्डाशय पर पीतपिण्ड की अनुपस्थिति होने की अवस्था में अमदकाल से प्रभावित भैंस की निम्न प्रकार से चिकित्सा की जा सकती है-

1. निर्बल ओसर पड़िया एवं भैंस को पोषक आहार देना चाहिए तथा एक साल से ज्यादा किन्तु अल्प मात्रा में दूध देने वाली भैंस का दूध निकालना बन्द कर देना चाहिए।

2. वृद्ध भैंसों को मोटा चारा कम तथा पोषक सुपाच्य दाने की मात्रा अधिक देनी चाहिए।

3. जिन भैंसों को पूर्ण आहार न मिलता हो उनके राशन का संतुलित होना आवश्यक है।

4. खनिजों की अल्पता होने पर डाइकैल्शियम फास्फेट, हड्डी का चूरा, मछली का चूरा अथवा खनिज मिश्रण खिलाना चाहिए।

5. वातावरण के प्रकोप से भैंसों को बचाना चाहिए।

6. समय-समय पर गुदा परीक्षण विधि से जननांगों की जाँच कराना चाहिए तथा रोगग्रस्त भैंसों को प्रजनन अभिलेखों के आधार पर पशुचिकित्सक द्वारा परीक्षण कराना चाहिए।

(ख) अण्डाशय पर पीतपिंड (कार्पस ल्यूटियम) उपस्थित  हो

अण्डाशय पर पीतपिण्ड उपस्थित होने पर अमदकाल की स्थिति भैंसों में बहुतायत में देखने को मिलती है। भैंस के गाभिन होने की दशा में अमदकाल के लक्षण दिखाई देते हैं अतः ऐसी स्थिति में गुदा परीक्षण विधि से भैंस के जननांगों की जाँच कराकर उसके गाभिन होने की सही स्थिति का पता लगाया जा सकता है। मादा के जननांगों की अन्य कई अवस्थायें हैं जिसमें अण्डाशय में पीतपिण्ड के उपस्थित होने के पश्चात् भैंस गर्मी पर नहीं आती। उदाहरणार्थ – बच्चेदानी के अन्दर शिशु का मरना एवं सूख जाना, बच्चेदानी में संक्रमण होना, भैंस के बढ़वार के समय विकार उत्पन्न होना, बच्चेदानी में मवाद होना एवं बच्चेदानी की बीमारी का गलत उपचार किया जाना। 

कई बार देखने में आता है कि पशुपालक की असावधानी के कारण भैंस को अमदकाल की गिनती में ले लिया जाता है जबकि पशु नियमित समय पर गर्मी के लक्षण प्रदर्शित करता है। अतः पशुपालक को भैंस के अमदकाल के लक्षणों से अच्छी तरह परिचित होना आवश्यक है। मदकाल के कुछ प्रमुख लक्षण जिसे पशुपालक आसानी से पहचान सकते हैं, निम्नलिखित हैं-

(क) भैंस बार-बार रम्भाती है।

(ख) दुधारू भैंसों में मदकाल के दौरान दूध कम हो जाता है।

(ग) मदकाल में भैंस खाना-पीना कम कर देती है।

(घ) भैंस के भग से सफेद, चिपचिपा सा शलेष्मा का स्राव होता है।

(ड.) भैंस बेचैनी महसूस करती है तथा बेचैनी से इधर-उधर घूमने लगती है।

(च) भग की शलेष्मिका का रंग सूर्ख गुलाबी हो जाता है।

(छ) भैंस बार-बार पेशाब करती है।

अमदकाल के भैंसों के उपचार के लिए पशु की गहन  जाँच अति आवश्यक है। पशु प्रजनन अभिलेखों का बारीकी से अध्ययन तथा गुदा विधि से परीक्षण व जननांगों के वि य में अधिकाधिक जानकारी एकत्रित करने के बाद ही चिकित्सा प्रारम्भ करनी चाहिए। यदि भैंस के अण्डाशय पर पीतपिण्ड उपस्थित हों और भैंस अमदकाल में हो तो निम्नलिखित उपाय अपनाये जा सकते हैं।

1. प्रोस्टग्लैंडिन का इंजेक्सन:  इंजेक्शन अंतःमांसपेशीय देने से भैंसें अगले 2 या 3 दिन में गर्मी पर आ जाती हैं।

2. इस्ट्रोजन का अंतःमांसपेशीय इंजेक्शन देने से तथा 2 से 4 दिन बाद दोहराने से पीतपिण्ड का अंतर्वलन, गर्भाशय की सफाई तथा मदचक्र प्रारम्भ हो जाता है।

3. यदि भैंस के भग से लगातार स्राव आ रहा है तथा उसमें गंदापन है तो स्राव का सुग्राही परीक्षण करवाकर उचित दवा देने से 5 से 6 दिनों में गंदे स्राव का आना बन्द हो जाता है एवं संक्रमण दूर होते ही भैंस मदकाल के लक्षण प्रदर्शित करने लगती है।

(ग) अस्पष्ट मदकाल

प्रायः यह भी देखा गया है कि अनेक भैंसों में गर्मी के लक्षण स्पष्ट परिलक्षित नहीं होते हैं। अर्थात् भैंसें अस्पष्ट या असामान्य मदकाल की समस्या से ग्रसित होती हैं। भैंसों में यह समस्या गायों की तुलना में कहीं ज्यादा होती है। अध्ययन के दौरान भैंसों में अस्पष्ट मदकाल की समस्या 6-30 प्रतिशत तक रिपोर्ट की गयी है। इस समस्या से प्रभावित भैंसों में गुदा परीक्षण पर पता चलता है कि उसके अण्डाशय पर पीतपिण्ड उपस्थित रहता है तथा जनन अंगों में भी मदकाल में होने वाले परिवर्तन साफतौर पर पता चलते हैं। प्राकृतिक गर्भाधान में साँड़ ऐसे पशुओं में मदकाल बड़े ही आसानी से पता लगा लेता था, परन्तु कृत्रिम गर्भाधान के विकास के साथ पशुपालकों को ऋतुकाल की पहचान स्वयं करनी पड़ती है। अस्पष्ट गर्मी के लक्षणों का कारण अण्डाशय पर उपस्थित वयस्क ग्रेफियन फालिकल द्वारा उत्पादित इस्ट्रोजन हारमोन की मात्रा का कम होना भी हो सकता है।

भैंसों में प्रजनन पूरे वर्ष भर नही होता है। अधिकतर भैंसें सर्दियों के मौसम में यानि अक्टूबर से मार्च तक गर्मी (मद) पर आती हैं तथा इसी दौरान प्रजनन शक्ति अधिक होती है। यह अभी तक पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं है कि एक निश्चित मौसम में गर्मी पर आना एक अनुवंशिक लक्षण है अथवा खान-पान या मौसम के प्रभाव के कारण का परिणाम है। यह पाया गया है कि भैसें गायों की अपेक्षा सौर विकिरण एवं उच्चताप के लिए ज्यादा सुग्राही होती है। भैसों के शरीर की मोटी अधिचर्म स्तर (इपिडर्मल लेयर) एवं उनके शरीर का गाढ़ा रंग, गर्मियों में अधिक उष्मा का अवशोषण करता है। भैंसों की चमड़ी में प्रति इकाई क्षेत्रफल में पसीने की ग्रंथियाँ भी काफी कम होती हैं जिसके फलस्वरूप शरीर का ताप काफी बढ़ जाता है। गर्मियों में हरा चारा एवं पोषक तत्वों की कमी भी भैंसों में प्रजनन क्षमता का हृास करती है। अतः गर्मियों में यदि हम भैंसों को सदैव छायादार स्थान पर बाँधेएवं दिन में 2-3 बार स्नान करायें अथवा पानी भरे तालाब में लोटने की व्यवस्था रखें तो ग्रीष्म प्रजननहीनता की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। 

2. पुटीय डिम्बग्रंथि

भैंसों में पुटीय डिम्बग्रंथि की बीमारी गायों की अपेक्षा कम होती है। भैंसों में इसकी प्रभाव सीमा 0.9-2.0 प्रतिशत तक जबकि गायों में 8.8-27.4 प्रतिशत तक देखी गयी है। भैंसों में इस बीमारी की प्रतिशतता कम होने का कारण, इनमें दुग्ध उत्पादन का तनाव गायों की अपेक्षा कम होना, हो सकता है। पुटीय डिम्बग्रंथि मुख्यतः दो प्रकार की हो सकती है-

(क) ग्राफियन पुटि

इस स्थिति में डिम्बक्षरण नही हो पाता तथा मादा सदैव ऋतुमयी रहती है अथवा जल्दी-जल्दी ऋतुमयी होती है परन्तु भैंसों की अपेक्षा गायों में ये लक्षण ज्यादा दिखाई देते हैं।

(ख) ल्यूटिनीकृत पुटि

इस स्थिति में भी डिम्बक्षरण नही होता है। डिम्बाशय पर ल्यूटिनीकृत पुटि होने पर पशु अमदकाल के लक्षण प्रदर्शित करता है।

पुटीय दशा का मुख्य कारण पिट्यूटरी ग्रन्थि द्वारा ल्यूटिनीकृत हार्मोन (एल0एच0) के कम मात्रा में उत्पन्न होने से डिम्बक्षरण तथा पीतपिण्ड का विकास सामान्य रूप से न हो पाना है। इस दशा की चिकित्सा निम्न में से किसी एक विधि द्वारा की जा सकती है-

1. कोरुलान (3000 यूनिट), अंतर्शिरीय लगाना लाभदायक रहता है।

2. रिसेप्टाल (जी0एन0आर0एच0), 5 मि0ली0 अंतःमांसपेशीय दिया जाये।

3. फर्टाजिल, 5 मि0ली0, अंतःमांसपेशीय दिया जाये।

3. कई बार गाभिन कराने पर भी गर्भ न रुकना (रिपीट ब्रीडिंग)

भैंस को बार-बार गाभिन कराने के बावजूद भी गर्भ न रुकना एक बहुत बड़ी समस्या है। रिपीट ब्रीडिंग की प्रभाव सीमा भैंसों में 20-25 प्रतिशत तक देखी गई है। बार-बार कृत्रिम सेंचित कराने पर भी गर्भ न रुकने की समस्या भी मुख्यतः दो कारणों से हो सकती है। प्रथम, नवजात भ्रूण की मृत्यु तथा द्वितीय, समय पर निषेचन न हो पाना। यह समस्या मादा के जननांगों की संरचना, जन्मजात विकार, शुक्राणु, अण्डाणु एवं भ्रूण में विकार, जननांगों में किसी प्रकार की चोट व रोग, हार्मोन का असंतुलन, पोषक तत्वों की कमी, प्रबन्ध सम्बन्धित कारक आदि में से किसी भी वजह से उत्पन्न हो सकती है।

ऐसी स्थिति में जननांगों की जाँच तथा पशु के स्राव की जाँच पशुचिकित्सक से करवाना अति आवश्यक है जिससे उचित इलाज किया जा सकता है। जननांगों में संक्रमण की अवस्था में उसके स्राव का एंटीबायोटिक सुग्राही परीक्षण करवाकर उपयुक्त एंटीबायोटिक को गर्भाशय  में डालना चाहिए। आजकल के वर्षों में निम्न स्तर के गर्भाषय पेषी शोथ की चिकित्सा के लिए कुछ प्रतिरोधक क्षमतावर्धक दवाओं जैसे- लाइपोपोलीसेकराइड्स तथा लेवामीसोल का प्रयोग प्रभावी ढंग से किया जा रहा है। यदि भैंसों में रिपीट ब्रीडिग निम्नस्तरीय गर्भाशय पेषीषोथ के कारण है तो इन दवाओं का प्रयोग लाभदायक सिद्ध हो सकता है। यदि देर से डिम्बक्षरण की वजह से भैंस बार-बार गर्मी पर आती है तो ऐसी स्थिति में कोरुलान (1500-3000 आई0यू0) का इंजेक्षन समय से डिम्बक्षरण कराने में असरदार पाया गया है। अच्छी प्रबंध व्यवस्था से रिपीट ब्रीडिग की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। पषु को संतुलित आहार देना चाहिए, समय पर कृमिनाषक दवापान कराना बीमारी से बचाव के लिए टीका लगाना तथा दिन में दो बार सुबह-षाम भैंसों का गर्मी के लक्षणों के लिए ध्यान देना तथा उपयुक्त समय पर उच्च गुणवत्ता वाले वीर्य से गर्भाधान कराने पर इस समस्या की प्रभाव सीमा को काफी कम कर सकते हैं। 

4. गर्भपात

मृत अथवा 24 घंटे से कम समय तक जीवित भ्रूण का गर्भकाल पूर्ण होने के पूर्व गर्भाशय  से बाहर निकलना गर्भपात कहलाता है। गर्भपात गर्भकाल के किसी भी समय विभिन्न कारकों के कारण हो सकता हैयद्यपि भैंसों मे गर्भपात की औसत (2-3 प्रतिषत) गायों (4.72 प्रतिषत) की अपेक्षा कम पाई गयी है, पर यह भैंसों में प्रजननहीनता का एक प्रमुख कारण हो सकता है तथा पषुपालकों के आर्थिक पक्ष पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। गर्भपात से होने वाली प्रमुख आर्थिक हानियों में एक अनुत्पादित गर्भ का नुकसान, गर्भपात के पश्चात् होने वाली बच्चेदानी की बीमारियाँ और उनसे संबंधित प्रजननहीनता तथा गर्भपात कराने वाले संक्रामक कारकों का अन्य पशुओ पर होने वाला प्रभाव शामिल है।

गर्भपात निम्न लिखित कारणों से हो सकता है-

(क) संक्रामक कारक

(ख) असंक्रामक कारक

(क) संक्रामक कारक

गर्भपात कराने वाले वास्तविक कारक का पता लगाना एक कठिन कार्य है। एक अध्ययन के दौरान पाया गया है कि 31000 गर्भपात के परीक्षण में से वास्तविक संक्रामक कारकों का सिर्फ 5.45 प्रतिशत में ही पता लगाया जा सकता है। इसका प्रमुख कारण गर्भपात होने के पूर्व ही भ्रूण तथा अपरा का गर्भाशय में स्वलयन होना तथा सड़ जाना है जिसके कारण सही नमूने नैदानिक प्रयोगशाला में नही पहुच पाते हैं। पर नवीनतम सूचना के अनुसार कुछ वर्षों में फ्लोरसेंट एंटीबाडी टैक्नीक के द्वारा गर्भपात के संक्रामक कारकों की पहचान में काफी प्रगति हुई है। गर्भपात कराने वाले संक्रामक कारकों में 2.9 प्रतिषत गर्भपात ब्रूसेला एर्बोर्टस नामक जीवाणु से होते हैं। यह गाय एवं भैंसों में गर्भपात कराने वाला सबसे घातक कारक है जिससे गर्भावस्था के आखिरी त्रैमास में गर्भपात होता है। इस जीवाणु का संचरण संक्रमित भैंसों के जननांगों के स्राव तथा दूध से होता है। इस रोग की पहचान भ्रूण तथा अपरा से लिए गये नमूने में जीवाणु की उपस्थिति तथा दूध, रक्त आदि के परीक्षण, समूह परीक्षण तथा अन्य सीरमीय परीक्षणों के द्वारा की जा सकती है। गर्भपात के बाद अनिर्गत अपरा इस रोग का प्रमुख सूचक हो सकती है।

लेप्टोस्पाइरा पोमोना नामक स्पाइरोकीट भी गर्भापात के प्रमुख जीवाणु जनित कारकों में से एक है। इसमें तीव्र ज्वर के बाद अधिकतर गर्भावस्था के आखिरी त्रैमास में गर्भपात होता है। लिस्टीरियोसिस नामक बीमारी में भी ज्वर के बाद या बिना किसी लक्षण के गर्भपात हो जाता है। यह उन पशुओं में अधिक पाया गया है जिनके पोषण में मुख्यतः साइलेज का प्रयोग किया जाता है। इन बिमारियों का निदान समूह परीक्षण के द्वारा किया जा सकता है। अन्य जीवाणु जैसे कि विब्रीयोसिस, यक्ष्मा रोग, कोराइनीवैक्टेरियम पायोजेनिस, पास्टुरेला मल्टोसिडा, सालमोनेला पैराटाइफी इत्यादि भी भैंसों में गर्भपात का कारण हो सकते हैं।

विभिन्न विषाणु जनित कारक भी भैंसों में गर्भपात करा सकते हैं जिनमें बोवाइन बाइरल राइनोट्रेकिआइटिस, गोपषु गर्भपात महामारी, बोवाइन बाइरल डायरिया प्रमुख हैं। संक्रामक बोवाइन राइनोट्रेकिआइटिस जनित गर्भपात प्रायः गर्भकाल के प्रथम त्रैमास में होते हैं तथा इनमें अपरा अनिर्गत रहती है। जबकि गोपशु गर्भपात महामारी (ऐपीजूटिक बोवाइन एवार्सन) से 6-8 माह के बीच गर्भपात होता है।

कवक जनित कारक जैसे कि ऐस्पर्जिलस एवं म्यूकरेल्स की प्रजातियाँ 5-7 माह के बीच गर्भपात कराते हैं। इनमें प्रायः भ्रूण की गर्भाषय में ही मृत्यु हो जाती है अथवा निर्बल शिशु पैदा होता है जो कि शीघ्र ही मर जाता है।

इसके अलावा कई प्रोटोजोआ समूह के कारक जैसे कि ट्राइकोमोनिएसिस भी गर्भपात का एक प्रमुख कारक है यह प्रोटोजोआ संक्रमित साँड़ द्वारा गर्भाधान कराने अथवा कृत्रिम गर्भाधान से भैंसों में फैलता है। इससे गर्भाकाल के प्रथम 2-3 माह के भीतर ही गर्भपात हो जाता है। प्रायः यह भी देखने में आया है कि उच्च ज्वर, चाहे वह किसी भी कारण से हुआ हो, पशुओं में गर्भपात का कारण होता है।

(ख) असंक्रामक कारक

विभिन्न असंक्रामक कारक जैसे कि रासायनिक अथवा जहरीले पदार्थ, कुपोषण, अनुवांषिक कारक, भौतिक कारक गर्भपात कराने में समर्थ हैं।

विभिन्न रासायनों तथा जहरीले पदार्थों का किसी भी रूप में सेवन अथवा प्रयोग गर्भपात का कारण हो सकता है। इसके अलावा शरीर में विभिन्न हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाने से भी गर्भपात हो सकता है। एलर्जी, शारीरिक बीमारी तथा अनुवांशिक विकृतियाँ भी गर्भपात करा सकती हैं। गर्भावस्था के दौरान विभिन्न भौतिक कारक जैसे कि गाभिन भैंस का कृत्रिम गर्भाधान, लड़ना, दौड़ना, असामान्य वातावरण, लम्बी यात्रा कराना इत्यादि भी गर्भपात के कारण हो सकते हैं।

गर्भपात से बचाव

1. नये खरीदे गये पषुओं को मूल पशुओं में शामिल करने से पहले क्वारेनटाइन   (कम से कम 21 दिन) में रखें एवं पषुचिकित्सक से  जॉंच कराने के बाद ही मूल पशुओं में शामिल करें। नये पशुओं को उसी डेरी फार्म से खरीदें जो पशुओं के समस्त अभिलेख रखता हो।

2. कृत्रिम गर्भाधान के लिए निर्जमीकृत औजारों का प्रयोग किया जाना चाहिये। 

3. संक्रमित  साँड़ को प्राकृतिक गर्भाधान के लिए प्रयोग में नहीं लाना चाहिए एवं संक्रमित पशुओं को प्रजनन से वंचित रखना चाहिए अथवा नष्ट कर देना चाहिए।

4. डेरी फार्म का वातावरण स्वच्छ एवं निर्जमीकृत होना चाहिए।

5. ब्रूसेलोसिस से बचाव के लिए ब्रूसेला ऐर्बोर्टस स्ट्रेन-19 का टीका लगाकर समूह को इस जीवाणु से होने वाले गर्भपात से बचाया जा सकता है।

6. पशुओं के चारे में अचानक परिवर्तन नहीं करना चाहिए।

7. खराब साइलेज का चारे के रूप में प्रयोग नहीं करना चाहिए।

8. जिन पशुओं में गर्भपात हुआ हो उन्हें समूह के बाकी पशुओं से अलग कर देना चाहिए तथा भ्रूण एवं अपरा को किसी गड्ढे में चूना मिलाकर गाढ़ देना चाहिए।

9. पशुओं में गर्भाधान कराने से पूर्व, उस साँड़ अथवा वीर्य का संक्रमित न होना सुनिश्चित कर लेना चाहिये।

भैंसों में प्रजननहीनता के इन उपरोक्त कारणों पर उचित ध्यान देकर तथा उनके निवारण से ही अधिक से अधिक लाभ लिया जा सकता है। पशु पालकों में इस पशु के उचित प्रबन्धन एवं प्रजनन संबंधी जानकारी इसे देश के प्रमुख दुग्ध उत्पादक पशु के रूप में स्थापित करने में मदद करेगी तथा देश की अर्थव्यवस्था में पशुपालन एवं दुग्ध उत्पादन व्यवसाय को प्रमुख स्थान दिलाने में मदद करेगी।