बीमारियों के लक्षण-


मत्स्य पालन में बीमारियों की पहचान
मछलियाँ भी अन्य ब̧ाणियांे के समान ब̧तिकूल वातावरण में रोगग्रस्त हो जाती है।ं साधरणतः मछलियाँ तब तक रागे , व्याधि से लडऩ े में पूर्णतः सक्षम होती हैं, जब तक कि उन्हंे समुचित देखरेख के अभाव में क्षीण न बना दिया जाए। रागे फैलते ही संि चत मछलियोंकेस्वभावमेंब̧त्यक्षअतंरआजाताहै।वैसेभिन्न-भिन्नबीमारियांेके अलग-अलग लक्षण होते हैं, परंतु कुछ आम लक्षण इस ब̧कार हैः-
1⁄411⁄2 बीमार मछली, समूह में न रहकर किनारे पर अलग दिखाई देती है। उसके सामान्य व्यवहार में व तैरने में काफी फर्क आने लगता है और वह शिथिल हो जाती है।
1⁄421⁄2 मछली के बीमार होते ही उसके आहार ग्रहण करने की क्षमता में कमी आने लगती है।
1⁄431⁄2 रोगी मछली के स्वभाव में ही नहीं बल्कि उसकी शारीरिक बनावट, आकार, ब̧कार, रंग-रूपआदिमेंभीअतंरआजाताहै।जैस-े बदरंगहोजाना,पंखोंकीकिनारियों का सफेद पड़ जाना, शरीर तथा पंखांे की जड़ांे में पानी भर जाना, पेट का फूल जाना,क्लोमोंकासड-़गलजाना,श्लेष्मकाअत्यधिकस्त्राव,शरीरपरसूझनव विभिन्न ब̧कार के धब्बे होना, त्वचा पर जख्म हो जाना तथा चोट भाग पर फफूदं का सक्रं मण इत्यादि।
1⁄441⁄2 मछली का बार-बार सतह पर आना कठोर सतहांे पर शरीर रगड़ने की ब̧वृति,
आँखोंमेंसझूनतथासतंुलनबनाएरखनेमेंकठिनाईइत्यादिभीरोगीमछलीके लक्षण हो सकते हैं।
बीमारियों के कारण
मछली चूंिक जलीय जीव है इसलिये उसके जीवन पर आस-पास के वातावरण परिस्थतियाँ बहुत असरदायक होती है।ं इसलिये मछली के परिवेशी पर्यावरण उसके अनुकूल रहना अत्यन्त आवश्यक है। मछली के बीमार हो जाने के कुछ ब̧मुख कारण इस ब̧कार हंःै
1⁄411⁄2 जल में मछली को ब̧भावित करने वाले ब̧मुख कारक हंैः-
पानी की गुणवन्̀ाा, ताप, पी.एच., आक्सीजन व कार्बन-डाई.आक्साइड। जल में घुलनशीलऑक्सीजनवकार्बन-डाईआक्साइडकेबीचकासतंुलनमत्स्यपालनकी दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हाते ा है। इस सभी कारकों के स्तर में ब̧तिकूलता मछली के लिए घातक हाते ी है।
पैरामीटर
तालिका नं. 1
मछली पालन हते ु पानी की गुणवन्̀ाा के ब̧मुख कारकों का सतं ुलन परिमाप परिमाप
पी.एच
क्षारीयता 1⁄4कैल्सियम कार्बाेनेट1⁄2
अमोनिया
कैल्सियम
कार्बन डायऑक्साइड
. घुलित ऑक्सीजन की मात्रा हाइडंोजन सल्फाइड
नाइटंेट पोटेशियम लवणता
7.0-8. 6
20 पी.पी.एम.
ढ 0.2 पी.पी.एम 52 पी.पी.एम. 15-20 पी.पी.एम
झ 5 पी.पी.एम.
ढ 0.003 पी.पी.एम. ढ 1.0 पी.पी.एम. ढ 5.0 पी.पी.एम. ढ 2 पी.पी.एम.

1⁄421⁄2 मछली के वर्ण्य पदार्थ जल में एकत्रित होते रहते हैं व मछली के विभिन्न अंगों जैसे गलफड़े, चर्म, मुखगुहा के सपं र्क में आकर इन्हें नष्ट कर देते हैं।
1⁄431⁄2 कार्बनिक खाद, उर्वरक या आहार आवश्यकता से अधिक दिये जाने पर जल में कुछ गैसें जैने-हाइडंोजन सल्फाइड, अमोनिया, कार्बन-डाई-ऑक्साइड की मात्रा अधिक हो जाती है, जो नुकसानदायक होती है, साथ ही अत्यधिक संचय दर भी उनके रोगी होने का एक कारण है।
1⁄441⁄2 कई बार तापमान में उतार-चढ़ाव, मछली के सहनशंि̈ सीमा से अधिक होने पर वह भारी दबाव में आ जाती है, जिससे उसके रोगी होने की संभावना रहती है।
1⁄451⁄2 बहुत से रोगजनक जीवाणु पानी में रहते हैं। जब मछली ब̧तिकूल परिस्थितियों के दबाव में आकर कमजोर हो जाती है तब जीवाणु उस पर आक्रमण करके उन्हें रोगी बना देते है। इसलिए जलीय वातावरण, उसमें रहने वाले रोगजनक तथा मछली के बीच उचित संतुलन रहना बहुत जरूरी है।