मियासिस रोगः नियंत्रण एवं उपचार

मियासिस रोग दंश या स्ट्राइक नाम से भी जाना जाता है। मक्खियों की विभिन्न जातियों  जैसे कि ल्यूसीलिया, कैलीफोरा, फोरमिया, क्राइसोमिया एवं कैलीट्रोगा के लार्वाओं से यह रोग उत्पन्न होता है। ये मक्खियां सडन की गंध से आकार्षित होकर शवों, जख्मों या मल से सने हुए हिस्सों पर हल्के पीले रंग के अण्डों के गुच्छे जमा कर देती है।  इससे बकरी, भेंड, गाय, भैंस, सूअर और अश्व बहुदा प्रभावित होते है किन्तु कुत्ते और मनुष्य भी प्रभावित हो सकते है। जख्मी भागों पर आघात पहुँचने के कारण इस प्रकार के दंशों को जख्म आघात भी कहा जाता है। दुर्घटनाओं, बधिया करनें, श्रंग विहीन करने, किलनी काटने या अन्य कारणों से बने जख्म बहुधा देखे जाते है। इन जख्मों में मक्खियाँ अंडे देती है और साथ ही पशुओं की भग के आस पास जब तक रक्त मिश्रित श्राव निकलता रहता है या अल्पायु बछड़ों की नाभि पर भी अंडे देती है। ये दशाएं अधिकांशतः वर्षा ऋतु में उत्पन्न होती है। इन मक्खियों के मैगट ऊतकों को भेद देते है और गला देते है जिससे घाव अधिक फैल जाता है और उससे दुर्गन्ध आने लगती है और दुर्गन्धपूर्ण द्रव निकलता रहता है। इस बीमारी से ग्रस्त पशु चारा खाना छोड़ देता है जिससे कि उनकी उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बहुदा संक्रमण तीव्र होता है और संक्रमण से पशु की अक्सर मृत्यु हो जाती है जिससे पशुधन को अत्यधिक हानि होती है। 

मक्खियों को आकर्षित करने के लिए और लार्वाओं को आवास प्रदान करने के लिए यदि घाव विद्धमान न हो तो जीवाणु क्रिया उपयुक्त दशाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। देर तक चलने वाली आद्र दशाओं के कारण त्वचा नम बनी रहती है तथा बाल या ऊन आपस में गुंथ जाते है और जीवाणु वृद्धि के लिए उपयुक्त माध्यम बना देते है। ये सडन एवं गलाव उत्पन्न करते है जिससे मक्खियाँ आकर्षित होती है। धीरे – धीरे बड़े जख्म उत्पन्न हो जाते है तथा विशेष रूप से द्वितीयक मक्खियों के लार्वा ऊतकों में और त्वचा के नीचे गहरी सुरंग बना लेते है। प्रभावित पशु बहुधा सिर झुका कर खड़ा रहता है एवं चारा नही खाता और प्रभावित भाग को काटने का प्रयास करता रहता हैै।  

मियासिस की कारक मक्खियों की पहचान- यह रोग उत्पन्न करने वाली ल्यूसीलिया मक्खियों का रंग चमकीला धातु के रंग का होता है इस लिए ये हरी बोतल या ताम्र बोतल मक्खियाँ कहलाती है । इनकी आँखें भूरी लाल होती है एवं शरीर अपेक्षाकृत पतला और लम्बा होता है । कैलीफोरा वंश की जातियाँ नीली बोतल मक्खियाँ कहलाती है क्यों कि इन के शरीर की आभा चमकीली नीली होती है। आँखों का रंग लाल होता है। यह मक्खी उड़ते समय जोर से भिनभिनाती है। फोरमिया वंश की जातियां काली ब्लो मक्खी कहलाती है। यह भेंड की ऊन में अपने अंडे देती है इसका वक्ष काला होता है तथा इसमें चमकीली नीली हरित आभा होती है। वंश कैलीट्रोगा और क्राइसोमिया की स्क्रू क्रमि मक्खियां भारत में मनुष्य और पालतू पशुओं की त्वचा पर अंडे देती है । क्राइसोमिया को भेंड की ब्लो मक्खी भी कहा जाता है । कैलीट्रोगा के वयस्क लम्बे होते है तथा इनका शरीर नीलाभ हरा होता है।                   

मक्खियों का जीवन वृत्त-

मक्खियां सडन की गंध से आकार्षित होकर शवों जख्मों या मल से सनी हुयी ऊन में हल्के पीले रंग के अण्डों के गुच्छे जमा कर देती है। मक्खी जब अंडे देने के लिए उपयुक्त स्थान की खोज कर रही होती है तो उपलब्ध नम पदार्थ खा जाती है। एक मादा मक्खी कुल मिलकर 500 से 2500 अंडे देती है और एक बार में 50 से 150 तक अंडे देती है। डिम्बग्रन्थियों को पूर्ण परिपक्व होनें के पूर्व मक्खियों को प्रोटीन युक्त आहार ग्रहण करना होता है। लार्वा  तापमान के अनुसार 8घंटे से तीन दिन में निकल आते है और पोषण प्राप्त करने लगते है। ये तेजी से वृद्धि करते है और दो निर्मोकोत्सर्जन के पश्चात लगभग 2 से 19 दिन में पूर्ण विकसित मैगट बन जाते है। वृद्धि की दर आहार के परिमाण और उपयुक्त तापमान और अन्य लार्वाओं के साथ प्रतियोगिता पर निर्भर करती है। परिपक्व लार्वा लम्बे हरित श्वेत या हल्के पीले रंग के होते है। जिसके बाद ये भूमि में प्यूपा बनने के लिए चले जाते है। प्यूपा अवस्था तापमान पर निर्भर करती है और लगभग 7 सप्ताह बाद वयस्क अवस्था आ जाती है। 

मक्खियाँ ऋतु के परिवर्तन के अनुसार एवं तापमान के अनुसार बढती है। ये बसंत के अंत में और ग्रीष्म के प्रारम्भ में बहुधा अधिक होती है। वयस्क मक्खी तरल प्रोटीन और कुछ प्रकार के पौधों के मधु रस से अपना भोजन लेती है। लारवा अपना भोजन जीवित भेंड से प्राप्त करते है अथवा विभिन्न पशुओं के उन शवों से प्राप्त करते है जहाँ वयस्क मक्खियों ने अंडे दिए थे। ये मक्खियाँ अग्रलिखित समूहों में वर्गीकृत की जा सकती है-  

क)  प्राथमिक मक्खियाँ जो जीवित भेड़ पर अंडे देकर आघात का प्रारम्भ करती है। 

ख) द्वितीयक मक्खियाँ जो प्रायः ऐसा नही करती किन्तु पहले से आघात प्राप्त भेंड पर अंडे देती है। इनके लार्वा प्राथमिक मक्खियों के लार्वाओं द्वारा उत्पन्न जख्म को और फैला देते है।

ग) तृतीयक मक्खियाँ जो सबसे अंत में आती है तथा जिनके लार्वा बहुत कम हानि पहुंचाते है। यह क्रम जीवित और मृत दोनों ही प्रकार की भेड़ों पर चलता है।

इस प्रकार प्राथमिक मक्खियों के लार्वा स्वतः विगलन और प्रारम्भिक जीवाणु विगलन के समय विकसित होते है। द्वितीयक मक्खियों के लार्वा द्रवण के अनुवर्ती सोपान में विकसित होते है जब कि तृतीयक मक्खियों के लार्वा उस समय विकसित होते है जब शव सूखने लगता है। 

उपचार और बचाव- 

मियासिस रोग के उपचार में सर्वप्रथम जख्म को लाल दवा के पानी से अच्छी तरह से साफ करना चाहिए फिर जख्मों के लार्वाओं को हटा कर नष्ट करना चाहिए, और अधिक लार्वाओं द्वारा पुनर्सक्रमण से रोकना चाहिए, ऊन काटकर जख्म के विस्तार का पता लगाना चाहिए एवं हटाये हुए लार्वाओं को तुरंत नष्ट कर देना चाहिये ताकि इनसे वयस्क मक्खियाँ उत्पन्न न हो सके। इसके उपरान्त जख्म पर मलहम लगाकर पट्टी से बाँध देना चाहिए। पट्टी बांधते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि पट्टी मुलायम हो एवं भेंड के लिए विषाक्त न हो तथा जख्म भरने में सहायता करे। उपचार के लिए अनेक कीटनाशी प्रयुक्त किये जा सकते है। जिनमे अग्रलिखित सम्मिलित है जैसे कि 0.4 प्रतिशत डाईल्ड्रीन, 0.5 प्रतिशत बी.एच.सी, 0.3 प्रतिशत एल्ड्रीलन और अनेक ओर्गनोफोस्फोरस कीटनाशक प्रयुक्त किये जा सकते है।

भेंड को मक्खियों के लिए कम आकर्षित बना देना चाहिए जिससे कि मक्खियाँ कम आकर्षित हों जो निम्न प्रकार से किया सकता है- जैसे कि नितम्ब की सलवटों को शल्यचिकित्सा द्वारा हटा देना चाहिए । पूँछ को काट देना चाहिए। पूँछ के आस-पास और नितम्ब की ऊन काट देनी चाहिए। मक्खियों का डी. डी. टी. की सहायता से  सही ढंग से नियंत्रण किया जाना चाहिए। भेड़ों और बकरियों के शवों का भी सही ढंग से निस्तारण  किया जाना चाहिए। मक्खियों के मैगटों को नष्ट कर देना चाहिए। 

उपर्युक्त दिए गए उपचार एवं बचाव को अपनाकर हम अपनी भेड़ों और बकरियों की सही ढंग से देखभाल कर सकते है एवं उनकी उत्पादन क्षमता को भी बढ़ा सकते है।