मुर्गियों में पाये जाने वाले अंतः परजीवी

अंतः परजीवी मुर्गियों के शरीर के अन्दर निवास करते है, और उनसे पोषण प्राप्त अपनी वृद्धि करतें है। अंतः परजीवी दो प्रकार के होते हैं जो मुर्गियों को प्रभावित/नुकसान करते है इनमें -प्रोटोजोवा और कृमी या कीड़ा परजीवी के द्वारा निम्नलिखित नुकसान होते हैं –

1. कम वृद्धि, अण्डे का पैदावार कम हो जाना। 

2. असहज होना। 

3. आहार का रूपान्तर कम होना। 

4. मौत।  

कृमि/कीड़ा –

  • गोल कृमि – यह सामान्यतः मुर्गी, जलपक्षी, जंगली पक्षी इत्यादि में पाये जाते है। मुर्गियो मुख्यतः कैपिलेरिया या धागा कृमि, हिटरैकिस गैलिनेरम या सिकल कृमि आदि पाए जाते हैं। गोल कृमि मुर्गियो पाचन तंत्र, आँख तथा श्वांसनली को नुकसान पहुचाते है। 
  • बड़े गोल कृमि -सबसे ज्यादा क्षति बैकयार्ड झुंड को करते है। 
  1. पोषक का उपयोग कम हो जाना। 
  2. गम्भीर समस्याओं में अंतड़ियो में अवरोध या मौत ये हो सकती है। 
  3. कृमि के अण्डे बीमार मुर्गी के  मल के साथ बाहर आते हैं जिससे कि पानी तथा भोजन दूषित हो जाता है उसी से दूसरी या स्वस्थ मुर्गी में संक्रमण होता है। 
  4. इसके अलावा घोंघे, केचुए, टिड्डा, काक्रोच, स्लग तथा दूसरे कीड़े भी कृमि के अण्डो को कभी कभी  खा लेते हैं। ओर जब इन्हे मुर्गी खाती है तो ये गोल कृमि मुर्गी की आंत में पहुच जाते हैं। 
  5. इन कृमियो के लिये पिपेराजीन उपयुक्त कृमिनाशक दवा होती है।  
  • छोटे गोल कृमि -ये कृमि क्राप तथा भोजन-नालिका को मोटा कर देते है जिससे श्लेष्मा झिल्ली में सूजन दिखती है। टर्की तथा गेंम बर्ड सबसे ज्यादा प्रभावित होतें है। कुछ छोटे गोल कृमि निचली आँत में पाये जाते है और आॅत की परत पर सूजन, रक्तस्त्राव तथा क्षरण करतें है। 
  1. विकास का अवरूद्ध होना। 
  2. अण्डे का उत्पादन कम हो जाना। 
  3. अण्डजन कम होना। 
  4. बहुत ज्यादा संक्रमण से मौत भी हो जाती है। 
  5. बड़े गोल कृमि को परीक्षण में देख सकते है।
  6. गोलकृमि के अण्डें बहुत छोटे होतें है जो सूक्ष्मदर्शी की मदद से देखते है।
  • सीकल वर्म-सामान्यतः मुर्गियों में पाये जाते है। ये सीका में बृद्धि करतें है। यद्यपि सीकल कृमि मुर्गियों को नुकसान नही करते है वस्तुतः ये वाहक होते है। यह एक प्रोटोजोआ परजीवी है, जो टर्की में हिस्टोमोनिओसिस उत्पन्न करता है। मुर्गी की बीट जिसमें दूषित सीकल वर्म के अण्डे या केचुए जिनमें दूषित सीकल कृमि के अण्डे रहते हैं को खाकर टर्की में हिस्टोमोनिओसिस हो जाता है। सामान्यतः मुर्गी में सीकल कृमि के लिये रोग प्रतिरोधक क्षमता कम रहती है, एवं टर्की के स्वास्थ्य को देखते हुए इनको नियंत्रित करना बहुत जरूरी रहता है। 

टेप वर्म (फीता कृमि)- 

फीताकृमि अपने चार सकर द्वारा आंत में चिपके रहतें हैं। मुर्गी के फीताकृमि केवल मुर्गी को ही व्यवधान/नुकसान पहुचाते हैं।

  • इन्हे अपने जीवन चक्र को पूरा करने के लिए चींटी, घरेलू मक्खी, बीटल, स्लग, घोंघे, केचुए की आवश्यकता होती है। चींटी, घरेलू मक्खी, बीटल, स्लग, घोंघे, केचुए को रोककर, बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है। 
  • प्रोटोजोआ -प्रोटोजोवा परजीवी मुख्य रूप से बैकयार्ड मुर्गी में पाए जातें है।  इनमें काक्सीडिया, क्रिपटोस्पोरिडिया तथा हिस्टोमोनास मुख्य है। 
  • काक्सीडिया-इनकी मुर्गियों में नौ प्रजाती पाई जाती है। काक्सीडिया पांचन तंत्र में पाया जाता है ये पोषण की कमी तथा तरल पदार्थ की खपत कम कर देते हंै। जिससे खून की कमी तथा दस्त हो  जाती है।  
  • लक्षण -खूंनी दस्त, वजन कम होना।
    • सुस्ती होना, खराब स्वास्थ्य। 
    • काक्सीडिया की  लिये टीके उपलब्ध हैं जो रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करतें है।
    • काक्सीडिया की रोकथाम एवं नियंत्रण-सही टीकाकरण, उपयुक्त प्रबंधन एवं नियमित एन्टीकाक्सीडियल दवाइयाँ बहुत ही असरकारक होती हैं। 
    • कृप्टोस्पोरिडिओसिस- ये मुर्गियों के एक झुंड से दूसरे झुंड मेें मनुष्य के पैरों द्वारा फैंलते है। सामान्यतः आँत में पाय जाता है चमड़ी का पीला पड़ना इसका मुख्य लक्षण है। 
    • हवा माध्यम से भी संक्रमण फैलता है, आँत से ज्यादा श्वसन संक्रमण हानिकारक होता है। 
    • कोई विशेष उपचार नही होता है। 
    • लक्षण के आधार चिकित्सा तथा दूसरे संक्रमण को रोकना ही इसका मुख्य नियंत्रण होता है।

हिस्टोमोनिओसिस-

यह टर्की में होता है जो सीकल कृमि के द्वारा मुर्गियों में फैलता है। इससे मौत भी हो जाती है और यह दूर सीमा वाले पक्षियों मंे मुख्यतः पाया जाता है। 

  • यह मुर्गी की बीट जिसमें सीकल कृमि के अण्डे होते हैं या केचुए जो सीकल कृमि  अण्डें खाए रहते हैं के माध्यम फैलता है। 
  • इसका कोई प्रभावी उपचार नहीं है। केवल सीकल कृमि को नियंत्रित करके इसको फैलने से रोक सकतें है। 
  • टर्की व मुर्गी को साथ न रखकर। 
  • जहाँ मुर्गी  पूर्व में रही  हो उस स्थान को छोड़कर अन्य स्थान पर मुर्गियों को रखकर भी इसका नियंत्रण किया जा सकता है।