मुर्गीयों में होने वाली प्रमुख बीमारियाँ

मुर्गी पालन एक बेहद सफल व्यवसाय है। मुर्गी पालन व्यवसाय को कम पूंजी, समय और मेहनत और जगह में किया जा सकता है। मगर आप इस व्यवसाय को तभी सफल बना सकते हैं, जब आप मुर्गियों का रख रखाव अच्छी तरह करेंगे। अगर पोल्ट्री फार्मों में रोगों का फैलाव हो जाता है, तो इससे आपको भारी आर्थिक हानि हो सकती है। इसके लिए उनके उचित प्रबंधन के साथ टीकाकरण कराना बहुत जरूरी है। इस लेख में मुर्गियों में होने वाली कुछ प्रमुख बीमारियों की जानकारी दी जा रही है

क) बर्ड­फ्लू:  

बर्ड­फ्लू एवियन इन्फ्लूएंजा (H5N1) वायरस बर्ड फ्लू के नाम से पॉपुलर है। इस खतरनाक वायरस का संक्रमण इंसानों और पक्षियों को अधिक प्रभावित करता है। बर्ड फ्लू इंफेक्शन चिकन, टर्की, गीस और बत्तख की प्रजाति जैसे पक्षियों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। इससे इंसान और पक्षियों की मौत तक हो सकती है। आमतौर पर इसके तीन टाइप हैं- ए, बी और सी. सबसे ज्यादा बीमारी और आपदा जिस बर्ड फ्लू से फैलती है वो ए टाइप का है। इसके हेमाग्लुटिनिन 16 तरह के होते हैं यानि एच1 से एच16 तक। वहीं न्यूरामिनिडेज नौ तरह के होते हैं। एन 1 से लेकर एन 9 तक। इसके आमतौर पर तीन तरह के स्ट्रैन माने जाते हैं। लेकिन चौथा भी सामने आ रहा है। ये भी हवा से फैलने वाले वायरस ही हैं लेकिन आमतौर पर पक्षियों को ही ज्यादा प्रभावित करते हैं।

बर्ड­फ्लू के लक्षण:  

  • बुखार 
  • हमेशा कफ रहना 
  • नाक बहना 
  • सिर में दर्द रहना 
  • गले में सूजन 
  • मांसपेशियों में दर्द 
  • दस्त होना 
  • हर वक्‍त उल्‍टी-उल्‍टी सा महसूस होना 
  • पेट के निचले हिस्से में दर्द रहना 
  • सांस लेने में समस्या 

बर्ड­फ्लू से बचाव या उपचार: 

बर्ड­फ्लू से बचाव या उपचार की कोई मुकम्मल दवा या वैक्सीन नहीं है लेकिन चूंकि ये हवा से फैलने वाला वायरस है लिहाजा इसका उपचार एंटी वायरस ड्रग्स से  हो सकता है मसलन  इसके उपचार के लिए ओस्ल्टामाइवर (Osltemivir) इस्तेमाल में लाई जाती है। इससे तेजी से उपचार हो जाता है।

ख) मुर्गी में रानीखेत रोग: 

एक विषाणुजन्य रोग हैं जो घरेलू पक्षियों (जैसे मुर्गी) तथा अनेकों जंगली पक्षी प्रजातियों को प्रभावित करती है। रानीखेत रोग, जिसे पश्चिम में न्यूकैसल रोग से भी जाना जाता है, संक्रामक और अत्यधिक घातक रोग है। इसके नियंत्रण के लिए किए गए उल्लेखनीय काम के बावजूद, यह रोग अभी भी पोल्ट्री के सबसे गंभीर वायरस रोगों में से एक है। लगभग सभी देशों में यह बीमारी होती है और आम तौर पर सभी उम्र के पक्षियों को प्रभावित करता है, परन्तु इस रोग का प्रकोप प्रथम से तीसरे सप्ताह ज्यादा देखने को मिलता है। रानीखेत रोग में मृत्यु दर 50 से 100 प्रतिशत होती है। यह रोग सर्वप्रथम उत्तराखंड के रानीखेत में देखा गया था।

मुर्गी में रानीखेत रोग के लक्षण:

  • मुर्गियों का दिमाग (ब्रेन) प्रभावित होते ही शरीर का संतुलन लड़खड़ता है, गर्दन लुढ़कने लगती है।
  • छींके और खाँसी आना शुरु हो जाता है।
  • साँस के नली के प्रभावित होने से साँस लेने में तकलीफ, मुर्गियाँ मुँह खोलकर साँस लेती है।
  • कभी-कभी शरीर के किसी हिस्से को लकवा मार जाता है।
  • प्रभावित मुर्गियों का आकाश की ओर देखना।
  • पाचन तंत्र प्रभावित होने पर डायरिया की स्थिति बनती है और मुर्गियाँ पतला और हरे रंग का मल करने लगती है।
  • डायरिया के चलते लीवर भी ख़राब हो जाता है।
  • इस रोग में गैस्पिंग खांसी , गले की खराश , रैटलिंग की आवाज मुख्य रूप से पाये जातें हैं ।
  • मुर्गियां दाना खाना कम कर देतीं हैं और मुर्गियों को प्यास काफी अधिक लगती है ।
  • पंख तथा पैर में लकवा लग जाता है ।
  • मुर्गियां विकृत रूप की अंडे देतीं हैं।

मुर्गी में रानीखेत रोग का निदान:

मुर्गी में रानीखेत के निदान के लिए निम्न बातों का उपयोग किया जा सकता है । सर्वप्रथम किसान भाइयों को कुक्कुट-पालन शुरू करने से पहले अच्छी तरह से मुर्गियों के रहन-सहन, खाने-पीने, आदि का अध्धयन कर लेना चाहिए। मुर्गी-घर (हाउस) की और घर के आस-पास की अच्छी तरह से सफाई कर लेनी चाहिए। कुक्कुट-पालन निदान प्रयोगशाला में एलिशा (Elisa) और पी सी आर (PCR)  विधि से रक्त की जांच कर के रोग से प्रभावित मुर्गियों को मुर्गियों के समूह से अलग कर देना चाहिए।

मुर्गी में रानीखेत रोग का उपचार:

निम्नलिखित दवाईयों (वेक्सिन)  के उपयोग से मुर्गी में रानीखेत का उपचार और रोकथाम की जा सकती है ।

  • मुर्गी में रानीखेत रोग से बचाव के लिए किसानों और मुर्गी पालकों के पास सिर्फ वैक्सीनेशन प्रोग्राम यानी टीकाकरण ही एकमात्र उपाय है।
  • यह टीकाकरण स्वस्थ पक्षियों मे सुबह के समय करना चाहिए और उन्हें रोग से प्रभावित पक्षियों से अलग कर देना चाहिए।
  • सबसे पहले हमें ‘फ-वन लाइव’ (F-1 Live) या ‘लासोता लाइव’ (Lasota) स्ट्रेन वैक्सीन की खुराक (Dose) ५ से ७ दिन पर देनी चाहिए, और दूसरी आर-बी स्ट्रेन (RB starin) की बोअस्टर डोस ८ से ९ हफ्ते और १६-२० हफ्ते की आयु पर वैक्सीनेशन करना चाहिए।
  • रोग उभरने के बाद यदि तुरंत ‘रानीखेत एफ-वन’ नामक वैक्सीन दी जाए तो २४ से ४८ घंटे में पक्षी की हालत सुधरने लगती है।
  • वैक्सीन की खुराक हमें पक्षियों की आँख और नाक से देनी चीहिए, अगर मुर्गी-फार्म बड़े भाग में किया गया है तो वैक्सीन को पानी के साथ मिलाकर भी दे सकते है ।

मुर्गी में रानीखेत रोग का रोकथाम और नियंत्रण:

वर्तमान समय मे इस रोग को जड़ से ख़त्म करने वाली कोई भी दवा विकसित नही हो सकी है, परन्तु कुछ दवाईयों (वेक्सिन) के प्रयोग से इस रोग को बड़े क्षेत्र में फैलने से रोका जा सकता है और इस रोग से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम किया जा सकता है।

  • मुर्गीपालन शुरु करने से पहले क्षेत्र की जलवायु आदि का अध्धयन अच्छी तरह से कर लेना चाहिए और यह भी मालूम कर लेना चाहिए की कभी भूतकाल में यह रोग ज्यादा प्रभावी तो नही रहा है।
  • मुर्गी-घर के दरवाजे के सामने पैर धोने (Foot-Bath) के लिए उचित व्यवस्था करनी चाहिए।
  • मुर्गी-पालक कुछ सफाई सम्बन्धी कार्य करने से इस रोग को काफी हद तक’ रोक सकते है, जैसे मुर्गी घर की सफाई, इन्क्यूबेटर की सफाई, बर्तेनो की सफाई आदि। 
  • रोगित पक्षियों पर तत्काल ध्यान देना चाहिए और उनका उचित टीकाकरण करना चाहिए।
  • रोग से प्रभावित पक्षियों को स्वस्थ पक्षियों अलग कर देना चाहिए।
  • बाहरी लोगो का फार्म के अंदर प्रवेश वर्जित होना चाहिए।
  • दो मुर्गी-फार्मो के बीच की दुरी कम से कम १००-१५० मीटर रखनी चाहिए।
  • रोग से मरे हुए पक्षियों को गड्ढे में दबा देना या जला देना चाहिए।

ग) पुलोरम रोग: 

यह एक तीब्र संक्रामक रोग है । सफेद दस्त एवं कराहने की आवज होना इस रोग क प्रमुख लक्षण हैं । तीन सप्ताह उम्र तक के चुजे ज्यादा प्रभावीत होते हैं, चुज के सुस्त एवं गर्दन झुकाये रहते हैं तथा अचानक सारा प्रक्षेत्र इस रोग के चपेट में आ जाता है । मुर्गी फार्म की साफ-सफाई तथा संतुलित आहार से इस रोग को नियंत्रीत करने में काफी सहायता मिलती है । एन्टीबायोटिक दवाओं द्वारा विशेष लाभ होता है । 

बचाव एवं सावधानीयाँ:  

  • वंशानुगत रोग से ग्रसीत चुजों की खरीद से बचना चाहिए  
  • प्रक्षेत्र में स्वच्छ हवा एवं धूप की व्यवस्था होनी चाहिए 
  • मुर्गीयों का खेप बदलने पर फार्म की विधीवत सफाई होनी चाहिए  
  • नियमित अंतराल पर टिकाकरण अनिवार्य है 

घ) दस्त रोग:

ग्रामीण मुर्गियों को खुले में पालने से पक्षी गंदे स्थानों पर जमा पानी को पीते हैं, इसके कारण अनेक प्रकार के संक्रमण उनके पेट में जन्म ले लेते हैं जिससे उन्हे कई प्रकार के रोग होने लगते हैं।

  • दस्त रोग से बचाव हेतु मुर्गियों को हमेशा साफ-सुथरा पानी उपलब्ध कराना चाहिये।
  • लहसून की पत्तियाँ एवं हल्दी के कंद को पीसकर दाने के साथ मिलाकर देने से लाभ होता है।
  • इसी प्रकार ब्राऊन शक़्क़र के घोल में पिसा हुआ हल्दी कंद अच्छी तरह मिलाकर घोल को उबाला जाता है।
  • चावल का पसीया मुर्गियों को दस्त से लाभ दिलाता है।
  • इसी प्रकार गेहूं के चोकर को दाने में मिलाकर देने से मुर्गियों को लाभ मिलता है।

ङ) कृमि रोग:

गंदे स्थानों में रहने के कारण मुर्गियों में कृमि रोग की संभावना बनी रहती है। कृमि अण्डों से संक्रमित पानी अथवा आहार के माध्यम से कृमि अण्डे पक्षियों के पेट में पहुँच जाते हैं, यहां पर नये कृमि बनते हैं। ये कृमि मुर्गी के पेट में उपलब्ध आहार का उपयोग कर अपनी संख्या बढ़ा लेते हैं और मुर्गियों को कमजोर कर देते हैं। पेट के अंदर ही नये कृमि बड़े होकर अण्डे देते है, जो कि पक्षियों के मल के द्वारा बाहर आकर जमीन एवं जल को पुनः संक्रमित करते हैं। यह क्रम चलता रहता है, जब तक कि पक्षियों को कृमि-नाशक दवा न दी जाये।

  • कृमि-नाशक के रूप में गांवों में उपलब्ध कच्चे पपीते के भीतर उपस्थित रस को पीने के पानी में मिलाकर यदि पक्षियों को दिया जाये तो यह कृमि-नाशन का कार्य करेगा। 
  • इसी प्रकार अदरक एवं हल्दी के कंद को पीसकर रस तैयार कर मुर्गियों को पिलाने से फायदा होता है।
  • लहसून की पत्तियों को पीसकर आहार दाने के साथ देने से कृमि रोग से छुटकारा पाया जा सकता है। 
  • अनार के दानों से तैयार रस भी कृमि रोग के रोकथाम में मदद करता है।