रैबीज (अलर्क रोग, जलांतक)

        रेबीज तंत्रिका तंत्र का एक वीषाणु जनित  संक्रमण है, जो मुख्य रूप से मांसाहारी और चमगादड़ को प्रभावित करता है, किन्तु यह किसी भी स्तनपायी को प्रभावित कर सकता है। श्वान, लोमड़ी, सियार, भेड़िया, बिल्ली इत्यादि रैबीज विषाणु के प्रमुख वाहक होते है |

कारक: यह रोग रहेब्डो विषाणु (आर.एन.ए. विषाणु) से होता है| यह संक्रमित श्वान   के लार के माध्यम से अन्य मनुष्यों तथा अन्य पशुओ में फैलता है|

संचरण : 

  • रेबीज मुख्य रूप से संक्रमित श्वान   के काटने के माध्यम से फैलता है।   
  • यह संक्रमित लार का खुले घाव या श्लेष्म झिल्ली के सीधे संपर्क आने  से भी यह फैल सकता है|   

लक्षण: यह एक तीव्र संक्रामक, अत्यधिक घातक, केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का रोग है | इस बीमारी के लक्षण संक्रमित पशुओं के काटने के बाद या कुछ दिनों में लक्षण प्रकट होने लगते हैं लेकिन अधिकतर मामलों में रोग के लक्षण प्रकट होने  में कई दिनों से लेकर कई वर्षों तक लग जाते हैं। इस रोग में श्वान में मुख्य लक्षण उग्रता, अत्यधिक लार बहना, पशुओं या निर्जीव वस्तुओ पर आक्रमण करना, जबड़े की मांसपेशियों में पक्षाघात हो जाता है जिसकी वजह से जीभ का मुह के बाहर लटकना देखा गया है| जबड़े की मांसपेशिया लकवा ग्रसित हो जाने से श्वान जबड़ा बंद करने में असमर्थ हो जाता है, जिसके फलस्वरूप निचला जबड़ा लटक जाता है और श्वान पानी पीने, खाना खाने में असमर्थ हो जाता है|  

उपचार: इस रोग का कोई प्रभावी उपचार नहीं है| इस बीमारी के रोकथाम के लिए श्वानों में रैबीज का टीकाकरण करवाना चाहिए है| 

बचाव: 

  • पालतू श्वानों को नियमित रूप से टीकाकरण करवाना चाहिए| इसका पहला टीका 3 माह  की आयु  तथा बूस्टर  3 माह बाद  लगाया जाता हैं| इसके बाद प्रतिवर्ष इसका टीकाकारण नियमित रूप से किया जाता है|
  • जानवर द्वारा काटने के स्थान और खरोंचों को 15 मिनट तक साबुन पानी, पोवीडोन आयोडीन, डिटर्जेंट से धोने पर यह विषाणु को मार सकते हैं। 
  • श्वानो के संपर्क में रहने वाले मनुष्यों को रैबीज का टीका नियमित रूप से लगवाना चाहिए|
  • श्वान के काटने पर मनुष्य व पशुओ को रैबीज का टीकाकरण (पोस्ट बाईट) अति आवश्यक है|