लेप्टोस्पायरोसिस

      लेप्टोस्पायरोसिस लेप्टोस्पायर नामक जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न होता है, जो श्वानों , अन्य जानवरों और लोगों में गंभीर बीमारी का कारण बनती है। 

कारक:  Leptospira icterohaemorrhagiae और Leptospira canicola दो सबसे आम बैक्टीरिया है जो इस बीमारी के लिए  जिम्मेदार हैं|

संचरण: लेप्टोस्पायर जीवाणु  हफ्तों से महीनों तक मूत्र मे  निस्काषित होते हैं| इसका संचरण श्वानों के  बीच मे निम्नलिखित प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क के माध्यम से हो सकता है-

  • संक्रमित या कटे हुए त्वचा से संक्रमित मूत्र के संपर्क में आने या दूषित पानी के संपर्क में आने से
  • संक्रमित ऊतकों को खाने से 
  • प्रजनन स्रावों के संपर्क में आने से
  • दूषित जल स्रोत, भोजन या बिस्तर के संपर्क में आने से
  • लेप्टोस्पायर मुंह, आंख, या नाक में श्लेष्मा झिल्ली के माध्यम से भी शरीर में प्रवेश कर सकते हैं| 

लक्षण: लेप्टोस्पायरोसिस से प्रभावित श्वान में निम्नलिखित  नैदानिक ​​संकेत प्रदर्शित करता हैं:

  • बुखार
  • सुस्ती
  • वजन घटना
  • अवसाद
  • पीलिया
  • गुर्दे की छति
  • पेट की परेशानी
  • उल्टी और दस्त
  • निर्जलीकरण 
  • मूत्र में रक्त असामान्य है, लेकिन हो सकता है
  • सांस लेने में परेशानी

उपचार: लेप्टोस्पायरोसिस का आमतौर पर एंटीबायोटिक दवाओं और सहायक देखभाल के साथ उपचार किया जाता है। बीमारी के शुरुआत मे  ठीक होने की संभावना अधिक  होती है,  लेकिन  स्थायी  गुर्दे या यकृत के नुकसान का खतरा होता है।

बचाव: 

  • पशुचिकित्सक की सलाह पर श्वान का नियमित टीकाकरण करवाना चाहिए| इसका पहला टीका 6 सप्ताह की आयु मे लगाया जाता है, बूस्टर  3 सप्ताह के अंतराल मे 16 सप्ताह की आयु तक लगाया जाता हैं| इसके बाद प्रतिवर्ष इसका टीकाकारण नियमित रूप से किया जाता है|
  • यह एक जूनोटिक रोग है अत: अपने संक्रमित पालतू पशु से मूत्र, रक्त, या ऊतकों के संपर्क से बचें ।