सूकर में होने वाले प्रमुख रोग, निवारण, रोग प्रबंधन, अंतः व बाह्य परजीवी नियंत्रण

सूकर रोगों में सामान्य लक्षण-

  • सान्द्र आहार दाना कम खाना या खाने के प्रति अरूचि।
  • सांस तेज चलना।
  • पेशाब का रंग परिवर्तित होना।
  • मल कड़ा होना या दस्त होना।
  • त्वचा मे चकते।
  • होठों थूथनों का सूख जाना।


सूकरों के प्रमुख विषाणु जनित रोग-
(1) स्वाइन फीवर या सूकर बुखार।
(2) खुरपका-मुंहपका रोग (एफ.एम. डी.)


सूकर बुखार या स्वाइन फीवर-
यह विषाणु से होने वाला संक्रामक रोग है। यह बीमारी केवल सूकर प्रजाति में ही पाई जाती है। यह बीमारी दो रूपों में पाई जाती है, अल्पकालिक एवं दीर्घकालीक। अल्पकालिक रूप में संक्रमण होने के एक-दो हफ्तों के भीतर लक्षण आते हैं।


इसके प्रमुख लक्षण है-

  • बिना किसी बाहरी लक्षण के अचानक मृत्यु।
  • भूख न लगना।
  • एकांत में शांत खड़े रहना।
  • होठों के थूथनों का सूख जाना।
  • तेज बुखार।
  • कब्ज या दस्त होना।
  • शरीर की त्वचा का रंग नीला पड़ना।
  • आंखें लाल होना।
  • सूकर का गोलाकार घूमना।
  • लड़खड़ाना।
  • मांस पेशियों में झटके आना।
  • सूकर बुखार में सभी सूकर शावक एवं व्यस्क सूकरों की शत प्रतिशत मृत्यु हो सकती है।


रोकथाम- इस बीमारी हेतु रोग प्रतिबंधत्मक टीकाकरण उपलब्ध है। टीके की पहली खुराक 2 हफ्ते में दूसरी खुराक 2 माह मे एवं प्रत्येक वर्ष एक खुराक पशु चिकित्सक की सलाह से लगवानी चाहिए।

खुरपका-मुंहपका रोग (एफ.एम.डी.)-
यह एक विषाणु जनित संक्रामक रोग है। यह विषाणु अपने रोग के नाम के अनुसार मुंह, जीभ एवं खुरों के आस-पास की त्वचा पर संक्रमण करता है। संक्रमण के स्थान पर छाला बन जाता है। पशु को बुखार हो जाता है। दूर में भी देखने पर रोगी पशु के मुंह मे लार टपकते दिखाई देती है। पशु अक्सर अपने पैरों के बीच भाग को चाटता है। पैरों में लगंड़ापन आ जाता है, जिससे सूअर को चलने-फिरने में परेशानी होती है। इस बीमारी में मृत्युदर अपेक्षाकृत कम हैं, परंतु पैरों व मुंह के छाले लम्बे समय तक रहते हैं।


उपचार- उपचार हेतु पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। प्राथमिक उपचार हेतु मंुह को 2 प्रतिशत फिटकरी या पोटेशियम परमेगनेट या खाने के सोडा में धोना चाहिए। पैरों को 1 प्रतिशत वाशिंग सोडा या नीला थोथा (काॅपर सल्फेट) के घोल में धोना चाहिए। घाव पर बोरिक एसिड एवं ग्लिसरीन का घोल लगाना चाहिए। सूअर को खाने हेतु नरम व आसानी से पचने वाला दाना देना चाहिए। चाॅवल का माॅड़ एवं गेहूं का गुड़ में दलिया दिया जा सकता है।


रोकथाम- सूकरे के बाड़े को साफ-सूथरा रखना चाहिए। बाड़े में महीने मंे एक बार चूने से अच्छे से पुताई करनी चाहिए । प्रवेश द्वार पर चूना पाउडर का छिड़काव या दो प्रतिशत फार्मेलीन का घोल का उपयोग करना चाहिए।
पाॅलीवेंलेंट एफ.एम.डी. टीकाकरण करना चाहिए। पहला टीका जन्म के तीसरे हफ्ते, दूसरा टीका सात हफ्ते में तथा उसके बाद हर छः माह में टीकाकरण करना चाहिए।


पिगलेट एनीमिया-
यह रोग सूअर के शावकों में आयरन खनिज तत्व की कमी से होता है। इस रोग के मुख्य लक्षण हैः एनीमिया, कमजोरी, त्वचा एवं बालों का रूखापन, सुस्ती, दस्त लगना, त्वचा में झुर्रिया पड़ना। यह सामान्यतया दो से चार हफ्तों के सूकर शावकों में होता है।


उपचार- सूकर शावकों को दूसरे एवं तीसरे हफ्ते पशु चिकित्सक के परामर्श में आयरन डेªेक्ट्रान या इमफेरान का इंजेक्शन लगवाना चाहिए । ओरल आयरन टाॅनिक का भी सेवन सूकर शावकों को कराया जा सकता है।


सूकरों का हाइपोग्लाइसेनिया रोग-
यह रोग मुख्यतः सूकर शावकों को जन्म के पहले हफ्ते ग्लूकोज या ऊर्जा की कमी से होता है। इससे बचने हेतु एक दिन के अंतराल में गुड़ या शक्कर का घोल पानी को उबालकर कुनकुना कर सूकर शावकों को तीन दिनों तक पशु चिकित्सक की सलाह से दिया जा सकता है।


अंतः परीजीवी संक्रमण-
यह मुख्य रूप से गोल कृमि, फीताकृमि या फ्लूक कृमि के संक्रमण से होता है। इससे शारीरिक वृद्धि दर कम हो जाती है। सूकरों में एनीमिया एवं दस्त भी हो जाते हैं। सूअर का शरीर कमजोर एवं पेट फूला हुआ दिखाई देता है। बालों एवं त्वचा में सूखापन आ जाता हैंै। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।
उपचार – कृमिनाशक दवा पान प्रति तीन माह में पशु चिकित्सक की सलाह से करना चाहिए। पिपराजीन, फेन बेंडाजाल या आॅक्सी क्लोजानाॅइड आवश्यकतानुसार पशु चिकित्सक की सलाह से दी जा सकती है।


बाह्य परजीवी- इनमें मुख्य रूप से जुंआ, किल्ली, पेसुंआ इत्यादि आते हैं। इनके कारण त्वचा में खुजली होती है। सुअर के बाल गिरने लगते हैं। खुजली से पशु अपना शरीर रगड़ता है, जिससे उसकी त्वचा में घाव बन जाते हैं। इसके अलावा परजीवी के खून चूसने के कारण एनीमिया रोग भी हो सकता है। सूअर को लगातार खुजली होने से वो अपना आहार भी ग्रहण ठीक से नहीं कर पाते, जिससे उनका शारीरिक विकास भी कम हो जाता है।

उपचार- 2 भाग गंधक को 8 भाग अलसी का तेल में मिक्स कर त्वचा पर लगा सकते हैं। करंज, अलसी, देवदार या नीम के तेल को त्वचा पर लगाया जा सकता है। कीटनाशक स्पे्रयिंग या उपचार हेतु पशु चिकित्सक से सलाह लेवें।