मछलियों के रोग एवं उनका नियंन्त्रण


मत्स्य पालन की सफलता मुख्यतया मछलियों के स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। मछलियों में बीमारी होने के मुख्य कारण होते हैं – वातावरण में तनाव , बीमारी फैलाने वाले कारक तथा पोषण की कमी । कृत्रिम परिस्थितियों में जहाँ अधिक मात्रा में मत्स्य बीज संचित किया जाता है बीमारियाँ अधिक पायी जाती हैं । जिसके कारण जीवन-दर तथा वृद्धि-दर कम हो जाती है।


वाइरस से होने वाली बीमारियाँ
स्प्रिंग वाइरेमिया – यह बीमारी रैब्डोवाइरस कार्पियो नामक वाइरस के संक्रमण से होती है। कामन कार्प में होने वाली यह बीमारी अभी तक यूरोपीय देशों में पायी गयी है। संक्रमित मछली का रंग काला, त्वचा तथा गलफड़ों पर घाव, शल्कों से रक्त का रिसाव, देहगुहा में द्रव का जमाव तथा खाने की नली में सूजन आदि लक्षण पाए जाते हैं ।
मत्स्य चेचक – यह बीमारी भी यूरोपीय देशों में पायी जाती है। इस बीमारी में वाइरस से संक्रमित कामन कार्प के शरीर की अधिचर्म प्रचुरोद्भवी हो जाती है। जिससे त्वचा पर उभार या दाने बन जाते हैं ।


जीवाणु से होने वाली बीमारियाँ
रक्तस्त्राव की बीमारी – यह बीमारी स्यूडोमोनास फ्लूरिसेंस तथा एरोमोनास हाइड्रोफिला नामक जीवाणुओं के संक्रमण से होती है। कार्प मछलियों की सभी प्राजातियों में इसका संक्रमण होता है । इस बीमारी सं शरीर पर खरोंचें तथा घाव बन जाते हैं जिनसे रक्तस्त्राव होता है, पेट फूल जाता है तथा नेत्र बाहर निकल पड़ते हैं
काॅलमरैनिस रोग – यह बीमारी सभी कार्प मछलियों में फ्लेक्सीबैक्टर काॅलमनैरिस नातक जीवाणु के संक्रमण से होती है। रोहू में संक्रमण होने पर सर्वप्रथम शरीर के ऊपरी मध्य भाग पर एक सफेद धब्बा दिखायी देता है । उसके बाद फिन के किनारों पर घाव होने लगते हैं । गलफड़े गल जाते हैं मृत्यु दर बहुत हो जाती है।
गलफड़ों की बीमारी – यह बीमारी मिले-जुले जीवाणुओं के संक्रमण के कारण होती है। जिसमें कार्प की फ्राई तथा फिंगरलिंग्स सर्वाधिक प्रभावित होती है। बामारी के फलस्वरूप पूरे शरीर पर धब्बे पड़ जाते हैं मथा वृद्धि रूक जाती है। गलफड़ों पर घाव बन जाते हैं ।


कवच सा फफँूद से होने वाली बीमारियाँ
वे मछलियाँ जिनको कोई चोट लगी हो या जिनमें किसी जीवाणु के कारण घाव बन गया हो, फफँूद द्वारा द्वितीयक स्तर पर संक्रमित हो जाती हैं और फिर धीरे-धीरे फफँूद के तन्तु पूरे शरीर पर फैलकर मछली को अपनी चपेट में ले लेते हैं ।
सैप्रोलेग्निया नामक फफँूदी कार्प मछलियों तथा उसके अण्डों पर आक्रमण करती है और शरीर के बाहर से लेकर अन्छर तक एक सफेद जाल बना देती है। शीघ्र ही मछली की मृत्यु हो जाती है।
बैन्कियोमाइसीज नामक फफूँदी भी कार्प मछलियों को संक्रमित करती है। इसके तन्तु गलफड़ों एवं रक्त वाहिनियों में प्रवेश कर जाते हैं जिससे ऊतक क्षतिग्रस्त होकर गल जाता है और हड्डियाँ दिखायी देने लगती है। शीघ्र ही मछली की मृत्यु हो जाती है।


प्रोटोजोअन से होने वाली बीमारियाँ
इक्थियोफ्थिरियासिस या इक – यह बीमारी इक्थियोफ्थिरियस मल्टीफिलिस (प्बीजीलवचीजीतपने उनसजपपिसपे) नामक प्रोटोजोआ के ग्रसन से होती है । यह परजीवी मछली की त्वचा में प्रवेश करता है। जिससे इसके चारों ओर कोष्ठ बन जाता हैं और इसी प्रकार कोष्ठ पूरे शरीर, फिन्स तथा गलफड़ों पर सफेद चकत्ते के रूप में दिखायी देते हैं ।
ट्राइकोडिनोसिस – यह बीमारी मुख्यतया उन संवर्धन स्थलों पर होती है जहाँ मत्स्य बीज अधिक मात्रा में संचित किए जाते हों तथा जल दूषित हो। यह तश्तरीनुमा परजीवी ट्राइकोडिना तथा ट्राइकोडिनेला के ग्रसन से होती है। परजीवी का प्रभाव शरीर की ऊपरी त्वचा तथा गलफड़ों पर होता है। शरीर ऊपरी भागों से लसलसा पदार्थ बहने लगता है।


मिक्सोस्पोरीडियन बीमारी – यह मिक्सोबोलस नामक परजीवी के ग्रसन से होने वाली इस बीमारी में मछली के शरीर, फिन, गलफड़ों तथा अन्य अन्तरांगों में प्रकोष्ठ बन जाते हैं । प्रकोष्ठों (ब्लेजे) की संख्या व आकार बढ़ने पर मछली को साँस लेने में तकलीफ होती है । जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है। भारतीय कार्प मछलियो में इसका ग्रसन बहुत ज्यादा होता है।


क्रस्टेशियन जन्तुओं से होने वाली बीमारियाँ
लर्निया की बीमारी – यह बीमारी लर्निया सिप्रिनेसिया के द्वारा होती है। इसका शरीर लम्बा कृति के समान होता है तथा सिर मछली के शरीर में धँसा रहता है। इस धँसे हुए सिर से कई शाखएं निकली रहती हैं । प्रारम्भ में मछली तेजी से तैरने लगती है तथा बाद में शरीर पर चकत्ते तथा घाव उत्पन्न हो जाते है। कतला में यह बीमारी सबसे ज्यादा होती है।
आर्गुलस की बीमारी – यह आर्गुलस नामक परजीवी के ग्रसन से होती है। यह कार्प मछलियों की सभी अवस्थाओं को ग्रसित करती है। यह परजीवी अपने मैण्डिबिल को पाषक की त्वचा में गड़ाकर पोषक का ग्रसित कर लेता है ं इसके ग्रसन से मछली के शरीर पर चकत्ते तथा घाव बन जाते हैं तथा मछली व्याकुलता में तेजी से तैरने लगती है । रोहू में यह बीमारी सबसे ज्यादा होती है।


कृमियों से उत्पन्न से होने वाली बीमारियाँ

अनेक परजीवी कृमि मछलियों को ग्रसित करते हैं और विभिन्न प्रकार से प्रभावित करते हैं जैसे डैक्टाइलोगाइरस तथा गाइरोडैक्टााइलस गलफड़ों तथा त्वचा पर आक्रमण करता है। इन परजीवियों के मछली के शरीर से चिपक जाने के कारण मछली शिथिल पड़ जाती है, फिन गिरने लगते हैं, रंग पीला पड़ने लगते हैं तथा शरीर पर रक्त बिन्दु दिखायी देने लगते हैं । उपचार न मिलने पर मछली की मृत्यु हो जाती है।
पाॅस्थोडिप्लास्टोमम क्यूटिकोला नामक कृमि की मेटासर्केरिया के कोष्ठ भी मछलियों में काले चकत्तों वाली बीमारी फैलाते है। यह काले चकत्ते ने़त्रों एवं मुख सहित सो शरीर पर पड़ जाते हैं । ये परजीवी सर्केरिया अवस्था में मछली के शरीर में त्वचा के माध्यम से प्रवेश करते है।
वातावरण के कारण बीमारियाँ
छोटे तालाबों तथा जलाशयों का वातावरण हमेशा परिवर्तित होता रहता है। इसके कारण मछलियों को भी जल के चभ्, तापमान, दबाव, प्रकाश घुलित गैसों एवं मछलियों की संख्या के हिसाब से अपने को व्यवस्थित करना पड़ता है। इन सभी कारणों के फलस्वरूप मछलियाँ तनाव में आ जाती है। जिससे उनकी जैविक प्रक्रियायें प्रभावित होती है। और उनके चयापचय में परिवर्तन हो जाता है। उनके रक्त में ग्लाइकोजेन तथा प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है। जो उनके तनाव की स्थिति से निपटने में सहायता करती हैं परन्तु इसके साथ ही उनमें बीमारियों की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं ।
पोषक की कमी से बीमारियाँ
दूसरे जीवों की तरह मछलियों को भी प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन तथा खनिज लवणों की आवश्यकता होती है। इनकी कमी से होने वाली बीमारियाँ बहुत ही हानिकारक होती है और प्रायः धीरे-धीरे अपना प्रभाव दिखाती हैं । धीरे-धीरे मछली कमजोर पड़ जाती हैं । परिणामस्वरूप उन पर परजीवियों का आक्रमण प्रारम्भ हो जाता है।


बीमारियों की रोकथाम
तालाब में मछलियों का निरन्तर निरीक्षण करते रहना चाहिए तथा बीमार मछली की पहचान करके उसे अलग कर देना चाहिए ।
तालाब को असंक्रमित करने के लिए 0.25 चचउ की दर से मैलाथिआॅन अथवा 50 चचउ की दर से ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करना चाहिए ।
समय-समय पर तालाब के जल में 2-3 चचउ की दर से पोटैशियम परमैंगनेट डालते रहना चाहिए । मछली के फ्राई तथा फिंगरलिंग्स को 500-1000 चचउ पोटैशियम परमैंगनेटके घोल में एक मिनट डुबोकर तालाब में छोड़ना चाहिए । 2-3 प्रतिश तनमक के घोल का भी प्रयोग किया जा सकता है।
बैक्टीरिया जनित रोगों के उपचार हेतु आॅक्सीटेट्रासाइक्लीन, अेरामाइसीन, सल्फामेथाजीन, सल्फाडायाजीन तथा कैनामाइसीन आकद प्रतिजैविक दवाइयों का प्रयोग किया जा सकता है।
(अ) प्रोटोजोआ जनत्रनित बीमारियों के लिए काॅपर सल्फेट, काॅपर आॅक्सीक्लोराइड यौगिकों तथा फफूँदी जनित रोगों के लिए मैलाकाइट ग्रीन का प्रयोग किया जाता है।
मेटाजोआ वर्ग के परजीवियों की रोकथाम के लिए डाई-ब्यूटाइलिन आॅक्साइड का प्रयोग किया जाता है । कृमियों के लिए प्रतिकृति अवाइयों का प्रयोग भी किया जा सकता है ।