बकरियों का प्रबंधन:-

1- बच्चे के जन्म पर सावधानियाँ: जन्म के पश्चात नाभि स्थान में
आयोडीन अच्छी तरह लगाना चाहिए। एक दो दिन के अंतर पर
आयोडीन फिर लगानी चाहिए।
2- माँ का पहला दूध 36 घंटे के अन्दर किसी न किसी तरह पिलाना
आति आवश्यक है। पहले दूध के सभी पोषक तत्व विपुल मात्रा में होते
हैं। इससे बच्चे की रोग प्रतिकारिता शाक्ति बढ़ती है।
3- बच्चे को माँ से अलग करना: बकरी माँ से बच्चों को 2-3 माह की
उम्र में अलग कर देना चाहिए क्योंकि इसके बाद बच्चों में वयस्कता
आती है।
4- सींग रोहान काना: सींग रहित करने की सबसे अच्छी उम्र 5-7 दिन
तक होती है। कास्टिक पोटाश की छड़ लेकर उसको सींग पर इतना रगड़े
कि सींग का बटन जलकर नष्ट हो जाए। दूसरे तरह से गर्भ लाल लोहे
की छड़ से दागकर जलाने के बाद उस पर बीटाडीन आयोडीन मलहम
लगातार लगाएं।
चिन्हित करना: बकरियों पर पहचान स्थापित करने के लिए कानों पर
संख्या छेदकर कान पर टेग बाँधकर या कान को ट आकार में काटकर
किया जाता है।
बकरी के खुरों को काटना: बकरियों के खुर जल्दी-जल्दी बढ़ते हैं। अतः
प्रत्येक माह निश्चित समय पर खुरो को काट छाँटकर सुव्यवस्थित करते
रहना चाहिए। अन्यथा बकरियों को स्वास्थ्य एवं दुग्ध उत्पादन बुरी तरह
प्रभावित होता है।

बाधियाकरण करना: नर बकरे का बधियाकरण करना निताँत आवश्यक
होता है जिससे कि अनचाही पैदाइश एवं उनकी शक्ति का सही प्रयोग
हो सके। मटन के लिए रखे गए बकरे का बधियाकरण 2 माह की उम्र
में उपयुक्त होता है। बधियाकरण के निम्न फायदे हैं।
1- मटन स्वादिष्ट लगता है।
2- बकरे का वजन बढ़ने में मदद होती है।
3- खाल मुलायम होती है।
4- अनचाही पैदाइश रोकी जा सकती है। 
परजीवियों का नियंत्रण: बकरी के शरी पर रहने वाली (कृमी रक्त तथा
अन्न रस का शोषण करती है। इसके कारण बकरियाँ ठीक से नहीं बढ़
पाती है। शरीरिक विकास तथा परजीवियों को मारने के लिए बी.एच.सी.
एवं मैलाथियान जैसी दवाओं का छिड़काव किया जाता है। 
पशुओं का बीमा करना: इनकी बीमा योजना पंचायतों द्वारा निकाली
जाती है। गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाले लोगों को रोजगार का
साधन देकर उनका जीवन स्तर ऊँचा उठाने के उद्देश्य से एकीकृत
ग्रामीण कार्यक्रम लागू किया जाता है। इसमें पशुओं की आकस्मिक मृत्यु
होने पर व्यक्ति को पंशु के बीमे का भुगतान किया जाता है। ग्राम
पंचायत दावा फार्म भरकर बीमा कम्पनी को भेज देती है और दावा फार्म
मिलने के 21 दिन बाद व्यक्ति को चेक द्वारा मरे हुए पशु/पक्षी की
कीमत मिल जाती है।