भेड़ के प्रमुख रोग

निमोनिया: यह  भेड़ का प्रमुख रोग है। यह रोग  भेड़ को ठंड लगने या भीगने से होता है। जिससे  भेड़ को तेज बुखार आता है एवं साँस लेने में तकलीफ होती है। सर्वप्रथम तो ठंड आने वाले मार्ग को बंद कर देना चाहिए एवं तेल की कुछ बूँदे गरम पानी में डालकर देनी चाहिए।

एंथ्रेक्स: यह रोग बैसिलस एन्थ्रेसिस नामक जीवाणु द्वारा होता है इस रोग में चमड़ी में खून जमा हो जाता है। बुखार आने के साथ-साथ नाक, मुँह एवं मल द्वार से खून रिसता हुआ दिखता है एवं मरे हुए पशु को गहरे गढ्ठें में चुनखुड़ी डालकर गाड़ देना चाहिए।

घटसर्प: यह रोग पाश्चुरेला नामक जीवाणु द्वारा होता है। इस रोग में तेज बुखार आता है गले एवं जीभ में सूजन आ जाती है। इसलिए सांस लेने में तकलीफ होती है एवं 24 घंटे में मृत्यु हो जाती है। यदि एन्टीसीरम उपलब्ध हो तो 150 घ.से. की मात्रा का अंतःशिरा इंजेक्शन देने से लाभ होता है। सल्फा ड्रग्स का इंजेक्सन भी लाभकारी रहता है।

विषाणुजनितरोग:

खुरप का मुँहपका: यह रोग वायरस से होने वाला एक भयानक रोग है। इस रोग में खुर तथा मुँह में फफोले पड़ जाते हैं एवं पशु का शारीकि तापक्रम 104-105 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। रोग हो जाने पर पशु के फफोलों को बोरिक एसिड, फार्मलीन आदि घोलों से धोना चाहिए। छालों पर बोरोग्लिसरीन का लेप भी गुणकारी है। पैरों के छालों पर 1 प्रतिशत तूतिया या फिनायल का घोल छिड़काव करना चाहिएं इन घावों को शीघ्र अच्छा करने के लिए पशु को 10 उस टेरामारसिन का इंजेक्शन गुणकारी रहता है। साथ ही साथ पादस्नान करवाना चाहिए इसके लिए 3-4 मी. लंबी 1 मी. चैड़ी व 30 सेमी. गहरी नाँद बनाकर पैरों को स्नान कराएं।

पाचन संबंधी रोग:

अफारा रोग: यह रोग पशुओं में अधिक हरा चारा खाने के कारण हो जाता है या चारे में अचानक परिवर्तन होने पर भी हो जाता है। पेट की बाई कोख फूल जाती है व दर्द होता है पशु खाना पीना बन्द कर देता है साँस लेने में कष्ट होता है। पशुओ को ऐसी स्थित में तारपीन का तेल पिला दें एवं प्रोटीन युक्त आहार न दें।

कब्ज हो जाना: कब्ज होने पर पशु जुगाली भी बन्द कर देता है भूख कम हो जाती है यह रोग उनमें ज्यादा होता है जिन्हं भोजन अधिक एवं व्यायाम कम मिलता है। ऐसी स्थिति में पशु का तापमान बढ़ जाता है और पशु की मृत्यु तक हो सकती है इसके हेतु रोज व्यायाम अवश्य कराएं एवं पेट का एसिड कम करने हेतु सोडियमबाइकार्बोनेट दें।

परजीवी रोग: परजीवी रोग दो तरह के होते हैं वाह्य परजीवी एवं अंतः परजीवी बाह्य परजीवी में  भेड़घर में कीड़े भी हो सकते हैं जिन्हें तीन सप्ताह तक खाली छोड़ने पर कीडें मर जाते है। आईवरमैक्सि का इंजेक्शन चमड़ी में दिया जाता है एवं ब्यूटाक्स दवा का भी प्रयोग किया जाता है जिससे वाह्य परजीवी कीड़े मर जाते हैं। आँतरिक परजीवी के लिए आलबेंडाजोल, फेनबेंडाजोल, लेवामेरजेल दवाओं का प्रयोग लाभकारी सिद्ध होता है।

प्रजननसंबंधीरोग:

बच्चेदानी का बाहर आना: कभी-कभी बच्चेदानी वाह्सजननाँग से बाहर निकल जाती है, ऐसी स्थिति में पोटेशियम परमैगनेट या लाल दवा का एक भाग तथा साफ पानी का हजार भाग मिलाकर घोल बना लिया जाता है, जिससे बच्चेदानी को धो दिया जाता है। फिर धीर-धीरे उसे अंदर करने का प्रयत्न किया जाता है।

बच्चे का जन्म के बाद जेर न गिरना: जन्म के 12 घण्टे के अन्दर जेर गिर जाना चाहिए। यदि जेर नहीं गिरती तो सूजन एवं मवाद पड़ बीमारियाँ पैदा हो सकती है। जेर न गिरने पर फ्युरिया नामक गोली बच्चेदानी के अन्दर डालनी चाहिए। इसके अलावा हार्मोटोन नामक दवा पिलानी चाहिए।