बकरी पालन की वैज्ञानिक पद्धति

बकरी पालन एक अत्यंत लाभकारी व्यवसाय है। भारत में प्राचीन काल से बकरी पालन हो रहा है। इस व्यवसाय में लागत भी कम लगती है, एवं यह आजीविका के विकल्प के रूप में भी महत्वपूर्ण है। बकरी ‘‘गरीब की गाय’’ के नाम से प्रसिद्ध है क्योंकि इसे पालने में अधिक खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए इसको गरीब पशुपालक सरलता से पाल सकते है। परन्तु परम्परागत तरीकों से बकरी पालन एवं देश के विभिन्न भागों में चारागाह एवं हरे चारे की कमी के कारण पशुपालक इस व्यवसाय का समुचित लाभ नहीं प्राप्त कर पाते।
पशुपालकों में वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा पशुपालन करनने की जागरूकता एवं संबंधित ज्ञान देने से बकरी पालन को एक लाभदायक व्यवसाय बनाया जा सकता है। वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से मेमनों का संपूर्ण शारीरिक विकास एवं शरीर भार में वृद्धि हेतु बाड़े में पाले जाता है, जिससे पशुपालक की आय को बढ़ाया जा सके।
वैज्ञानिक पद्धति द्वारा बकरी पालन के लिए निम्न चार आधार हैः-

  1. नस्ल का चुनाव।
  2. आवास प्रबंधन।
  3. आहार प्रबंधन।
  4. स्वास्थ्य प्रबंधन।
  5. नस्ल का चुनावः- हमारे देश में दुनियाभर में बकरी पालन करने के लिए विभिन्न बकरियों की नस्लें पाई जाती है। नस्ल का चुनाव उत्पादकता, वातावरण एवं परिस्थितिकी के अनुरूप हो एवं बकरियां शुद्ध नस्ल की हों।
    उत्तरी ठंडा क्षेत्रः-गद्दी, चांगथांगी, चेगू।
    उत्तर पश्चिमी शुष्क क्षेत्रः-सिरोही, मारवाडी, जखराना, बीतल, बारबरी, जमुनापारी, मेहसाना, सूरती।
    दक्षिणी क्षेत्रः-संगमनेरी, उस्मानाबादी, मालाबारी।
    पूर्वोत्तर क्षेत्रः-गंजाम बंगाल।
    सर्वाधिक उन्नत भारतीय नस्ल सिरोही, जमनापारी, सुरती, तेलीचरी, बीटल, बारबरी, गुजराती आदि प्रमुख है। इसके अलावा विदेशी नस्ल जो कि भारतीय वातावरण एवं जलवायु में सामंजस्य कर लेती है जैंसे-सानेन, टोगनवर्ग, अंगोरा, एंग्लोन्यूविन, ब्रिटिश अलपाइन एवं फ्रेंच अलपाइन है।

बकरों का चुनावरू. शारीरिक रुप से स्वस्थए तंदरुस्थ एवं शुध्द नस्ल वालेए अधिक्तम ऊंचाई वाले एवं रोग रहित बकरों का चुनाव होना चाहिए।

बकरी का चुनावरू. बकरी की नस्ल अनुरुप भार एवं ऊंचाई कीए शुध्द नस्ल कीएअधिक दुध देनेए स्वस्थ एवं उत्तम प्रजनन क्षमता वाली होनी चाहिए।

अतः स्थानीय बकरियों का अच्छी नस्ल के नर से प्रजनन कराकर उत्कृष्ठ मेमना पैदा किया जा सकता है जिसका शरीर भार 3-4 माह में लगभग 25-30 कि.ग्रा. हो।

  1. आवास प्रबंधनः-बकरियों के प्रतिकूल वातावरण जैंसे ठंड एवं बरसात, जंगली जानवरों तथा चोरी आदि संभावनाओं से बचाने तथा चारा दाना खिलाने की उचित व्यवस्था हेतु आवास का होना अत्यंत आवश्यक है।
    बकरी आवास का निर्माण स्थानीय उपलब्ध संसाधन से सस्ते मूल्य पर किया जा सकता है। पशु पालक की आर्थिक स्थिति एवं स्थानीय जलवायु के अनुरूप बकरी आवास का निर्माण निम्न प्रकार से किया जा सकता हैः-
    (1) खुले बाडे।
    (2) अर्द्ध खुले बाड़े।
    (3) भूमि की सतह से ऊंचे लकडी के बाड़े।
    (4) भूमिगत बाड़े।

(1) खुले बाड़ेः-इस प्रकार के बाड़े शुष्क जलवायु वाले स्थानों में बनाये जाते है, जहां प्रति झुंड़ बकरियों की संख्या अधिक होती है। इन बाड़ों में घर के समीप कांटेदार झाड़ियों की बाड़ बनाकर बकरियों को रखा जाता है।
(2) अर्द्ध खुले बाड़ेः-इस तरह के आवास व्यवस्था में दोनों प्रकार की व्यवस्था होती है खुली एवं ढंकी। खुला क्षेत्र ढके क्षेत्र का दुगना होता है। ढके स्थान का उपयोग बकरियों को प्रतिकूल मौसम से बचाव हेतु किया जाता है। यह आवास व्यवस्था बकरियों के लिए आदर्श होती है।
(3) भूमि की सतह से ऊंचे लकडी के बाड़ेः-इस प्रकार की आवास व्यवस्था अधिक वर्षा वाले स्थानों के लिए उपयुक्त है इसके लिए भूमि से 1 मीटर की ऊंचाई पर लकड़ी की पट्टियों से प्लेटफार्म का निर्माण किया जाता है। फर्श में दो पट्टियों के बीच 1.5 से.मी. की खाली जगह होती है जिससे मल मूत्र आसानी से नीचे गिर जाए एवं फर्श पन न रूके।
(4) भूमिगत बाडेः-इस प्रकार के बाड़े ऐसे क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है जहां अधिक ठंड पड़ती हो। ऐसे बाड़ो में रोशनदान का होना बहुत ही आवश्यक है।

  1. आहार प्रबंधनः-
    बकरियों के पोषण हेतु मुख्यतः सघन, अर्धसघन एवं बिरल पद्धतियां अपनाई जाती है।
    (1) सघन पद्धति में बकरियों को बाड़े में रखकर ही पालते है एवं पोषक तत्वों की पूर्ति हरा चारा, भूसा एवं दाना खिलाकर करते है।
    (2) अर्द्धसघन पद्धति-बकरियों को चरने हेतु भेजते है एवं पोषण काफी हद तक चरने से पूर्ण हो जाती है। जो पोषक तत्व नहीं मिल पाते उन्हें भूसा, हरा चारा एवं दाना मिश्रण देकर पूर्ण किया जाता है।
    (3) बिरल पद्धति के अंतर्गत बकरियों को चराकर ही पोषण दिया जाता है।
    बकरी पालन की सघन पद्धति को ध्यान में रखते हुए बकरियों की पोषक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सूखा चारा, हरा चारा एवं दाना मिश्रण दिया जाता है।आवश्यक शुष्क पदार्थ की पूर्ति 50 प्रतिशत दलहनी भूसा (चना, मूंग, अरहर, सोयाबीन आदि) या दलहनी चारे की ष्हेष्( लोबिया, ग्वार, बरसीम, सोयाबीन इत्यादि) से तथा शेष 50 प्रतिशत दाने के मिश्रण एवं हरे चारे की बराबर मात्रा से की जाती है।
    अर्द्धसघन पद्धति में बकरियों को चारागाह से प्रतिदिन उपलब्ध होने वाले पोषक तत्वों की जानकारी होनी चाहिए। उसके उपरांत बकरियों को दाना, भूसा या हरा चारा अथवा तीनों ही पूरक आहार के रूप में देने होंगे।

बकरीयों में स्वास्थ्य प्रबंधन
बकरीयों को कई प्रकार के घातक रोगों जैसे कि पीण्पीण्आरण्ए ईण्टीण्ए चेचकए मुंह्पकाए खुरपका एवं एन्थ्रेक्स इत्यादी से बचाव के लिए टीकाकरण अवश्य करावे। वर्षाऋतु से पहले एवं बाद में कृमिनाशक दवा पिलाये। ब्राम्ह परजीवी के उपचार के लिए ब्राम्ह परजीवी नाशक घोल से स्नान करावे। बकरीयों के मल की नियमित जांच कराये। रोगग्रस्त पशुओं को स्वास्थ पशुओं से अलग रखकर उपचार करावे।

टीकाकरण चार्टः-